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तथ्य जाँचः क्या दृष्टि दोष को किसी भी उम्र में ठीक किया जा सकता है?

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सारांश 

एक फेसबुक वीडियो में दृष्टि दोष को ठीक करने का दावा किया गया है। इसमें आंखों की रोशनी को दोबारा प्राप्त करने की बात भी कही गई। लेकिन, जब हमने इस पोस्ट का तथ्य जांच किया तब पाया कि यह दावा बिल्कुल गलत है। 

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दावा 

फेसबुक पर जारी एक वीडियो के जरिए दावा किया जा रहा है कि किसी भी उम्र में अंधेपन का इलाज किया जा सकता है और खोई हुए दृष्टि को दोबारा प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही इस पोस्ट में जाने माने पत्रकार के वीडियो का इस्तेमाल किया गया है जो इस दवा के बारे में बता रहे हैं।

Blindness cure claim

तथ्य जांच 

दृष्टि दोष क्यों होता है?

आंखों की सेहत अनेक मानकों जैसे – अनुवांशिकता, दिनचर्या, खानपान इत्यादि पर निर्भर करती है। इस लेख के अनुसार Macular degeneration के कारण आंखों की रौशनी कमजोर हो जाती है। इसके अलावा मोतियाबिंद एवं ग्लूकोमा के कारण भी आंखों की रोशनी कमज़ोर हो जाती है। इसके साथ ही ज्यादा समय तक तेज़ धूप में रहने और डायबिटीज, धूम्रपान के कारण भी आंखों की रोशनी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। Myopia, Hypermetropia , Amblyopia, Presbyopia, Astigmatism के कारण भी आंखें कमजोर हो जाती हैं। मायोपिया(निकट दृष्टि दोष) में दूर की चीजें नहीं दिखाई देती, हाइपरोपिया में पास की चीजें देखने में कठिनाई होती है। प्रेसबायोपिया के कारण मध्यम आयु और बुर्जुग लोगों को पास की चीजों को देखने में परेशानी होती है। इसके अलावा, एस्टिग्मेटिज्म में दूर और नज़दीक की चीज़े धुंधली दिखाई देती हैं। 

क्या दृष्टि दोष पूरी तरह से ठीक हो सकता है?

अध्ययन बताते हैं कि आंखों की रौशनी को ख़राब होने के बाद पूर्ण रूप से कभी ठीक नहीं किया जा सकता है। आंखों की रौशनी को ठीक करने का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। शोध पत्र के अनुसार हरी पत्तेदार सब्जियों में एंटी-बायोटिक, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-एनाल्जेसिक, एंटी-ऑक्सीडेंट के गुण पाए जाते हैं, लेकिन इनसे आंखों की रोशनी पूरी तरह ठीक होने का कोई भी दावा मौजूद नहीं है। 

आंखों का स्वास्थ्य कई मानकों दिनचर्या, खानपान, समय-समय पर नेत्र जांच,आनुवांशिकता इत्यादि पर निर्भर करता है लेकिन आंखों की रोशनी वापस आने को लेकर कोई प्रमाण या रिसर्च पैपर मौजूद नहीं हैं।

Dr-Naveen-Gupta-Opthalmology

डॉ. नवीन गुप्ता, डीएनबी (ऑप्थल्मोलॉजी) बताते हैं कि ”’आंखों के स्वास्थ्य के लिए अच्छा’ और ‘दृष्टि में सुधार कर सकते हैं’ कथन में अंतर है। लेकिन अधिकांश लोग इन दोनों के बीच भ्रम की स्थिति में रहते हैं क्योंकि आंखों की रोशनी बढ़ाने से अगर मतलब चश्मे की संख्या कम करने से है, तो ऐसा हरगिज नहीं है।” 

Eye surgeon

नेत्र सर्जन डॉ. आफताब आलम, एमबीबीएस, डीओ (नेत्र विज्ञान) बताते हैं, “सब्जियों का सेवन आंखों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अच्छा माना जाता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे दृष्टि में सुधार करेंगे। ऐसे दावों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।”

शोध बताते हैं कि मधुमेह, Macular Degeneration, Traumatic injuries, Glaucoma अंधापन के मुख्य कारण हैं। अंधापन भी कई प्रकार का हो सकता है, जैसे- वर्णांधता (कलर ब्लाइंडनेस), रतौंधी (नाइट ब्लाइंडनेस), हिमांधता (स्नो ब्लाइंडनेस)। अगर किसी व्यक्ति को रेटिनल डिटैचमेंट के कारण अंधापन हो, तो उसे ठीक नहीं किया जा सकता। आंखों के रोगों का निदान केवल उसके कारणों को जानकर ही किया जा सकता है, लेकिन अंधापन को ठीक किया जा सके, ऐसा कोई प्रमाण या शोधपत्र (रिसर्च पेपर) नहीं है। 

फेसबुक पर जारी वीडियो का सच क्या है?

इस वीडियो को Narrasse नामक फेसबुक प्रोफाइल से साझा किया गया है, जिसमें मशहूर पत्रकार रजत शर्मा और अन्य दो व्यक्तियों के वास्तविक वीडियो को AI की मदद से संपादित किया गया है। Deepfake Analysis Unit द्वारा की गयी जांच से पता चलता है इस वीडियो को AI की मदद से तैयार किया गया है। जिसमें बताया गया है कि किसी भी वक्ता के साउंड बाइट पर किसी नाम का उल्लेख नहीं है, जबकि सामान्यतः न्यूज चैनल में वक्ता के नाम को दिखाया जाता है। वीडियो में विभिन्न बिंदुओं पर वक्ताओं के होठों की हरकत उनके भाषण के अनुरूप नहीं है। 

फेसबुक पर जिस वीडियो को जारी किया गया है, उसमें सबसे पहले जिन शख्सियत को दिखाया गया है, उसकी सटीक पहचान नहीं हो पा रही है। हमने गुगल रिवर्स इमेज की मदद ली और तस्वीर को क्रॉप करके गुगल पर सर्च भी किया लेकिन तस्वीर से संबंधित जानकारी नहीं मिली। हालांकि वीडियो के बैकग्राउंड से यह साफ है कि यह किसी राजनीतिक पार्टी से संबंधित हैं। अब एक कयास यह लगाया जा सकता है कि अगर किसी पार्टी के कार्यकर्ता या नेता गंभीर तौर पर बीमार होते हैं या किसी स्वस्थ समस्या से जूझते हैं, तो इसकी खबर तुरंत सोशल मीडिया पर जारी हो जाती है लेकिन वीडियो में जो चिह्न दिखाया गया है, उस राजनीतिक पार्टी से संबंधित हमें इस तरह की कोई खबर नहीं मिली, जिससे नेत्रदोष का पता चलता हो। इसके अलावा गुगल रिवर्स करने पर हमें यही वीडियो दोबारा मिली जो किसी और अकाउंट से पोस्ट की गयी है

दूसरे क्लिप में जिस शख्सियत को दिखाया गया है, उनकी पहचान के लिए भी हमने गुगल और गुगल रिवर्स इमेज का सहारा लिया मगर हमें उस तस्वीर से भी कोई जानकारी नहीं प्राप्त हुई।

वहीं हमने मशहूर पत्रकार रजत शर्मा एवं उनकी टीम से भी संपर्क करने की कोशिश की है ताकि वीडियो के बारे में उनसे जानकारी हासिल कर सकें। जब हमें उनकी तरफ से कोई जानकारी मिलेगी, तब हम अपने तथ्य जाँच को जरुर अपडेट करेंगे।

अतः उपर्युक्त जांच के आधार पर कहा जा सकता है कि यह दावा बिल्कुल गलत है। हमने पहले भी वायरल दावों की जांच की है, जैसे – छः दिनों में आंखों की दृष्टि ठीक हो सकती है। साथ ही हमने चेंजमेकर्स से संबंधित भी आलेख किया है, लगभग 70% सटीकता के साथ नेत्र रोग का पता लगाने के लिए विकसित किया एप

तथ्य जाँचः क्या जड़ी-बुटी के सेवन से किसी भी उम्र में लंबाई बढ़ाई जा सकती है? 

