राजस्थान में इलाज के नाम पर डाम की भेंट चढ़ते बच्चे

लोगों में जागरुकता का अभाव इस कदर हावी है कि लोग अंधविश्वास को चिकित्सा प्रणाली पर इतना हावी कर देते हैं कि जान बचने की जगह जान पर ही बन आती है। ऐसे कई मामले हैं, जो प्रकाश में नहीं आ पाते लेकिन इनका सामने आना और लोगों में जागरूकता का प्रसार होना जरूरी है।

राजस्थान के ग्रामीण समुदाय में अंध विश्वास मासूम बच्चों पर भारी पड़ रहा है। जब बच्चे बीमार पड़ते हैं, तो समुचित उपचार के अभाव में बीमारी उन्हें बदहाल अवस्था में पहुंचा देती है। जब हालत बिगड़ती है, तो अंधविश्वास में जकड़े लोग अपने बच्चों को डॉक्टर के पास ले जाने के बजाय भोपों (गांव में जो टोने टोटके करते हैं और बीमारी का अपने तरीकों से इलाज करते हैं।), तांत्रिकों या अन्य ओझाओं के पास ले जाते हैं। वहां इलाज के नाम पर उन बच्चों पर ऐसे-ऐसे अत्याचार किए जाते हैं, जिनके बारे मे सुनकर ही रूह कांप उठती है। राज्य में इलाज के नाम पर बच्चों से बर्बरता की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं। बर्बरता का शिकार हुए कई बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं।

राज्य के आदिवासी जिलों में बच्चों को डाम लगाए जाने की घटनाएं काफी आम हैं लेकिन हाल ही में एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने सबको हिलाकर रख दिया है। यह घटना श्रीगंगानगर जिले के सूरतगढ़ क्षेत्र के पीपेरन गांव की है। इस गांव में एक चौदह वर्षीय दिव्यांग बच्चे को कई दिनों तक एक तथाकथित तांत्रिक द्वारा भीषण गर्मी में गर्म रेत में रखा गया था, जिसे वहां से गुजरते हुए कुछ युवकों ने देख लिया और बिना देरी करते हुए पुलिस को सूचित कर दिया। जिसके बाद उस बच्चे को छुड़ाया जा सका। दरअसल यह बच्चा जन्म से ही दिव्यांग है लेकिन परिजनों को तांत्रिक ने बहला-फुसला दिया कि ऐसा उपचार करने से बच्चा चलने-फिरने लगेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ बल्कि उस मासूम को मानसिक व शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ी।

राज्य में इलाज के नाम पर बच्चों से क्रूरता की यह इकलौती घटना नहीं है। कहीं बीमार बच्चों को ठीक करने के लिए उनके जिस्म को गर्म लोहे से दाग दिया जाता है या कहीं तेजाब से जला दिया जाता है। भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, राजसमंद, टोंक, जोधपुर समेत विभिन्न जिलों में ऐसी झकझोर कर रख देने वाली घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं।

अंधविश्वास की चादर लंबी

भीलवाड़ा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मुस्ताक खान कहते हैं, ”ग्रामीण समाज में कई अंधविश्वास आज भी अपनी जगह बनाए हुए है। इनमें बच्चों के बीमार होने पर उनके शरीर पर डाम लगाना शामिल है। वैसे तो बच्चे के कोई भी बीमारी होने पर डाम लगवा ली जाती है लेकिन ज्यादातर मामलों में ‘डाम’ निमोनिया से पीड़ित बच्चों को लगाई जाती है। निमोनिया होने पर जब बच्चे की पसली चलती है, तो गांव के लोग समझते हैं कि जिस्म के ऊपर डाम लगा देने से बच्चा ठीक हो जाएगा। ऐसे में किसी लोहे के टुकड़े या पत्थर के टुकड़े को गर्म करके भी लगा दिया जाता है। इससे बच्चे के शरीर पर फफोले पड़ जाते हैं और इसे ही डाम लगाना कहते हैं।”

डॉ. खान कहते हैं, आमतौर पर निमोनिया से पीड़ित बच्चे की हालत पहले से ही खराब होती है। ‘डाम’ लगाए जाने से शरीर जल जाने से उनकी हालत और भी ज्यादा बिगड़ जाती है, जिससे कई बार उनकी मौत भी हो जाती है। हमने आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा सहयोगिनी और एएनएम के जरिए गांव-गांव में अभियान चला रखा है। विभिन्न कैम्पों में भी लोगों को जागरूक करते हैं। जब ‘डाम’ लगाए जाने का मामला सामने आता है, तो डाम लगाने वाले भोपा के खिलाफ पुलिस एफआईआर भी दर्ज करती है। ऐसे कई मामले पुलिस ने दर्ज कर संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की है।

भीलवाड़ा जिले में जिला बाल कल्याण समिति बच्चों पर डाम लगाने जैसे अत्याचार रोकने के लिए आगे आई है। समिति ने इसके लिए बाकायदा अभियान चला रखा है। जब भी ऐसा मामला संज्ञान में आता है, तब बाल कल्याण समिति के पदाधिकारी कानूनी कार्यवाही करते हैं।

