आज के समय में पीसीओएस (PCOS) महिलाओं की सबसे ज़्यादा चर्चा होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है, विशेषकर भारत में। दुनिया भर में प्रजनन आयु (15–49 वर्ष) की लगभग 10–13% महिलाएं इससे प्रभावित हैं। लेकिन जागरूकता की कमी और हल्के लक्षणों के कारण करीब 70% मामलों का पता ही नहीं चल पाता।
कुछ साल पहले तक पीसीओएस के बारे में बहुत कम लोग जानते थे, लेकिन आज यह सोशल मीडिया, स्वास्थ्य कार्यक्रमों और स्कूलों में भी चर्चा का विषय बन चुका है।
इस खास बातचीत में डॉ. दुरु शाह, द पीसीओएस सोसाइटी (भारत) की संस्थापक अध्यक्ष, पीसीओएस से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देती हैं। वह बताती हैं कि पीसीओएस क्या है, इसकी पहचान कैसे होती है और आज यह पहले की तुलना में अधिक आम क्यों दिखाई देता है। डॉ. शाह गाइनेकवर्ल्ड – सेंटर फॉर वुमेन्स हेल्थ एंड फर्टिलिटी की निदेशक हैं और एशिया पैसिफिक इनिशिएटिव ऑन रिप्रोडक्शन (ASPIRE) के बोर्ड की सदस्य भी हैं।
पीसीओएस क्या है और इसे कैसे समझा जाता है?
आज हम इसे पीसीओएस कहते हैं। पहले इसे स्टीन-लेवेंथल सिंड्रोम कहा जाता था। इस स्थिति की पहचान सबसे पहले 1935 में हुई थी। उस समय कुछ महिलाओं में एक जैसे लक्षण देखे गए, जैसे चेहरे पर ज़्यादा बाल आना, अनियमित मासिक धर्म और गर्भधारण में कठिनाई। उस दौर में अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक जांच उपलब्ध नहीं थी। इसलिए डॉक्टर सर्जरी के दौरान अंडाशय की जांच करते थे। उन्होंने पाया कि कुछ महिलाओं की ओवरी सामान्य से बड़ी और चिकनी होती थी। इसी आधार पर इस स्थिति का नाम स्टीन-लेवेंथल सिंड्रोम रखा गया।
समय के साथ हार्मोन टेस्ट, अल्ट्रासाउंड और दूसरी आधुनिक जांच तकनीकों के आने से इस स्थिति के बारे में हमारी समझ बेहतर हुई। करीब 75–80 साल के शोध के बाद आज इसे पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (PCOS) कहा जाता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह कोई बीमारी (Disease) नहीं, बल्कि एक सिंड्रोम (Syndrome) है। बीमारी का उपचार कर उसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है, लेकिन फिलहाल पीसीओएस को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता है। इसे केवल सही इलाज और जीवनशैली में बदलाव के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है।
आज दुनियाभर के विशेषज्ञ इस बात पर भी विचार कर रहे हैं कि पीसीओएस का नाम बदला जाए, क्योंकि इसकी मुख्य वजह केवल ओवरी नहीं होती। इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और सर्वे चल रहे हैं, इसलिए आने वाले समय में इसका नया नाम भी रखा जा सकता है।
आजकल पीसीओएस के मामले अचानक इतने ज़्यादा क्यों दिख रहे हैं?