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सारांश 

फेसबुक पर जारी एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दावा किया जा रहा है कि जड़ी-बुटियों से बनी औषधि का सेवन करने से लंबाई बढ़ाई जा सकती है। जब हमने इस पोस्ट का तथ्य जाँच किया तब पाया कि यह दावा बिल्कुल गलत है। 

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दावा 

फेसबुक पर जारी एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दावा किया जा रहा है कि हर्बल जड़ी-बुटियों से बनी औषधि का सेवन करने से लंबाई बढ़ाई जा सकती है। 

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तथ्य जाँच 

लंबाई किन कारकों पर निर्भर करती है? 

किसी व्यक्ति की लंबाई मुख्य रूप से आनुवंशिक, पोषण और पर्यावरणीय कारकों के संयोजन से निर्धारित होती है। लंबाई में आनुवंशिकी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि किसी व्यक्ति की संभावित ऊंचाई काफी हद तक उनके माता-पिता से विरासत में मिलती है। विशेष रूप से बचपन और किशोरावस्था के दौरान उचित पोषण मिलना महत्वपूर्ण है क्योंकि आवश्यक पोषक तत्वों की कमी विकास को रोक सकती है। ग्रोथ हार्मोन और थायराइड जैसे हार्मोन भी लंबाई के कारकों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अतिरिक्त पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि और स्वस्थ वातावरण भी लंबाई को प्रभावित करते हैं। 

आमतौर पर किस उम्र में किसी व्यक्ति की लंबाई बढ़ना बंद हो जाती है? 

आमतौर पर व्यक्तियों की लंबाई किशोरावस्था के अंत से लेकर बीस के दशक की शुरुआत तक बढ़ना बंद हो जाती है यानी कि आमतौर पर 18 से 25 की उम्र के आसपास ही लंबाई बढ़ती है। लंबाई बढ़ना बंद होना, मुख्य रूप से हड्डियों में ग्रोथ प्लेट्स के बंद होने के कारण होती है।

क्या कोई आहार लंबाई बढ़ा सकता है? 

नहीं। एक बार जब किसी व्यक्ति की हड्डियों में ग्रोथ प्लेट्स का विकास बंद हो जाता है, तो लंबाई बढ़ने की प्रक्रिया बंद हो जाती है। इसके अलावा किशोरावस्था या वयस्कता में मुख्य रुप से पोषण पर ध्यान ना देने के कारण लंबाई नकारात्मक रुप से प्रभावित होती है। जब शरीर सक्रिय रूप से विकसित हो रहा होता है, तो लंबाई बढ़ने की संभावना ज्यादा होती है। एक बार जब ग्रोथ प्लेट्स आपस में जुड़ जाती हैं, तो भोजन और पोषण भी लंबाई को नहीं बढ़ा सकते।

क्या किसी जड़ी-बुटी से लंबाई बढ़ाई जा सकती है? 

नहीं। कुछ जड़ी बूटियों को लेकर बच्चों में किये गए शोध बताते हैं कि हर्बल जड़ी-बुटी लंबाई बढ़ाते हैं या नहीं, इस विषय में गहन शोध की आवश्यकता है। दीर्घकालिक नियंत्रित परीक्षणों की कमी के कारण, गर्भकालीन आयु (एसजीए) के लिए छोटे कद वाले किशोरों में ऊंचाई बढ़ाने के लिए ग्रोथ हार्मोन्स की प्रभावकारिता स्पष्ट नहीं है।। हालांकि इस शोध के परिणाम बताते हैं कि शोध के दौरान सटीक मानक प्राप्त नहीं हुए और परिणाम में एकरुपता भी दर्ज नहीं की गई। 

साथ ही वीडियो में कहा गया है कि इस औषधि का वर्णन आयुष मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में किया है लेकिन जब हमने आयुष मंत्रालय की वेबसाइट को खंगालना शुरु किया, तो वहां हमें इस तरह की कोई रिपोर्ट नहीं मिली। साथ ही हमने आयुष मंत्रालय के सोशल मीडिया अकाउंट X (पहले ट्विटवर) को देखा जहां एक पोस्ट जारी की गई है लेकिन उसके साथ ही वर्णित है कि विशेष स्थिति में स्वास्थ्य को लेकर किसी भी संदेह या समस्या के लिए कृपया डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें। साथ ही यहां भी लंबाई बढ़ाने को लेकर कोई जानकारी मौजूद नहीं है।

इसके अलावा इस फेसबुक पोस्ट में किन हर्बल जड़ी-बुटियों का इस्तेमाल किया गया है, इस बात की जानकारी नहीं दी गई है।

Dietitian Harita

डॉ. हरिता अध्वर्यु (Sr. Clinical Dietitian Ezcure Diabetes Care, Ahmedabad, Gujarat) बताती हैं कि, “किसी व्यक्ति की लंबाई आमतौर पर आनुवंशिकी या माता-पिता की लंबाई से निर्धारित होती है। बचपन और किशोरावस्था के दौरान उचित पोषण अच्छी लंबाई में योगदान से सकता है, लेकिन एक बार जब हड्डियों का विकास बंद हो जाता है, तो कोई भी उपचार या पोषण लंबाई बढ़ाने में मदद नहीं करेगा।”

अतः उपरोक्त निष्कर्षों के आधार पर कहा जा सकता है कि हर्बल जड़ी-बुटियों की मदद से लंबाई को किसी भी उम्र में नहीं बढ़ाया जा सकता है। हमने पहले भी इस तरह के दावों की जाँच की है, जैसे- राम किट हार्ट अटैक से बचा लेगी और पश्चिमोत्तानासन करने से किसी भी उम्र में बढ़ सकती है लंबाई

तथ्य जाँच: क्या टूटे हुए दांतों को दंत चिकित्सक के बिना बदला जा सकता है? 

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सारांश 

एक वीडियो पोस्ट के जरिए दावा किया जा रहा है कि सामने के टूटे हुए दांत को बिना किसी दंत चिकित्सक की मदद से कृत्रिम दांत से बदला जा सकता है। जब हमने इस पोस्ट का तथ्य जाँच किया तब पाया कि यह दावा बिल्कुल गलत है। 

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दावा 

फेसबुक पर जारी एक वीडियो पोस्ट के जरिए दावा किया जा रहा है कि सामने के टूटे हुए दांत को बिना किसी दंत चिकित्सक की मदद से बदला जा सकता है, यानी कि नए दांत को लगाया जा सकता है, जो कृत्रिम हो।

Tooth DIY claim

तथ्य जाँच 

क्या टूटे हुए दांतों को दंत चिकित्सक के बिना बदला जाना चाहिए? 

नहीं। एक टूटे हुए दांत या टूटे हुए दांतों के एक सेट को कभी भी दंत चिकित्सक के बिना डू-इट-योरसेल्फ यानी कि DIY तकनीकों से नहीं बदला जाना चाहिए। DIY क्राउन या डेन्चर सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि उन्हें फिट करने और बनाने के लिए उचित प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। उचित ज्ञान और प्रशिक्षण के बिना DIY तरीके से लगाए गए दांत खराब फिटिंग या अन्य दंत समस्याओं को उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे असुविधा, दर्द, संक्रमण और यहां तक कि दांतों और मसूड़ों को नुकसान हो सकता है

DIY डेन्चर या क्राउन वाले प्लास्टिक के दांतों के कारण भोजन के कण दांतों या मसूड़ों के बीच फंस सकते हैं, जिससे सड़न और सांसों की दुर्गंध हो सकती है। लंबी अवधि में इससे अपरिवर्तनीय क्षति हो सकती है, जो मसूड़ों और हड्डियों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा मुंह में डाली गई कोई भी वस्तु दम घुटने का संभावित खतरा पैदा करती है क्योंकि यह कभी भी उखड़ सकती है और श्वास नली या भोजन नली में फंस सकती है।

इसके अलावा जब आप एक दंत चिकित्सक से संपर्क करते हैं, तो वे आपकी अंतर्निहित दंत समस्याओं की पहचान और समाधान कर सकते हैं, जो दांतों को सेहतमंद बनाने में योगदान कर सकते हैं। 

दंत चिकित्सक डॉ. पूजा भारद्वाज बताती हैं “दांतों का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज बच्चा है या वयस्क है, क्योंकि जब एक छोटे बच्चे के दूध (प्राथमिक) के दांत टूट जाते हैं, तो उसके स्थान पर उसके अपने स्थायी दांत आ जाते हैं लेकिन वयस्कों को दंत चिकित्सक की सहायता की आवश्यकता होती है क्योंकि वयस्क होने पर दांत स्वयं विकसित नहीं होते हैं।”

वे आगे बताती हैं कि ऐसे में दंत चिकित्सक रोगी को उपचार की लागत और दीर्घकालिक स्थायित्व के साथ-साथ प्रत्यारोपण, फिक्स्ड ब्रिज, फ़्लिपर (हटाने योग्य आंशिक डेन्चर) और मैरीलैंड ब्रिज जैसे सभी संभावित विकल्पों के बारे में मार्गदर्शन करते हैं। देखा जाए, तो टूटे हुए दांत मुंह के सौंदर्य, कार्यक्षमता और खाने और बोलने में कठिनाई में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं। इसके अलावा जो दांत ढीले हो जाते हैं, वे अनेक समस्याएं उत्पन्न करते हैं इसलिए संभावित परिणामों के लिए व्यक्ति को हमेशा दंत चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। 

दंत चिकित्सक टूटे हुए दांत को कैसे बदलते हैं? 