डाम की भेंट चढ़ते बच्चे

कई बच्चों की मौत डाम के कारण हो जाती है। पिछले कुछ समय में हुई मौतें इसका प्रमाण हैं। भीलवाड़ा जिले में आसींद क्षेत्र की 15 माह की बच्ची का उसके परिजन एक भोपे से इलाज कराते रहे। हाल बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया जा रहा था तो रास्ते में उसने दम तोड़ दिया। भीलवाड़ा के तेजाजी चौक इलाके में शंभू भील के सात महीने के बेटे सुनील को महज जुकाम था। डाम लगाने पर उसकी हालत बिगड़ी, जिससे उसकी मौत हो गई। सांकरा रेलमगरा में दो महीने की बच्ची का बुखार नहीं उतरा तो उसके परिजनों ने भी डाम लगवा दिया। नतीजा, उसकी मौत के रूप में निकला। मुरड़ा गांव के छह महीने के लोकेश की मौत की वजह भी डाम ही बनी। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। जानकारों का कहना है कि विभिन्न जिलों में डाम लगाने के बाद हालत बिगड़ने से बच्चों की मौत होती रहती हैं लेकिन इनमें से नाममात्र ही सामने आ पाती हैं। भोपे तो डाम लगाते ही हैं मगर कई घटनाएं ऐसी भी हैं, जब बच्चों को उनके ही परिजनों ने डाम लगा दिया।

जागरूकता के लिए अभियान

उदयपुर में चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. जुल्फिकार अली काजी कहते हैं, ”उदयपुर संभाग के बांसवाड़ा, डूंगरपुर और उदयपुर जिलों के ग्रामीण क्षेत्र में आदिवासियों मे इस तरह के अंधविश्वास प्राचीन काल से चले आ रहे हैं। पहले डाम लगाने की घटनाएं बहुत ज्यादा होती थीं। हर गांव में अमूमन ऐसे बच्चे मिल जाते थे, जिनके डाम से जलने के निशान होते थे। अब परिस्थितियों में  सुधार आ रहा है। चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग ऐसे अंधविश्वास को दूर करने के लिए निरंतर जागरूकता अभियान चला रहा है। इसका सकारात्मक असर भी देखने को मिल रहा है।” डॉ. काजी कहते हैं कि क्षेत्र में बच्चों के डाम लगाना सौ फीसदी बंद हो गया है। मैं यह दावा तो नहीं करता लेकिन फिर भी इसमें काफी कमी आई है। पिछले दशकों के मुकाबले बहुत परिवर्तन आया है। समय के साथ आदिवासी समाज में भी हालात बदल रहे हैं। उनमें जागरूकता आ रही है।

मौत के बाद नाटक

राज्य में अनपढ़ लोग पहले बच्चों के इलाज में कोताही बरतते हैं, फिर अस्पताल में बच्चों की मौत के बाद उनकी ‘आत्मा’ को ले जाने का ड्रामा किया जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि भोपे-तांत्रिक समय पर बच्चे को इलाज के लिए अस्पताल में नहीं ले जाने देते। हालत अत्यंत बिगड़ जाने पर जब तक बच्चों को अस्पताल पहुंचाया जाता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। ऐसे में उन्हें बीमार बच्चों की लाश ही ले जानी पड़ती है। बच्चों की मौत के बाद भी भोपे बाज नहीं आते। वह बच्चों के परिजनों को भरोसा दिलाते हैं कि बच्चे की ‘आत्मा’ उसी अस्पताल में भटक रही है, जहां उसकी मौत हुई है। भोपों के बहकावे में आकर गांव वाले ‘आत्मा’ को ले जाने के लिए अस्पताल पहुंच जाते हैं। वहां धूप, अगरबत्ती जलाई जाती है। ढोल बजाए जाते हैं। कुछ समय के बाद भोपा बच्चे की ‘आत्मा’ के आ जाने का दावा करता है, तो सब लोग चले जाते हैं। कोटा के मेडिकल कॉलेज से जुड़े मुख्य अस्पताल एमबीएस अस्पताल, जोधपुर के प्रमुख मथुरा दास माथुर अस्पताल तथा अजमेर के जेएलएन कॉलेज एवं अस्पताल में लोग ऐसे नाटकों के साक्षी बने हैं।

इलाज के नाम पर बच्चों से बर्बरता का मामला बेहद गंभीर है, जिसके खिलाफ कार्यवाही जरुर होनी चाहिए। लोगों को भी अंधविश्वास के प्रति जागरूक होना चाहिए क्योंकि किसी भी बीमारी का इलाज शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना कभी नहीं होता। डॉक्टरों द्वारा भी जागरुकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए ताकि लोग बीमारी के बारे पूरी तरह से शिक्षित हो। गांव में लोगों को शिक्षित करना भी आवश्यक है ताकि लोग सही-गलत के बीच फर्क कर सकें। किसी भी बीमारी की प्राथमिक उपचार तकनीक के बारे में व्यापक स्तर पर अभियान द्वारा लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए। बीमारी चाहे कैसी भी हो, कभी अंधविश्वास के चक्कर में ना पड़े और समय रहते जरुरी सलाह के लिए नजदीकी अस्पताल से संपर्क करें।

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