बच्चों के विकास में आंगनवाड़ी की अहम् भूमिका 

बच्चे के विकास में जितना योगदान परिवार का होता है, उससे कहीं ज्यादा योगदान समाज एवं बाहरी परिवेश का होता है। किसी बच्चे के विकास के लिए दोनों की भूमिका अहम होती है, जिसका एक अंग आंगनवाड़ी भी है...

आंगनवाड़ी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का महत्वपूर्ण अंग है। यह मुख्य रूप से 0-6 आयु वर्ग के बच्चों के लिए है। इसे बच्चों की भूख और कुपोषण से निपटने के लिए ‘एकीकृत बाल विकास सेवा’ (Integrated Child Development Scheme) कार्यक्रम के रूप में भारत सरकार द्वारा 2 अक्टूबर 1975 में शुरू किया गया था। 

आंगनवाड़ी केंद्र गांव में बुनियादी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएं प्रदान करता है। गांवों में आंगनवाड़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में कई सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाती। 

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में 18 लाख बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं और इन आंकड़ों में बिहार का स्थान सबसे ऊपर है। कुपोषण के कारण ही शिशु मृत्यु दर में भी उत्साहवर्धक कमी नहीं दर्ज हुई है। साल 2022 में भारत में 1000 जीवित जन्म पर 27.695 शिशु मृत्यु दर है, जो साल 2021 से 3.74 प्रतिशत कम है। वहीं साल 2021 में 1000 जीवित जन्म पर 28.771 शिशु मृत्यु दर है, जो साल 2020 में 3.61 प्रतिशत है। इन्हीं आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बच्चों में कुपोषण की दर को कम करने एवं उनके विकास में आंगनवाड़ी की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण हो जाती है।

लोगों के मिले-जुले विचार 

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से तकरीबन 45 किलोमीटर की दूरी पर गोविंदपुर गांव की निवासी सुनीता देवी का कहना है कि उन्हें आंगनवाड़ी से सारी सुविधाएं मिलती है। उनके बच्चे को समय पर टीका भी लगता है एवं पोषक आहार भी मिलता है। आंगनवाड़ी की ओर से 1.5 किलोग्राम अरवा चावल, 250 ग्राम मसूर दाल और 100 ग्राम सोयाबीन का पैकेट मिलता है। सुनीता की नजर में आंगनवाड़ी की छवि बेहद सकारात्मक है क्योंकि उनकी जरुरतें आंगनवाड़ी द्वारा पूरी हो रही हैं।

aanganwadi

पर सभी आंगवाड़ी की सुविधाओं से खुश नहीं हैं। बिहार के तरीयानी ब्लॉक शिवहर जिले के बैद्दनाथपुर गांव की रहने वाली हसीना खातून बताती हैं कि उन्होंने भी अपने बच्चे का नाम आंगनवाड़ी में लिखवाने के लिए अपने घर के सदस्यों को भेजा था लेकिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने नाम लिखने से मना कर दिया क्योंकि उनका कहना है कि 30 बच्चों की संख्या पूरी हो चुकी है इसलिए अब बच्चों को रखने की जगह नहीं है। दूसरी ओर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता आशा कुमारी का कहना है कि उन्हें विभाग की ओर से केवल 20 बच्चों के लिए ही राशन उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा 7 गर्भवती महिला, 7 धात्री (बच्चे को दूध पिलाने वाली) और 1 कुपोषित बच्चे का ही राशन दिया जाता है। ऐसी स्थिति में बाकी जरुरतमंद महिलाओं एवं बच्चों तक सुविधा नहीं पहुंच पाती। हालांकि लाभुकों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं एवं विभाग की लापरवाही का मिला-जुला नतीजा है कि आंगनवाड़ी की सुविधाएं पूरी तरह से लोगों तक नहीं पहुंच रही। 

आंगनवाड़ी में व्याप्त समस्याएं

आंगनवाड़ी में निम्नलिखित समस्याएं देखी जाती हैं- 

  • शिक्षा एवं प्रशिक्षण का अभाव – अधिकांश आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं में कौशल विकास की कमी पाई जाती है। 
  • अधिकांश आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जिनके पास अन्य सरकारी कर्मचारियों की तरह सुविधाएं नहीं होती जो उन्हें कार्य में अपना पूरा मनोयोग देनी से रोकती है। 
  • बुनियादी सुविधाओं का अभाव – अधिकांश आंगनवाड़ी कार्यालय ग्रामीण इलाकों में बसे हैं, जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। शौचालय, साफ पीने का पानी की व्यवस्था व बिजली का न होना लोगों के रवैये में उदासीनता दिखाता है। 
  • सीखने का माहौल ना होना– कई माता-पिता (जो आर्थिक तौर पर थोड़े संपन्न होते हैं) अपने बच्चे को केवल इसलिए आंगनवाड़ी कार्यालय में नहीं छोड़ते क्योंकि उन्हें लगता है कि यहां पढ़ने से बेहतर अपने बच्चे को किसी निजी स्कूल में डालना उचित है। इसका एक कारण आंगनवाड़ी में पढ़ने व सीखने का माहौल ना होना भी है। 

कैसी हो आगे की राह 

आंगनवाड़ी को दुरुस्त करने के लिए बुनियादी सुविधाओं का आधुनिकीकरण करने की आवश्यकता है। इसके अलावा आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना, लोगों को आंगनवाड़ी के प्रति जागरुक करना, विभाग की खामियों को सामने लाना भी जरुरी है। एक अच्छी पहल को सफल बनाने के लिए उचित प्रयास आवश्यक हैं।

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