मरीज की जरूरतों और परिस्थितियों के आधार पर दंत चिकित्सक कई तरीकों से टूटे हुए दांत को बदल सकते हैं। दंत चिकित्सक सबसे उपयुक्त विकल्प की सिफारिश करने से पहले मरीज के मुंह के स्वास्थ्य, चिकित्सीय इतिहास और वरीयताओं का मूल्यांकन करते हैं ताकि इलाज को सफल बनाया जा सके। 

टूटे हुए दांतों को बदलने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कुछ सामान्य तरीके निम्नलिखित हैं- 

  • डेंटल इम्प्लांट (Dental implants): डेंटल इम्प्लांट को खोए हुए दांतों को बदलने के लिए सबसे अच्छे विकल्पों में से एक माना जाता है। इन्हें सर्जिकल रूप से जड़ाव में डाला जाता है और ये डेंटल क्राउन के लिए आधार का काम करते हैं। डेंटल इम्प्लांट बहुत टिकाऊ होते हैं और उचित देखभाल के साथ जीवन भर चल सकते हैं।
  • डेंटल ब्रिज (Dental bridges): डेंटल ब्रिज एक निश्चित प्रकार का पुनर्स्थापन है, जिसका उपयोग एक या एक से अधिक टूटे हुए दांतों को बदलने के लिए किया जाता है। यह कृत्रिम दांतों से बना होता है, जो उन दांतों पर लगाए गए क्राउन से जुड़े होता है, जो खाली जगह के दोनों ओर होते हैं। डेंटल ब्रिज उन लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प है, जिनके दो स्वस्थ दांतों के बीच टूटे हुए दांत से बनी खाली जगह होती है। 
  • डेन्चर (Dentures): डेन्चर कृत्रिम दांत होते हैं, जो निकाले गए दांतों को बदलने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। ये पूरे डेन्चर हो सकते हैं, जो ऊपरी या निचले जबड़े में सभी दांतों को बदल देते हैं, या आंशिक डेन्चर, जो कुछ दांतों को बदल देते हैं। डेन्चर उन लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प है, जिन्होंने अपने सभी या अधिकांश दांत खो दिए हैं।
  • फ्लिपर (Flippers): फ्लिपर एक अस्थायी रूप से निकाला जा सकने वाला आंशिक डेन्चर है, जिसका उपयोग एक या कुछ खोए हुए दांतों को बदलने के लिए किया जाता है। फ्लिपर उन लोगों के लिए एक अच्छा विकल्प है, जो अपने खोए हुए दांतों के स्थायी प्रतिस्थापन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

अतः उपरोक्त शोध पत्रों और चिकित्सक के बयान के आधार पर कहा जा सकता है कि यह दावा बिल्कुल गलत है क्योंकि इस वीडियो में भी बिना किसी दंत चिकित्सक के दांतों को प्रतिस्थापित करने की बात दिखाई गई है, जो लोगों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न करती है। 

हमने पहले भी इस तरह के दावों की जाँच की है, जैसे-  घरेलू उपायों के जरिए दांतों को सफेद किया जा सकता है और नमक और सरसों का तेल दांतों का पीलापन खत्म कर सकता है.

तथ्य जाँचः क्या पूरे भारत की सरकारी दुकानों में टीबी की दवाई खत्म हो गई है?

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सारांश 

एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए यह दावा किया जा रहा है कि सरकारी दुकानों में टी बी दवाइयां खत्म हो गई हैं। जब हमने इस पोस्ट की तथ्य जाँच की तब पाया कि यह दावा अधिकतर गलत है। 

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दावा 

एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दावा किया जा रहा है कि सरकारी आउटलेट से क्षय रोग (TB) की टेबलेट खत्म हो गई है। पूरे भारत में मरीज बेहद नाराज़ हैं। कृपया चुनाव तिथि से पहले पूरे भारत में उपलब्ध कराएं। 

तथ्य जाँच 

क्या सरकारी दुकानों में टीबी की दवाई खत्म हो गई है?

नहीं। सरकारी दुकानों में टी.बी दवाइयां खत्म वाली मीडिया रिपोर्ट अधिकतर झूठी और भ्रामक हैं। देश में सभी टीबी रोधी दवाएं छह महीने और उससे अधिक की समयावधि के लिए पर्याप्त स्टॉक के साथ उपलब्ध हैं। पीआईबी (PIB) के अनुसार ऐसी रिपोर्ट जानबूझकर लोगों को धोखा देने और गुमराह करने के इरादे से फैलाई जा रही हैं।

PIB पर जारी जानकारी के अनुसार जो टीबी दवा के प्रति संवेदनशील होती है, उसके उपचार में दो महीने के लिए 4FDC (Isoniazid, Rifampicin, Ethambutol और Pyrazinamide) के रूप में उपलब्ध चार दवाएं शामिल हैं। इसके बाद दो महीने के लिए 3 FDC (Isoniazid, Rifampicin, Ethambutol) के रूप में उपलब्ध तीन दवाएं शामिल हैं। ये सभी दवाएं छह महीने और उससे अधिक की समयावधि के लिए पर्याप्त स्टॉक के साथ उपलब्ध हैं। वित्त वर्ष 2024-25 के लिए इन दवाओं की खरीद प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

क्या राज्यों में टीबी दवाओं की आपूर्ति हो रही है?

राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम [National TB Elimination Programme (NTEP)] के तहत केंद्रीय स्तर पर टीबी रोधी दवाओं और अन्य सामग्रियों की खरीद, भंडारण, स्टॉक का रखरखाव और समय पर वितरण किया जा रहा है। दुर्लभ स्थितियों में, राज्यों से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन [National Health Mission (NHM)] के तहत बजट का उपयोग करके सीमित अवधि के लिए स्थानीय स्तर पर कुछ दवाएं खरीदने का अनुरोध किया जाता है ताकि व्यक्तिगत रोगी देखभाल प्रभावित न हो।

NTEP (राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम) के तहत Moxifloxacin 400mg और Pyridoxine का 15 महीने से अधिक का स्टॉक उपलब्ध है। इसके अलावा, अगस्त 2023 में Delamanid 50 mg और Clofazimine 100 mg खरीदे गए हैं और सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में आपूर्ति की गई है। इसके साथ ही करीब 8 लाख अतिरिक्त Delamanid 50 mg टैबलेट की आपूर्ति के लिए 23.09.2023 को पी.ओ. जारी किया गया है।

उल्लिखित स्टॉक के अलावा अगस्त 2023 में 3 FDC (P), Linezolid-600mg और Cap Cycloserine-250 mg की आपूर्ति के लिए खरीद आदेश जारी किए गए थे। 3 FDC(P) के लिए पूर्व प्रेषण निरीक्षण (PDI), Linezolid-600mg और Cap Cycloserine-250 mg और3 FDC(P) और Cycloserine की गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट भी आ गई है। इन दवाओं को राज्यों में भेजा जा रहा है। 25.09.2023 से रिलीज़ ऑर्डर जारी किए जा रहे हैं।

National Tuberculosis Elimination Programme के अनुसार वर्ष 2024 तक उन्मूलन का लक्ष्य रखा गया है। टीबी रोगियों की अलग-अलग देखभाल के लिए एक व्यापक पैकेज के लिए तकनीकी मार्गदर्शन 2021 में शुरू किया गया था। कई बार यह देखा गया है कि सप्लाई चैन में होने वाली गड़बड़ियों की वजह से कुछ क्षेत्रों में दवाइयां पहुंचाने में देर हो सकती है लेकिन फिर भी समय पर चिकित्सा केंद्रों में दवाई की आपूर्ति करना केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी होती है। हमारी जांच में अधिकतर दुकानों में दवाई पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध पाई गयी।

अतः उपर्युक्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार कहा जा सकता है कि यह दावा अधिकतर गलत है। सरकारी दुकानों में टीबी के दवाओं की कमी को लेकर गलत दावे किए जा रहे हैं। हमने पहले भी इस तरह के दावों की जांच की है, जैसे –  प्रधानमंत्री का आरक्षण विरोधी भाषण चुनाव से प्रेरित है और नारियल तेल और एलोवेरा जेल की मदद से स्ट्रेच मार्क्स को हटाया जा सकता है। 

तथ्य जाँचः क्या भीगे बादाम के छिलकों में कैंसर कारक गुण होते हैं?