ऐसा नहीं है कि पीसीओएस अचानक बढ़ गया है। यह समस्या पहले भी थी, लेकिन लोगों में इसके बारे में जागरूकता बहुत कम थी। यहां तक कि सभी डॉक्टरों के पास भी इसकी पूरी जानकारी नहीं थी। पहले महिलाओं के अलग-अलग लक्षणों का इलाज अलग-अलग डॉक्टर करते थे। जैसे मुंहासे या चेहरे पर ज़्यादा बाल आने पर वे त्वचा विशेषज्ञ के पास जाती थीं। अनियमित मासिक धर्म या गर्भधारण में परेशानी होने पर स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेती थीं। वहीं वजन बढ़ने या हार्मोन से जुड़ी समस्याओं के लिए एंडोक्राइनोलॉजिस्ट या फिजिशियन के पास जाती थीं। इन सभी समस्याओं का इलाज अलग-अलग होता था और उन्हें एक ही बीमारी से जोड़कर नहीं देखा जाता था।
समय के साथ स्त्री रोग विशेषज्ञों ने महसूस किया कि महिलाओं को समग्र (Holistic) उपचार की आवश्यकता है। यह केवल त्वचा, वजन या गर्भधारण की समस्या नहीं है। अगर समय रहते इसकी पहचान और सही देखभाल न हो, तो आगे चलकर मधुमेह और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। इसी उद्देश्य से अगस्त 2015 में पीसीओएस सोसाइटी ऑफ इंडिया की शुरुआत की गई। पिछले कई वर्षों में इस संस्था ने देशभर के स्त्री रोग विशेषज्ञों, एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, डायबिटीज़ विशेषज्ञों, न्यूट्रिशनिस्ट, फिटनेस विशेषज्ञों, हृदय रोग विशेषज्ञों, लिवर विशेषज्ञों, बाल रोग विशेषज्ञों और किशोर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर पीसीओएस के बारे में जागरूकता बढ़ाने और बेहतर इलाज पर काम किया है।
भारत में हर 5 में से 1 महिला को पीसीओएस होने की बात कही जाती है। इसका देश पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत एक विविधताओं वाला देश है, इसलिए यह बताना आसान नहीं है कि पीसीओएस कितनी महिलाओं को प्रभावित करता है। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों की महिलाओं में इसके लक्षण भी अलग हो सकते हैं। किसी में चेहरे पर ज़्यादा बाल आते हैं, किसी के मासिक धर्म अनियमित होते हैं, तो किसी में मोटापा अधिक होता है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि पीसीओएस, मधुमेह का एक मुख्य जोखिम कारक है। भारत पहले से ही दुनिया में मधुमेह के सबसे अधिक मामलों वाले देशों में शामिल है। अगर किशोरावस्था में ही इसकी पहचान हो जाए और सही देखभाल शुरू कर दी जाए, तो भविष्य में मधुमेह का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है।
अगर पीसीओएस से पीड़ित महिला गर्भावस्था के दौरान अनियंत्रित ब्लड शुगर और हार्मोन असंतुलन के साथ गर्भधारण करती है, तो इसका असर बच्चे पर भी पड़ सकता है। इससे अगली पीढ़ी में भी इसका और चयापचय समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए आज पीसीओएस की रोकथाम करना, भविष्य में मधुमेह जैसी बीमारियों को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
क्या समय रहते जागरूकता और सही कदम उठाना ज़रूरी है?
यह बेहद ज़रूरी है। स्वस्थ जीवनशैली की शुरुआत बचपन से ही होनी चाहिए। आजकल बढ़ता स्क्रीन टाइम और शारीरिक गतिविधियों की कमी मोटापे की बड़ी वजह बन रहे हैं। महिलाओं को गर्भधारण से पहले भी अपनी सेहत की जांच करानी चाहिए। लेकिन बहुत कम महिलाएं ऐसा करती हैं। कई महिलाएं पहले से ही प्री-डायबिटीज़ या हार्मोन असंतुलन की स्थिति में गर्भधारण करती हैं, जिससे मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है।
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि पीसीओएस जैसी मेटाबॉलिक समस्याओं का असर केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। पुरुषों में 35 वर्ष से पहले बाल झड़ना कभी-कभी मधुमेह, उच्च रक्तचाप या कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं का संकेत हो सकता है। ऐसे मामलों में केवल कॉस्मेटिक उपचार कराने के बजाय डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। पीसीओएस के केवल लगभग 10% मामले आनुवंशिक होते हैं, जबकि अधिकांश मामलों में जीवनशैली और गर्भावस्था के दौरान होने वाले बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्या आर्थिक स्थिति पीसीओएस की जांच और इलाज को प्रभावित करती है?
