कैंसर से बचाव वाली जीवनशैली पर ध्यान दें: डॉ. हेमंत मल्होत्रा

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मेडिकल क्षेत्र में करियर अक्सर रास्ते में लिए गए फैसलों से बनता है—कहां से पढ़ाई और प्रशिक्षण लिया, किन विशेषज्ञों से सीखा और उस अनुभव का आगे कैसे प्रयोग किया।

प्रो. डॉ. हेमंत मल्होत्रा, MD, इंडियन सोसाइटी ऑफ ऑन्कोलॉजी के अध्यक्ष, का करियर भी इसी तरह आगे बढ़ा। उनकी यात्रा जयपुर के SMS मेडिकल कॉलेज से शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने भारत और अमेरिका के प्रमुख संस्थानों से उन्नत प्रशिक्षण लिया और अंत में वापस जयपुर लौटने का फैसला किया। उन्होंने विदेश में रहने के बजाय भारत में रहकर अपने क्षेत्र में काम करने और कुछ नया बनाने को चुना। वर्षों के दौरान उनका काम मरीजों के इलाज और शोध से आगे बढ़कर अकादमिक नेतृत्व, पेशेवर संस्थाओं और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों तक पहुंचा। इस बातचीत में वह उन लोगों और अनुभवों के बारे में बताते हैं जिन्होंने उनके करियर को आकार दिया, भारत लौटने के उनके फैसले के बारे में बात करते हैं और यह भी बताते हैं कि उनके अनुसार ऑन्कोलॉजी की अगली पीढ़ी को किन क्षेत्रों पर ध्यान देना चाहिए। यहां पढ़ें…

आप डॉक्टर क्यों बनना चाहते थे? क्या कोई ऐसी खास घटना थी जिसने यह फैसला लेने में आपकी भूमिका निभाई?

मेरे दादा मेरे लिए प्रेरणा थे। वह बहुत प्रसिद्ध सर्जन थे और उन्होंने आगरा में मल्होत्रा नर्सिंग होम नाम से एक बड़ा अस्पताल बनाया था।

हम हर गर्मी की छुट्टियों में अपने दादा-दादी के घर और अस्पताल जाते थे। वहां बड़ी संख्या में मरीजों को देखकर और विशेषकर मरीजों के मन में दादाजी के लिए सम्मान देखकर मैं बहुत प्रभावित होता था। कई मरीज उनके पैर छूते थे और उनके लिए घी, सब्जियां, फल जैसी छोटी-छोटी चीजें लेकर आते थे। इनमें से कई लोग बहुत साधारण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से होते थे।

मरीज और डॉक्टर के बीच का यह रिश्ता और मरीजों की कृतज्ञता मुझे बहुत प्रभावित करती थी। तभी छोटी उम्र में मैंने तय कर लिया था कि मुझे डॉक्टर ही बनना है। मेरे मन में इसे लेकर कभी कोई दुविधा नहीं थी।

मेडिकल कॉलेज से लेकर आज तक का आपका सफर कैसा रहा?

मेरा सफर बहुत मुश्किल नहीं रहा और काफी सहज तरीके से आगे बढ़ा। बचपन से ही परिवार का पूरा सहयोग मिला। मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मेरे माता-पिता दोनों पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से स्थिर थे।

मेडिकल कॉलेज का समय कठिन था। पढ़ाई काफी चुनौतीपूर्ण और प्रतिस्पर्धी थी। मेरे प्रोफेशनल जीवन में दूसरा बड़ा तनाव तब आया जब मैंने टाटा अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी की पढ़ाई शुरू की। उस समय मेरी उम्र 30 साल से ज्यादा थी, मेरी शादी हो चुकी थी और मेरे दो छोटे बच्चे थे। मुझे परिवार से दूर रहना पड़ा। उस समय मेरी मां और पत्नी ने जो त्याग किए, उन्हें मैं आज भी नहीं भूल सकता।

मैं आज अपने छात्रों से अक्सर कहता हूं कि बिना मेहनत और त्याग के सफलता नहीं मिलती। अगर आपको जीवन में आगे बढ़ना है और कुछ हासिल करना है, तो कुछ न कुछ त्याग और कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता है।

आपके जीवन में सबसे बड़ा प्रभाव या मार्गदर्शन किसका रहा?