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क्या बादाम के छिलके कैंसर के विकास का कारण बन सकते हैं?
वास्तव में नहीं। यह सुझाव देने के लिए कोई पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि बादाम के छिलके कैंसर के विकास का कारण बन सकते हैं। बादाम एक लोकप्रिय असूखे मेवे की श्रेणी में आता है और आमतौर पर दुनिया भर में खाया जाता है। बादाम के छिलकों में एंटीऑक्सीडेंट और फाइबर सहित विभिन्न लाभकारी यौगिक होते हैं।





सारांश 

एक वीडियो पोस्ट के जरिए दावा किया जा रहा है कि भीगे बादाम खाने से कैंसर होने की संभावना होती है। जब हमने इस पोस्ट का तथ्य जाँच किया तब पाया कि यह दावा ज्यादातर गलत है। 

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दावा 

इंस्टाग्राम पर जारी एक वीडियो पोस्ट के जरिए दावा किया जा रहा है कि बादाम खाने से कैंसर होने की संभावना होती है। 

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तथ्य जाँच 

क्या बादाम में कोई आत्मरक्षा प्रणाली होती है?

हां, बादाम के पेड़ों में कई आत्मरक्षा तंत्र होते हैं, जो उन्हें संभावित खतरों से बचाने में मदद करते हैं। इस पेड़ की प्राथमिक रक्षा रणनीतियों में से एक ऐसे यौगिकों का उत्पादन शामिल है, जो शाकाहारी जीवों के लिए विषाक्त या अरुचिकर हो सकते हैं। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि बादाम के छिलके में टैनिन और फेनोलिक यौगिक जैसे पदार्थ होते हैं, जो उनके थोड़े कड़वे स्वाद में योगदान करते हैं। ये यौगिक निवारक के रूप में कार्य कर सकते हैं, जिससे जानवरों द्वारा बाहरी सुरक्षात्मक परत को खाने की संभावना कम हो जाती है। 

क्या भीगे बादाम में कैंसर कारक तत्व छिलके के नीचे आ जाते हैं? 

नहीं, बादाम को पानी में रखने के बाद कैंसर कारक पदार्थ आमतौर पर सतह पर नहीं आते हैं। बादाम के अंकुरण की प्रक्रिया में एंजाइमों की सक्रियता और उसकी संरचना में परिवर्तन शामिल होता है क्योंकि यह एक नए पौधे के रूप में विकसित होना शुरू होता है। पौधों के प्राकृतिक विकास चक्र के हिस्से के रूप में इस प्रक्रिया का कैंसर कारक पदार्थों से कोई संबंध नहीं है।

1982 का अध्ययन क्या कहता है?

1982 के एक अध्ययन से पता चला है कि 67 वर्षीय महिला (जिनका वजन 60 किलोग्राम था) को अस्पताल में भर्ती होने से एक साल पहले बड़ी आंत के कैंसर (कार्सिनोमा) का पता चला था। उनका ट्यूमर ऑपरेशन योग्य नहीं था इसलिए मरीज ने सर्जिकल हस्तक्षेप और कीमोथेरेपी पर विचार करने से इनकार कर दिया। अस्पताल में भर्ती होने से पहले आठ महीनों तक मरीज ने स्वतंत्र रूप से मेक्सिको से लाए जाने वाले इंजेक्शन लेट्राइल का उपयोग किया। बाद में उन्होंने आर्थिक तंगी के कारण लेट्राइल टैबलेट लेना शुरू कर दिया। 

इस तरह का उपचार करने से लगभग दो सप्ताह पहले उन्हें एक दोस्त ने प्रोटीन सेवन बढ़ाने का दावा करते हुए कड़वे बादाम दिए थे। बादाम खाने के बाद उन्हें चक्कर आना, मितली, उल्टी और पेट दर्द के लक्षण महसूस हुए। हालांकि कभी-कभी उन्हें आराम महसूस होता है लेकिन उन्होंने कड़वे बादाम का सेवन करने की इस प्रक्रिया को जारी रखा, जिसके परिणामस्वरूप पेट में गंभीर दर्द हुआ और वे बेहोश हो गईं। पैरामेडिक्स ने अस्पताल के रास्ते में नालोक्सोन हाइड्रोक्लोराइड और डेक्सट्रोज़ घोल दिया, जो अप्रभावी साबित हुआ। आपातकालीन कक्ष में पहुंचने पर मरीज़ शिथिल हो गया।

अस्पताल में मरीज को लगातार उपचार दिए गए, जिसके परिणास्वरुप उनकी स्थिति में सुधार हुआ और अंततः उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। हालांकि रक्त के नमूनों की जब जाँच की गई, तो उससे साइनाइड के स्तर और मेथेमोग्लोबिन प्रतिशत का पता चला, जिसे उपचार शुरू करने के संबंध में समय के साथ प्लॉट किया गया था। यह मामला कड़वे बादाम की घातक खुराक के सेवन से उत्पन्न साइनाइड का एक गंभीर उदाहरण है।

क्या बादाम की त्वचा में कैंसर कारक गुण होते हैं?

नहीं, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, जो बताता हो कि बादाम के छिलके में कैंसरकारी गुण होते हैं। बादाम अपने पोषक तत्व और स्वास्थ्य लाभों के लिए व्यापक रूप से जाना जाता है। वे स्वस्थ वसा, प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और खनिजों का एक समृद्ध स्रोत हैं।

Oncologist

रंगाडोर मेमोरियल अस्पताल, बेंगलुरु में सलाहकार सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. कविता जैन ने कहा, “बादाम को भिगोना हानिरहित है और कैंसर पैदा करने वाला नहीं है। यह वास्तव में इसकी पाचनशक्ति को बढ़ाता है।” 

वे आगे बताती हैं कि बादाम के छिलकों में एंटीऑक्सिडेंट और आहार फाइबर जैसे विभिन्न यौगिक होते हैं, जो उनके संभावित स्वास्थ्य-प्रचार प्रभावों में योगदान करते हैं। खाद्य पदार्थों में कार्सिनोजेनिक गुण आमतौर पर कुछ रसायनों या पदार्थों की उपस्थिति से जुड़े होते हैं, जो कैंसर के खतरे को बढ़ाने वाले साबित हुए हैं। आमतौर पर बादाम और उसके छिलके में कैंसर कारक यौगिक होने की जानकारी नहीं है।

Dr Swati Dave, Phd in Food and Nutrition

पोषण विशेषज्ञ डॉ. स्वाति दवे बताती हैं, “बादाम के छिलके में टैनिन और फाइटिक एसिड जैसे एंटी-पोषक तत्व होते हैं। बादाम को पानी में भिगोने के साथ-साथ सिरका या नींबू के रस जैसे अम्लीय माध्यम का स्पर्श करने से फाइटिक एसिड की उपस्थिति कम हो जाती है। यह भिगोने की प्रक्रिया फाइटिक एसिड को कम से कम 7 घंटे में प्रभावी ढंग से बेअसर कर सकती है। हालांकि, बादाम के जरिए उपचार करने की प्रक्रिया के संबंध में सतर्क रहना महत्वपूर्ण है। उपचार के दौरान कठोर और खराब गुणवत्ता वाले रसायनों के इस्तेमाल से अधिक मात्रा में सेवन करने पर ‘एक्रिलामाइड’ नामक कैंसर कारक के संपर्क में आने की संभावना हो सकती है। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए, भीगे हुए बादाम चुनने की सलाह दी जाती है। कच्चे या भूने हुए बादाम की बजाय भीगे हुए बादाम का चयन करना एक स्वास्थ्यवर्धक विकल्प है। भीगे हुए बादाम ना केवल चबाने में आसान होते हैं, बल्कि वे आसानी से पचने में मदद करके पाचन तंत्र में भी सहायता करते हैं। 