पीसीओएस की जांच बहुत महंगी नहीं होती है। आमतौर पर डॉक्टर की सलाह और कुछ सामान्य जांचों से इसकी पहचान हो सकती है। इसका इलाज भी काफी हद तक स्वस्थ खानपान और नियमित व्यायाम पर आधारित होता है। डॉक्टरों और मरीजों दोनों में सही आहार और व्यायाम की जानकारी की कमी है।
इसी वजह से पीसीओएस सोसाइटी डॉक्टरों और न्यूट्रिशनिस्ट के लिए विशेष पोषण प्रशिक्षण शुरू कर रही है। साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य और कॉस्मेटिक समस्याओं के लिए भी बेहतर बीमा सहायता की आवश्यकता है, क्योंकि इनका महिलाओं के आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ता है।
घरेलू नुस्खों और वैकल्पिक उपचार को लेकर आपकी क्या राय है?
अभी तक पीसीओएस का कोई वैज्ञानिक रूप से सिद्ध उपचार नहीं है, क्योंकि इसकी सटीक वजह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इन्फ्लेमेशन, आंतों की सेहत और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसे कई कारणों पर शोध चल रहा है। कुछ महिलाओं को जड़ी-बूटियों, प्रोबायोटिक्स या पारंपरिक उपचारों से लाभ महसूस हो सकता है। लेकिन इनकी प्रभावशीलता को साबित करने के लिए अभी पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
अगर किसी महिला को ऐसे उपायों से आराम मिलता है, तो यह अच्छी चीज़ है। लेकिन इलाज हमेशा वैज्ञानिक साक्ष्यों और डॉक्टर की सलाह के आधार पर होना चाहिए।
सोशल मीडिया पर पीसीओएस से जुड़ी जानकारी कितनी भरोसेमंद है?
आज इंटरनेट पर हर कोई खुद को विशेषज्ञ बताता है। इसलिए हमेशा विश्वसनीय स्रोतों, मेडिकल संस्थाओं और प्रमाणित विशेषज्ञों की जानकारी पर भरोसा करें। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले यह जरूर देखें कि उसे किसने लिखा या साझा किया है।
क्या केवल जीवनशैली में बदलाव से पीसीओएस को नियंत्रित किया जा सकता है?
पीसीओएस का स्थायी उपचार नहीं है, लेकिन सही जीवनशैली अपनाकर इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। मैंने ऐसी महिलाओं को देखा है जिन्होंने लगभग 30 किलो वजन कम किया, दवाइयां बंद कीं और उनके मासिक धर्म फिर से नियमित हो गए। मेटफॉर्मिन जैसी दवाइयां उपचार के उचार के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में इसके जोखिम को कम करने के लिए दी जाती हैं। जब जीवनशैली बेहतर हो जाती है, तब कई बार दवाइयों की आवश्यकता भी नहीं रहती है।
वजन धीरे-धीरे कम करना चाहिए। एक महीने में 3 किलो से ज़्यादा वजन कम करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि बहुत तेज़ी से वजन घटाना शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
पीसीओएस से जूझ रही महिलाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
मेरा उद्देश्य महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए कुछ ऐसा करना है, जिससे आने वाली पीढ़ियों को भी लाभ मिले। मासिक धर्म के बारे में जागरूकता, इन्फ्लेमेशन, एनीमिया की रोकथाम और अब पीसीओएस पर काम करना इसी दिशा का हिस्सा है।
अंत में मैं दो महत्वपूर्ण सुझाव देना चाहूंगी:
- स्कूल की कैंटीन में अधिक चीनी और हाई-कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ नहीं बेचे जाने चाहिए।
- हर स्कूल में रोज़ कम से कम एक घंटा शारीरिक गतिविधि अनिवार्य होनी चाहिए।
अगर हम बचपन से स्वस्थ आदतें अपनाएं, तो मोटापा, पीसीओएस, मधुमेह और हृदय रोग जैसी कई गंभीर बीमारियों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
Disclaimer: Medical Science is an ever evolving field. We strive to keep this page updated. In case you notice any discrepancy in the content, please inform us at factcheck@thip.in. You can futher read our Correction Policy here. Never disregard professional medical advice or delay seeking medical treatment because of something you have read on or accessed through this website or it's social media channels. Read our Full Disclaimer Here for further information.