मेरे दादा मेरे पहले गुरु थे। इसके बाद जीवन में कई और लोगों ने मेरा मार्गदर्शन किया। MBBS के दौरान कुछ सीनियर छात्र थे, जिनसे मैं सलाह लेता था और उनकी किताबें व नोट्स भी लेता था। कुछ जूनियर भी बहुत प्रतिभाशाली थे, जो हमें लगातार और बेहतर करने के लिए प्रेरित करते थे।

MD के दौरान मेरे विभागाध्यक्ष डॉ. शैल राज मेहता थे। वह राजस्थान के बेहतरीन चिकित्सकों में से एक थे। मैंने उनके यूनिट में MD किया और वह हमेशा मेरे लिए आदर्श और प्रेरणा के स्रोत रहे।

इसके बाद मुंबई के टाटा अस्पताल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी की सुपर-स्पेशलाइजेशन के दौरान डॉ. अडवाणी मेरे गुरु रहे। वह बचपन से ही व्हीलचेयर पर हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने पेशे में बहुत ऊंचा मुकाम हासिल किया। इतनी सफलता के बाद भी वह बेहद विनम्र और सरल व्यक्ति रहे। उन्होंने कभी अपना आपा नहीं खोया और हमेशा मरीजों से अच्छे और सम्मानजनक तरीके से बात की।

उनसे मैंने मेडिकल ऑन्कोलॉजी के साथ-साथ मरीजों से बात करना, उनका सम्मान करना और उन्हें सहज व सुरक्षित महसूस कराना भी सीखा।

डॉ. श्रीपद बनवाली भी मेरे गुरु और आदर्श रहे हैं। वह मुझसे लगभग दो-तीन साल सीनियर थे और आज भी टाटा अस्पताल में हैं। उनकी स्पष्ट सोच, ईमानदारी और सरल व्यवहार ने मुझे बहुत प्रभावित किया।

एक डॉक्टर के रूप में आपके काम को कौन-से मूल मूल्य दिशा देते हैं?

दो चीजें मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं। पहली है मरीज के साथ ईमानदार और पारदर्शी रहना। अगर आप मरीज को सच और सही जानकारी बताते हैं, तो वह इसकी सराहना करता है।

दूसरी चीज है शिक्षण। मैं 35 साल से ज्यादा समय से पढ़ा रहा हूं। मैंने सैकड़ों MD छात्रों और कई मेडिकल ऑन्कोलॉजी छात्रों को पढ़ाया है। उनमें से कई आज अपने-अपने विभागों के प्रमुख हैं। यह मेरे लिए सबसे बड़ी संतुष्टि की चीज़ है कि मैंने अच्छा पढ़ाया और उम्मीद है कि उन्हें सही नैतिक मूल्यों के साथ काम करने के लिए प्रेरित किया।

पिछले कुछ वर्षों में ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में कितना बदलाव आया है और आपने इन बदलावों के साथ खुद को कैसे ढाला?

मेरा मानना है कि मेडिकल के लगभग सभी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा विकास ऑन्कोलॉजी में हुआ है और यह लगातार जारी है। इस क्षेत्र में होने वाला शोध वास्तव में अद्भुत है। लगभग हर सप्ताह कोई न कोई नई खोज सामने आती है।

मैं अपने छात्रों से कहता हूं कि अगर आपको प्रगति और रिसर्च में रुचि है, तो ऑन्कोलॉजी आपके लिए बहुत अच्छा क्षेत्र है। यहां बहुत तेजी से विकास हो रहा है।

अपने पेशे से जुड़ी भावनात्मक चुनौतियों का सामना आप कैसे करते हैं?

अक्सर कहा जाता है कि डॉक्टरों को अपने मरीजों से भावनात्मक रूप से जुड़ना नहीं चाहिए। लेकिन हम भी इंसान हैं और ऐसा होना स्वाभाविक है। हम अपने मरीजों से जुड़ जाते हैं। विशेषकर जब किसी बच्चे का इलाज कर रहे हों, तब हमें उम्मीद रहती है कि वह ठीक हो जाएगा। लेकिन जब बीमारी दोबारा लौट आती है, तब यह बहुत दुखद होता है। ऐसी घटनाएं कई दिनों तक मन पर असर डालती हैं। समय के साथ हम खुद को भावनात्मक रूप से मजबूत जरूर बना लेते हैं, लेकिन कुछ मरीज और कुछ परिस्थितियां आज भी हमें अंदर तक प्रभावित करती हैं।

भारत में स्वास्थ्य जागरूकता अभी भी विकसित हो रही है। लोगों में स्वास्थ्य साक्षरता बढ़ाने के लिए डॉक्टरों और स्वास्थ्य संस्थानों को क्या करना चाहिए?