Botanist

वनस्पति शास्त्री निधि सिंह बताती हैं, “कच्चे और भुने हुए बादाम दोनों ही आहार के रुप में एक आदर्श विकल्प हैं। वे विटामिन ई, मैंगनीज, ओमेगा-3 और 6 फैटी एसिड जैसे लाभकारी पोषक तत्वों का एक अच्छा स्रोत हैं, लेकिन इनका सेवन भी कम मात्रा में किया जाना चाहिए। बादाम, ब्राजील नट्स और पिस्ता जैसे मेवों में एक्रिलामाइड और मायकोटॉक्सिन एफ्लाटॉक्सिन की थोड़ी मात्रा भी होती है, जो लंबे समय तक उच्च जोखिम (यदि बड़ी मात्रा में सेवन किया जाता है) के साथ उपभोक्ताओं के शरीर में जमा हो सकता है। पशु और महामारी विज्ञान दोनों अध्ययन एफ्लाटॉक्सिन और यकृत कैंसर (liver cancer) के बीच मजबूत संबंध दिखाते हैं। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि नट्स और अनाज को भिगोने, अंकुरित करने, भूनने या किण्वित करने से एफ्लाटॉक्सिन की उपस्थिति काफी कम हो जाती है।

Voomika Mukherjee, Health & Nutrition Life Coach

स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञ वूमिका मुखर्जी बताती हैं, इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि बादाम के छिलके को भिगोने से कोई कैंसरकारी घटक होता है। बादाम के छिलके एंटीऑक्सीडेंट, आहार फाइबर और अन्य लाभकारी यौगिकों से भरपूर होते हैं। वास्तव में इन्हें अक्सर संभावित स्वास्थ्य लाभ माना जाता है, जिसमें इसके ओमेगा -3 गुणों के कारण हृदय रोग और मधुमेह जैसी पुरानी बीमारियों के जोखिम को कम करना भी शामिल है। 

वे आगे बताती हैं कि इसके अलावा, ऐसे कुछ अध्ययन हैं, जो कैंसर की रोकथाम से संबंधित हैं। विशेष रूप से प्रोस्टेट, स्तन और पेट के कैंसर के बीच संबंध जोड़ा जा सकता है। इसी तरह बादाम में भी सैलिसिलेट होता है। चूंकि सैलिसिन प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला सैलिसिलेट है इसलिए ऐसा माना जाता है कि बादाम सिरदर्द या यहां तक कि माइग्रेन को पूरी तरह से ठीक कर सकता है। 

अंतः विशेषज्ञों के साथ गहन शोध और परामर्श के बाद हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बादाम दुनिया भर में खाया जाने वाला एक अत्यधिक लोकप्रिय सूखा मेवा है। इसके अलावा इस बात का सुझाव देने वाले ठोस वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी है कि बादाम के छिलकों में कैंसर कारक यौगित होते हैं। 

हमने पहले भी इस तरह के तथ्य जाँच किए है, जैसे- बादाम और काली मिर्च का सेवन आंखों की रौशनी ठीक कर सकता है और अखरोट का सेवन शुक्राणु की गुणवत्ता में सुधार करता है.

कांटी थर्मल पॉवर प्लांट, जहां लोग चुका रहे विकास की कीमत 

मुजफ्फरपुर जिला मुख्यालय से तकरीबन 15-16 किलोमीटर की दूरी पर कांटी शहर स्थित है, जिसके पास से गंडक नदी भी गुजरती है, जिससे यहां का इलाका काफी हरा-भरा रहता है। नदी के गुजरने के कारण आसपास अनेक तलाब बन गए हैं। यहां के लोग जीवनयापन करने के लिए खेती, मछली पालन, पशुपालन और यही स्थित कांटी थर्मल पॉवर प्लांट में कोयला आदि ढोने का काम करके अपनी जिंदगी की गाड़ी चला रहे हैं। 

Kanti power station

कांटी में साल 1985 में एक कोल बेस्ड थर्मल पावर स्टेशन लगाया गया था, जिसे आम बोलचाल की भाषा में कांटी थर्मल प्लांट भी कहा जाता है। NTPC के इस पावर प्लांट में कोयला जलाकर बिजली बनाने का काम शुरु हुआ था। लोगों को उम्मीद थी कि काम शुरु होने से उन्हें भी रोजगार का अवसर मिलेगा क्योंकि यहां से गुजरने वाली ट्रेने भी कोयला ढोने का काम करती हैं, ताकि बिना रुके सुचारु ढंग से बिजली उत्पादन का काम चलता रहे। 

सस्ता लेकिन जहरीला

भले ही कोयला से बिजली उत्पादन करना एक सस्ता तरीका है लेकिन यह तरीका काफी नुकसानदायक है। यही कारण है कि जिस भी इलाके में थर्मल पॉवर प्लांट लगाया जाता है, वहां इस बात का ख्याल रखा जाता है कि आसपास घनी आबादी ना हो। मगर मुजफ्फरपुर के कांटी प्रखंड के अंतर्गत कोठियां गांव की आबादी करीब 5000 लोगों की है। हालांकि, प्लांट लगने के बाद कुछ लोगों को रोजगार तो मिला लेकिन इससे काफी सारे लोगों को त्वचा संबंधी दिक्कत, दमा, हार्ट अटैक इत्यादि स्वास्थ संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा। 

कोयला जलने से कार्बन डाई ऑक्साइड, क्लोरोफ्लोरो कार्बन्स और मिथेन जैसी जहरीली गैसों के साथ-साथ राख भी निकलती है। इस प्लांट से दो तरह की राख निकलती है। पहली, महीन कणें जो उड़कर हवा में मिल जाती है, इसे फ्लाई ऐश कहा जाता है। यह राख थर्मल पावर प्लांट के आसपास के इलाकों में उड़ती रहती है, जिससे पावर प्लांट के नजदीक रहने वाले लोगों में सांस के जरिये राख के टुकड़े फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। इससे लोगों को सांस संबंधी बीमारियां होती हैं। 

वहीं दूसरी प्रकार की राख तरल पदार्थ के रुप में निकलती है। आम बोलचाल की भाषा में इसे ‘छाई’ या बॉटम ऐश भी कहा जाता है। यह आसपास के तालाब, नदी और नहर के पानी में मिल जाती है फिर इसी पानी से फसलों की सिंचाई होती है, मवेशियों को नहलाने का काम होता है और वहां रहने वाले लोग भी इसी पानी का इस्तेमाल करते हैं। 

स्थानीय निवासी सत्यनारायण साहनी ने बढ़ते और अनियंत्रित प्रदूषण के खतरे के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में शिकायत दर्ज की। पावर प्लांट अधिकारियों से नाराज NGT ने बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (BSPCB)) को कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। 

सत्यनारायण साहनी बताते हैं, “मैं 1988 से इस लड़ाई में हूं कि कांटी थर्मल पॉवर प्लांट के प्रदूषण से स्थानीय लोगों को बचाया जा सके लेकिन अफसोस, अब तक कोई सुखद परिणाम हासिल नहीं हुआ। मैं किसी को दोष नहीं देना चाहता पर इतना जरुर कहना चाहता हूं कि स्थानीय गांव के लोगों को इस प्रदूषण के कारण कैंसर, टीबी, त्वचा संबंधित, सांस संबंधित बीमारियां घेर रही हैं।” 

सब कुछ है प्रदूषित

साहनी आगे बताते हैं, “स्थानीय तौर पर हम लोगों ने पौधारोपण का काम किया, जिससे थोड़ी राहत मिली लेकिन पुरवा या पछवा हवा के तेज गति में चलते ही दिक्कत होती है। यहां गेट नंबर तीन पर बनाए गए बांध के कारण तालाब में प्रदूषित पानी आता है, जिसमें फ्लाई ऐश यानी की हवा में मिली राख निकलती है, जिसमें जले हुए कोयले का अवशेष होता है। इससे यहां के पौधे, फसल, मवेशी, मछली सब कुछ प्रभावित हो गए हैं।”   

वे बताते हैं कि BSPCB द्वारा किए गए निरीक्षण में कांटी थर्मल पॉवर प्लांट में फ्लाई ऐश तालाबों का कोई रखरखाव नहीं किया गया है। तालाबों के पास फ्लाई ऐश घोल फ़ेंक दिया जाता है और औद्योगिक कचरे के लिए कोई अलग नाली भी नहीं है। 

निवासी हैं परेशान 

कोठियां गांव निवासी फूलो देवी बताती हैं, “घर में छाई (राख) घुस जाती है और हमारे खाने में भी पड़ जाती है। पेड़-पौधे भी हरे-भरे नहीं रहते हैं और मवेशियों को भी काफी नुकसान पहुंचा है। राख के टुकड़े आंखों में भी चले जाते हैं, जिससे गांव वालों की आंख भी कमजोर हो रही हैं। आंधी चलने पर राख घर में घुस जाती है और इसके साथ पूरे गांव का सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इससे स्त्रियां, बच्चे व बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित हैं क्योंकि उन्हें ज्यादा समय तक कमरे में बंद करके रखना मुश्किल है। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं की परेशानी दुगुनी हो जाती है इसलिए प्रसव के पहले और प्रसव के बाद कोई भी इस गांव में रहने की हिम्मत नहीं करता है।” 

कोठियां गांव निवासी राम विलास राख ढोने का काम करते थे लेकिन वहां उनकी सुरक्षा का ख्याल नहीं रखा जाता था। उनके पैरों में घाव हो गया है, जिसका कारण चिकित्सकों ने कांटी थर्मल पॉवर प्लांट से निकलता प्रदूषण बताया। इसके परिणामस्वरूप, पिछले साल 60 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। उनके पुत्र अर्जुन बताते हैं कि उनके पिता के पैरों में एक जख्म हुआ था, जिसके इलाज को लेकर उन्होंने काफी प्रयास किया मगर वे बच नहीं सके। वर्तमान में, अर्जुन भी राख ढोने का काम कर रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। 

किसकी है जिम्मेदारी?

कांटी थर्मल प्लांट के एक अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर कहा, “पिछले दो दशकों में फ्लाई ऐश की धारणा ‘खतरनाक अपशिष्ट’ से ‘संसाधनपूर्ण सामग्री’ के रूप में पूरी तरह से बदल गई है। यह मुख्यतः औद्योगिक परिप्रेक्ष्य के कारण है। सामाजिक रूप से थर्मल प्लांट की स्थापना के बाद से फ्लाई ऐश द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाने और साथ ही प्रदूषण के स्तर को बढ़ाने की शिकायतें मिली हैं। कुल मिलाकर, फ्लाई ऐश के प्रबंधन की जिम्मेदारी थर्मल प्लांट प्रबंधन की है। 

यदि देखा जाए तो दिन-रात कांटी थर्मल इलाके और कोठियां गांव के लोगों के फेफड़ों में रोजाना ज़हर घुल रहा है। उनकी आजीविका के साधन रहे तालाब नष्ट होते जा रहे हैं, किसानों की पैदावार कम हो गई है, लीची के पेड़ भी सूखने लगे हैं। हर वो बीमारी जो प्रदूषण के कारण होती है, वे सारी बीमारियां लोगों को घेर रही हैं लेकिन इसके बावजूद भी कोई सुनने वाला नहीं है। 

सत्यनारायण साहनी ने अंत में कहा, “मैं ये लड़ाई लड़ते-लड़ते थक गया हूं लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। हम विकासशील से विकसित होते-होते अपनी ही जान के साथ खेल रहे हैं। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं, जिसकी कीमत इन बेगुनाह लोगों को चुकानी पड़ रही है।”

क्या ग्लूकोमा एक वंशानुगत समस्या है?

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क्या ग्लूकोमा अनुवांशिक रूप से बढ़ता है?
ऐसा लगता है कि ग्लूकोमा का पारिवारिक संबंध है। यदि उनके परिवार में किसी को यह बीमारी थी तो लोगों को अधिक खतरा हो सकता है। जब परिवारों में ग्लूकोमा को कम करने की बात आती है, तो दो मुख्य तरीके होते हैं। पहिलकेँ ऑटोसोमल डोमिनेंट इनहेरिटेंस कहल जाइत अछि। हालांकि, दूसरे तरीके को ऑटोसोमल रिसेसिव इनहेरिटेंस कहा जाता है।

ग्लूकोमा से तात्पर्य आंखों की ऐसी समस्या है, जिसके कारण तंत्रिका नष्ट हो जाती है और लंबे समय तक लाइलाज रहने पर अंधेपन का रूप भी ले सकती है। चिकित्सा के क्षेत्र में यह चर्चा का विषय है कि क्या ग्लूकोमा एक वंशानुगत समस्या है या नहीं। इस लेख में वंशानुगत ग्लूकोमा और इसके विभिन्न वंशानुगत कारकों और पैर्टन का उल्लेख किया गया है।

क्या ग्लूकोमा में आनुवंशिक प्रवृत्ति होती है?

अध्ययनों से पता चलता है कि ग्लूकोमा के लिए एक आनुवंशिक प्रवृत्ति है, जिसमें पारिवारिक इतिहास वाले व्यक्तियों को अधिक जोखिम होता है। आनुवंशिक कारक ऑप्टिक तंत्रिका संरचना और कार्य को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे कुछ व्यक्तियों को इंट्राओकुलर दबाव बढ़ने का अधिक खतरा हो सकता है।

शोध से यह भी संकेत मिलता है कि ग्लूकोमा को एक वंशानुगत नेत्र रोग बनाने के लिए कई जीन परस्पर क्रिया करते हैं। जबकि शारीरिक कारक अक्सर इस प्रकार से जुड़े होते हैं, एक वंशानुगत घटक, प्रभावित व्यक्तियों के रिश्तेदारों के बीच एक उच्च प्रसार के साथ।

ऑटोसोमल डोमिनेंट/रिसेसिव इनहेरिटेंस ग्लूकोमा को कैसे प्रभावित करता है?

जब ग्लूकोमा और आनुवंशिकी की बात आती है, तो दो महत्वपूर्ण तरीके हैं जिनसे इसे परिवारों में फ़ैल रहा है। पहले वाले को ऑटोसोमल डोमिनेंट इनहेरिटेंस कहा जाता है। इस मामले में, परिवर्तित जीन की केवल एक प्रति होने से किसी व्यक्ति को ग्लूकोमा होने की संभावना अधिक हो जाती है। इसलिए, यदि किसी व्यक्ति को यह परिवर्तित जीन माँ या पिता से मिलता है, तो उनमें ग्लूकोमा होने की संभावना बढ़ जाती है। कुछ प्रकार के ग्लूकोमा, जैसे किशोर ओपन-एंगल ग्लूकोमा, इस तरह से काम करते हैं।

दूसरा तरीका ऑटोसोमल रिसेसिव इनहेरिटेंस है। किसी को इस प्रकार के ग्लूकोमा का खतरा होने के लिए, उन्हें बदले हुए जीन की दो प्रतियां प्राप्त करने की आवश्यकता होती है-एक माँ से और एक पिता से। यदि माता-पिता दोनों के पास इस परिवर्तित जीन की एक प्रति है, तो संभावना है कि उनके बच्चे को दोनों प्रतियां मिल सकती हैं और ग्लूकोमा का खतरा हो सकता है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि यदि किसी को इस परिदृश्य में एक माता-पिता से बदले हुए जीन की केवल एक प्रति मिलती है, तो वे जीन के वाहक हो सकते हैं लेकिन उन्हें ग्लूकोमा नहीं हो सकता है।

तो, सरल शब्दों में, ऑटोसोमल डोमिनेंट का मतलब है कि एक परिवर्तित जीन जोखिम को बढ़ाता है, जबकि ऑटोसोमल रिसेसिव का मतलब है कि दो परिवर्तित जीन की आवश्यकता होती है। इन प्रतिरूपों को समझने से परिवारों में ग्लूकोमा की संभावनाओं का अनुमान लगाने में मदद मिलती है, यह मार्गदर्शन करते हुए कि हम आनुवंशिक परामर्श और स्क्रीनिंग कैसे करते हैं।

ग्लूकोमा के खतरे में आनुवंशिकी और पर्यावरण कैसे परस्पर जुड़े हुए हैं?