मैं अपने विशेषज्ञता के क्षेत्र अर्थात् कैंसर की बात करूंगा। अभी हमारे ज्यादातर प्रयास मरीजों के इलाज पर केंद्रित हैं। लगभग 80% प्रयास इलाज पर और केवल 20% कैंसर से बचाव और इसके शुरुआती लक्षणों की जानकारी देने पर खर्च होते हैं।

मेरे अनुसार यह कम से कम 50-50 होना चाहिए। स्वास्थ्य शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है। युवाओं को बताया जाना चाहिए कि कैंसर से बचाव के लिए स्वस्थ जीवनशैली कैसी होनी चाहिए और कैंसर के शुरुआती संकेत क्या हैं।

इसके दो लाभ होंगे। पहला, कैंसर को रोकने में मदद मिलेगी। दूसरा, मरीज शुरुआती लक्षण दिखाई देते ही डॉक्टर के पास जाएंगे। इससे कैंसर का पता स्टेज 1 या 2 में लगाया जा सकेगा, न कि स्टेज 3 या 4 में।

यह जागरूकता स्कूल से ही शुरू होनी चाहिए। स्कूली बच्चों को कैंसर से बचाव वाली जीवनशैली के बारे में बताया जाना चाहिए। कॉलेज छात्रों और युवाओं को भी कैंसर के शुरुआती लक्षणों और डॉक्टर से कब संपर्क करना चाहिए, इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।

इसके अलावा कैंसर की स्क्रीनिंग पर भी ध्यान देना चाहिए। पश्चिमी देशों में स्क्रीनिंग काफी विकसित है। भारत जैसी बड़ी और विविध आबादी में इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, लेकिन इस दिशा में प्रयास जरूरी हैं। स्क्रीनिंग का अर्थ ऐसे लोगों में कैंसर की जांच करना है, जिनमें अभी कोई लक्षण नहीं हैं, ताकि बीमारी का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सके।

कुछ बचाव के उपाय पहले से ही अच्छी तरह स्थापित हैं। इनमें से दो-तीन को राष्ट्रीय कार्यक्रमों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, जैसे हेपेटाइटिस के खिलाफ टीकाकरण और सर्वाइकल कैंसर से बचाव का टीकाकरण

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के भविष्य की चीज़ करें तो पिछले वर्षों में एक बड़ा बदलाव सरकारी और निजी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की उपलब्धता है। आज लगभग हर मरीज या कम से कम हर दूसरा मरीज किसी न किसी सरकारी सहायता या बीमा योजना से जुड़ा है।

हो सकता है कि इन योजनाओं में महंगे और अत्याधुनिक इलाज शामिल न हों, लेकिन कई पहली पंक्ति के इलाज और कई ठीक होने वाले कैंसर का उपचार अब बड़ी संख्या में मरीजों के लिए उपलब्ध है।

इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में काफी बड़ा बदलाव आया है।

क्विक शॉट्स

मेडिसिन के अलावा आपको क्या करना पसंद है?
परिवार के साथ समय बिताना और किताबें पढ़ना।

आपका पसंदीदा व्यायाम?
स्ट्रेचिंग और तेज चलना।

अगर आप डॉक्टर नहीं होते तो क्या बनते और क्यों?
मैं फिर भी डॉक्टर ही बनता, लेकिन शायद मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट नहीं। मैं कार्डियक सर्जरी को चुनता।

किस किताब या फिल्म ने आपको गहराई से प्रेरित किया?
The Final Diagnosis

ऐसी कौन-सी मेडिकल गलत धारणा है, जिस पर लोगों को विश्वास करना बंद कर देना चाहिए?
‘कैंसर का अर्थ मौत है’—आज के समय में यह बिल्कुल गलत है।

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