जो जीन हमें अपने परिवार से विरासत में मिले हैं, वे कुछ लोगों को ग्लूकोमा होने की अधिक संभावना बना सकते हैं। यदि परिवार में किसी को ग्लूकोमा है, तो यह दूसरों के लिए संभावना बढ़ाता है। जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, ग्लूकोमा का खतरा बढ़ जाता है। उम्र बढ़ना, हमारे जीन के साथ मिलकर, हमारी आँखों को इस स्थिति के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है।

अलग-अलग नस्लों में ग्लूकोमा होने की अलग-अलग संभावना होती है। उदाहरण के लिए, अफ्रीकी अमेरिकियों को यह होने की अधिक संभावना है, यह दर्शाता है कि हमारी पृष्ठभूमि भी जोखिम को प्रभावित कर सकती है। अन्य कारक जैसे स्वास्थ्य की स्थिति और कुछ आंखों की चोटें संभावित ग्लूकोमा जोखिम कारक हैं।

ग्लूकोमा केवल जीन या आसपास के बारे में नहीं है; यह तब होता है जब ये दोनों चीजें मिल जाती हैं। जबकि जीन किसी को इसके होने की अधिक संभावना बना सकते हैं, यह अन्य पर्यावरणीय कारकों के साथ संयोजन है जो इसे बाहर लाता है।

जीन और पर्यावरण के इस मिश्रण को समझने से हमें ग्लूकोमा को प्रभावी ढंग से रोकने, जल्दी पता लगाने और इलाज करने के तरीके खोजने में मदद मिलती है। यह एक जटिल स्थिति है क्योंकि हर किसी का जोखिम अलग होता है, कुछ को अपने जीन से अधिक जोखिम होता है, कुछ को अपने पर्यावरण से, और अधिकांश के लिए, यह दोनों का मिश्रण है।

क्या ग्लूकोमा में आई ड्रॉप का प्रयोग करना सुरक्षित है?

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क्या ग्लूकोमा आई ड्रॉप का उपयोग करना सुरक्षित है?
ग्लूकोमा आई ड्रॉप आँखों के दबाव को नियंत्रित करने में मदद करते हैं, लेकिन कभी-कभी वे लालिमा या धुंधली दृष्टि जैसी हल्की समस्याएं पैदा कर सकते हैं। ये दुष्प्रभाव आमतौर पर लंबे समय तक नहीं रहते हैं और अधिकांश लोगों को ड्रॉप्स की आदत हो जाती है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि इन ड्रॉप्स के साथ ग्लूकोमा के प्रबंधन के लाभ आमतौर पर छोटे जोखिमों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

ग्लूकोमा एक ऐसी स्थिति है जिसमें इंट्राओकुलर दबाव में वृद्धि और संभावित ऑप्टिक तंत्रिका क्षति सम्मिलित है। अतः ऐसी स्थिति में दृष्टि को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रबंधन की आवश्यकता होती है। विभिन्न उपचार विकल्पों में, ग्लूकोमा आई ड्रॉप इंट्राओकुलर दबाव को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चूंकि रोगी दीर्घकालिक देखभाल के लिए इन दवाओं पर भरोसा करते हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा के बारे में सवाल उठते हैं। यह लेख इस बात की पड़ताल करता है कि क्या ग्लूकोमा आई ड्रॉप सुरक्षित हैं। हम इन ड्रॉप्स के प्रणालीगत अवशोषण और शरीर पर उनके दीर्घकालिक प्रभावों पर भी चर्चा करेंगे।

क्या ग्लूकोमा आई ड्रॉप नेत्र स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा करते हैं?

ग्लूकोमा आई ड्रॉप की सुरक्षा अक्सर नेत्र स्वास्थ्य पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों के आसपास केंद्रित होती है। इंट्राओकुलर दबाव के प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण ये दवाएं कभी-कभी लालिमा, खुजली या जलन जैसे दुष्प्रभाव पैदा कर सकती हैं। कुछ रोगियों को धुंधली दृष्टि या आईरिस और पलकों के रंग में परिवर्तन जैसी समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है।

यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि ये दुष्प्रभाव आम तौर पर हल्के और अस्थायी होते हैं। अधिकांश रोगी समय के साथ आंखों की ड्रॉप्स के आदी हो जाते हैं। ग्लूकोमा को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लाभ आमतौर पर संभावित जोखिमों से अधिक होते हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञ आंखों की मौजूदा स्थितियों और संभावित दुष्प्रभावों को ध्यान में रखते हुए रोगी के समग्र स्वास्थ्य के आधार पर आंखों की ड्रॉप्स का सावधानीपूर्वक चयन करते हैं। ग्लूकोमा को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने लिए प्रभावकारिता और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।

ग्लूकोमा आई ड्रॉप की सुरक्षा नेत्र स्वास्थय के समग्र प्रबंधन में एक महत्वपूर्ण विचार है। यद्यपि नेत्र और प्रणालीगत स्वास्थ्य पर इन दवाइयों के संभावित दुष्प्रभावों के बारे में चिकित्सा समुदाय के भीतर आम सहमति नहीं है फिर भी इन दवाओं से होने वाले लाभों पर अधिक जोर दिया जाता है। नेत्र रोग विशेषज्ञ इन विचारों को नेविगेट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक रोगी के अद्वितीय स्वास्थ्य प्रोफ़ाइल के अनुरूप उपयुक्त नेत्र ड्रॉप्स का चयन करते हैं। रोगियों और नेत्र विशेषज्ञों के बीच प्रभावी संचार महत्वपूर्ण है, जिससे किसी भी चिंता या दुष्प्रभाव की समय पर पहचान और प्रबंधन की अनुमति मिलती है। ग्लूकोमा प्रबंधन से गुजरने वाले व्यक्तियों की सुरक्षा और कल्याण को प्राथमिकता देते हुए दृष्टि को संरक्षित करना व्यापक लक्ष्य है।

क्या ग्लूकोमा आई ड्रॉप के साथ प्रणालीगत अवशोषण एक चिंता का विषय है?

नेत्र दवाओं के स्थानीय प्रभावों के अलावा एक अन्य महत्वपूर्ण विचार ग्लूकोमा आई ड्रॉप्स का प्रणालीगत अवशोषण और समग्र स्वास्थ्य पर उनका संभावित प्रभाव है। कुछ दवाएं, जैसे कि बीटा-ब्लॉकर आई ड्रॉप, रक्तप्रवाह में अवशोषित की जा सकती हैं, जिससे प्रणालीगत दुष्प्रभावों के बारे में चिंता बढ़ जाती है। पहले से मौजूद हृदय या श्वसन संबंधी स्थितियों वाले व्यक्तियों को विशेष जोखिम हो सकता है।

इस चिंता को दूर करने के लिए कड़ी निगरानी आवश्यक है। नेत्र रोग विशेषज्ञ प्रणालीगत दुष्प्रभावों के किसी भी संकेत के लिए रोगियों का आकलन करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अन्य स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ सहयोग करते हैं। अनुकूलित करने के लिए सिलाई उपचार योजनाएँ व रोगी का चिकित्सा इतिहास संभावित जोखिमों को कम करने में मदद करता है। यदि प्रणालीगत दुष्प्रभाव एक महत्वपूर्ण चिंता पैदा करते हैं, तो रोगी के समग्र स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए वैकल्पिक दवाओं या उपचार के तरीकों का पता लगाया जा सकता है।

सर्वाइकल कैंसर परीक्षण कैसे किए जाते हैं?

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गर्भाशय ग्रीवा कैंसर परीक्षण की प्रक्रिया क्या है?
सर्वाइकल कैंसर के निदान तक पहुँचने के लिए कोलोनोस्कोपी, पंच बायोप्सी, एंडोसर्विकल क्यूरेटेज, कोन बायोप्सी या कोनाइजेशन सहित विभिन्न परीक्षण किए जाते हैं। हालाँकि, 21 वर्ष की आयु तक पहुँचने के बाद प्रत्येक महिला को नियमित पैप परीक्षण और एचपीवी परीक्षण करवाना चाहिए। यदि डॉक्टरों को कुछ असामान्य लगता है, तो वे गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के निदान की पुष्टि करने के लिए आगे के परीक्षणों की सिफारिश कर सकते हैं।

शुरू में, सर्वाइकल कैंसर किसी भी संकेत और लक्षण का कारण नहीं बन सकता है। हालांकि, उन्नत मामलों में, यह योनि से असामान्य रक्तस्राव या स्राव का कारण बन सकता है। इसके श्रोणि दर्द, संभोग के दौरान दर्द, जैसे अन्य लक्षण भी हो सकते हैं। इस लेख में, हम गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का निदान करने के तरीकों, इसकी पुष्टि करने के लिए परीक्षणों और क्या अल्ट्रासाउंड गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का पता लगा सकता है, इस पर चर्चा करेंगे।

आप सर्वाइकल कैंसर की जांच कैसे करते हैं?

पैप परीक्षण और एचपीवी परीक्षण दो परीक्षण हैं, जो गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के लिए नैदानिक परीक्षण नहीं, बल्कि स्क्रीनिंग परीक्षण हैं। वे निश्चित रूप से पुष्टि नहीं सकते कि आपको सर्वाइकल कैंसर है या नहीं। हालांकि, अगर किसी महिला का पैप परीक्षण या एचपीवी परीक्षण परिणाम असामान्य आता है, तो उन्हें कैंसर या पूर्व-कैंसर कोशिकाओं की उपस्थिति की पुष्टि करने के लिए आगे के परीक्षण कराने की आवश्यकता होगी।

स्क्रीनिंग की आवश्यकता उम्र के आधार पर अलग-अलग होती है। यदि एक महिला की आयु 30 से 65 वर्ष के बीच है, तो वह हर पांच साल में एचपीवी परीक्षण और हर तीन साल में पैप परीक्षण करा सकती है। 65 वर्ष की आयु के बाद, एक डॉक्टर को यह जांच करनी चाहिए कि क्या एक महिला को स्क्रीनिंग कराने की आवश्यकता है। यदि डॉक्टर को गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर होने का संदेह है, तो वे निदान की पुष्टि करने के लिए आगे के परीक्षणों की सलाह दे सकते हैं।

कैंसर की पुष्टि के लिए कौन से विशिष्ट परीक्षण किए जाने चाहिए?

कोलोनोस्कोपी एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ऐसी असामान्य कोशिकाओं का पता लगाने के लिए कोलोनोस्कोप नामक एक विशेष आवर्धक उपकरण का प्रयोग किया जाता है, जो कैंसर का कारण हो सकती हैं। कोलोनोस्कोपी के दौरान, डॉक्टर कोशिकाओं का अध्ययन करने के लिए बायोप्सी के माध्यम से गर्भाशय ग्रीवा कोशिकाओं का नमूना भी ले सकते हैं। नमूना लेने की प्रक्रियाएँ निम्नलिखित हैंः

पंच बायोप्सी (Punch Biopsy):- यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें ऊतक (टिशू) के एक छोटे गोल टुकड़े को एक तेज, खोखले, गोलाकार उपकरण का प्रयोग करके हटाया जाता है।

एंडोसर्विकल क्यूरेटेजः यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें एक चम्मच के आकार के उपकरण का उपयोग करके ग्रीवा नहर के अस्तर से ऊतक (टिशू) के एक नमूने को स्क्रैप किया जाता है, जिसे क्यूरेट कहा जाता है।

शंकु बायोप्सी या कोनाइजेशनः इस तकनीक में डॉक्टर गर्भाशय ग्रीवा से ऊतक के शंकु के आकार के टुकड़े को हटा देता है। शंकु बायोप्सी के लिए आमतौर पर उपयोग की जाने वाली विधियों में लूप इलेक्ट्रोसर्जिकल छेदन प्रक्रिया व लूप इलेक्ट्रोसर्जिकल एक्सिशन प्रक्रिया (एलईईपी) शामिल है। इस प्रक्रिया को ट्रांसफ़ॉर्मेशन ज़ोन का बड़ा लूप एक्सिशन (एलएलईटीएज़) भी कहा जाता है। अन्य विधि कोल्ड नाइफ कोन बायोप्सी है।

क्या अल्ट्रासाउंड से सर्वाइकल कैंसर का पता लगाया जा सकता है?

आमतौर पर, बेहतर जांच विकल्पों की उपलब्धता के कारण गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर का पता लगाने के लिए अल्ट्रासाउंड का प्रयोग नहीं किया जाता है। अल्ट्रासाउंड मुख्य रूप से एक इमेजिंग परीक्षण है, जो आपके प्रजनन अंगों को देखने के लिए उच्च आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों का उपयोग करता है। हालांकि, कुछ शोधकर्ताओं का सुझाव है कि गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की स्थानीय सीमा का आकलन करने के लिए अल्ट्रासाउंड उपयोगी हो सकता है। इसके अलावा, एक अल्ट्रासाउंड केवल लिम्फ नोड्स का आकलन करता है।

संक्षेप में, एक अल्ट्रासाउंड गर्भाशय ग्रीवा कोशिकाओं में सूक्ष्म असामान्यताओं का पता लगाने में सक्षम नहीं होगा। हालांकि, यदि कैंसर बढ़ गया है, तो यह अल्ट्रासाउंड पर दिखाई देगा।

क्या हल्दी कृमि निवारक के रूप में काम कर सकती है?

क्या हल्दी कृमि निवारक है?
हल्दी का उपयोग आमतौर पर डिवॉर्मर के रूप में नहीं किया जाता है। सीमित वैज्ञानिक साक्ष्य एक कृमिनाशक एजेंट के रूप में इसकी प्रत्यक्ष प्रभावशीलता का समर्थन करते हैं। यह एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुणों वाला मसाला है, जो अपने पाक और पारंपरिक औषधीय उपयोगों के लिए जाना जाता है।

हल्दी का वैज्ञानिक नाम कर्क्यूमा है। ये चिकित्सीय गुणों के साथ सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाला औषधीय पौधा है। हल्दी का करक्यूमिन तत्व इसे अधिक उपयोगी बनाता है। करक्यूमिन में मुख्य रूप से एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीऑक्सीडेंट, एंटीवायरल और एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं। यह लेख कृमि निवारण की प्रक्रिया और इसके महत्व को स्पष्ट करता है। इसके आलावा, हम इस बात पर भी चर्चा करेंगे कि क्या हल्दी का उपयोग हल्दी कृमि निवारक के रूप में किया जा सकता है?

कृमि निवारण (Dewormer) क्या है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार कृमि संक्रमण वैश्विक आबादी के एक तिहाई से अधिक लोगों को प्रभावित करता है। हालांकि, कृमि संक्रमण शिशु के सम्रग विकास कारकों अर्थात् स्वास्थ्य, पोषण, अनुभूति, सीखने और शिक्षा ग्रहण इत्यादि कों नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।

कृमि-निवारण क्यों आवश्यक है?

डब्ल्यूएचओ (WHO) के अनुसार बच्चों को कृमि निवारण की आवश्यकता होती है क्योंकि वे अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली के विकास के कारण कृमि संक्रमण के आसानी से शिकार हो जाते हैं। यदि इसे लाइलाज छोड़ दिया जाए, तो ये संक्रमण उनके समस्त विकास में बाधा डाल सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप, उन्हें खराब पोषण भी हो सकता है। इसके अलावा, उनकी ध्यान केंद्रित करने और सीखने की क्षमता में भी कमी आ सकती है। कृमि निवारण उपचार प्रत्येक बच्चे में कृमियों की संख्या को कम करने का एक सरल, सुरक्षित और प्रभावी तरीका है। नियमित कृमि निवारण, स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण के सुधार में योगदान देता है।

क्या हल्दी में कृमिनाशक गुण होते हैं?

2018 के एक अध्ययन में हल्दी, विशेष रूप से इसके सक्रिय यौगिक करक्यूमिन का, इसके संभावित कृमिनाशक गुणों के लिए अध्ययन किया गया है। शोध से स्पष्ट है कि करक्यूमिन का कुछ परजीवियों जैसे लीशमैनियासिस, एकैंथमोएबा कैस्टेलानी, एंटामोएबा हिस्टोलिटिका, ट्राइकोमोनास वजाइनालिस, इत्यादि के खिलाफ कृमिनाशक प्रभाव हो सकता है। हालांकि अभी भी हल्दी और करक्यूमिन के कृमिनाशक गुणों की जांच की जा रही है। हमें कृमि निवारण उपचार के संदर्भ में इसकी प्रभावकारिता, इष्टतम खुराक और संभावित दुष्प्रभावों को पूरी तरह से समझने के लिए अधिक शोध की आवश्यकता है।