स्वस्थ कर्मचारी अधिक उत्पादक और लचीले होते हैं: कशिश कपूर

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कार्यस्थल पर कर्मचारियों की अच्छी सेहत का असर किसी से छिपा नहीं है। आज कंपनियां अक्सर प्रदर्शन (Performance), डिजिटल बदलाव (Digital Transformation) और मुनाफे (Growth) पर ज़्यादा ध्यान देती हैं। लेकिन कर्मचारियों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ही उनकी कार्यक्षमता, जुड़ाव, लंबे समय तक कंपनी में बने रहने और बेहतर कार्य संस्कृति की नींव होता है। अगर कर्मचारियों की सेहत को नज़रअंदाज़ किया जाए, तो इसका असर धीरे-धीरे पूरे संगठन के प्रदर्शन पर पड़ता है। वहीं, यदि इसे प्राथमिकता दी जाए, तो यह कंपनी की दीर्घकालिक सफलता का मजबूत आधार बन सकता है।

इस विशेष बातचीत में हमने NEC Corporation India Pvt. Ltd. की वाइस प्रेसिडेंट (ह्यूमन रिसोर्सेज) काशिश कपूर से बात की। लोगों और संगठन के विकास (People & Organizational Development) के क्षेत्र में लगभग 30 वर्षों का अनुभव रखने वाली काशिश बताती हैं कि कॉर्पोरेट हेल्थ पॉलिसी में किस तरह के बदलाव जरूरी हैं, भविष्य में कॉर्पोरेट हेल्थकेयर कैसा हो सकता है और कर्मचारियों की सेहत व विकास के सामने आज सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं।

एक CHRO के रूप में आप कॉर्पोरेट भारत में कर्मचारियों की मौजूदा स्वास्थ्य स्थिति को कैसे देखती हैं?

कॉर्पोरेट भारत में कर्मचारियों की सेहत आज एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, लगभग 60% कर्मचारी बर्नआउट (Burnout) का सामना कर रहे हैं। वहीं, 80% से अधिक कर्मचारी लगातार तनाव, चिंता, खराब नींद और मानसिक थकान जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसके अलावा, करीब 70% कर्मचारियों में मोटापा, मधुमेह का खतरा या उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम है। चिंता की बात यह है कि ये समस्याएं अब 40 साल की उम्र से पहले ही देखने को मिल रही हैं। हालांकि, कंपनियां कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर पहले की तुलना में अधिक खर्च कर रही हैं, लेकिन 25% से भी कम संस्थानों में नियमित और व्यवस्थित रोकथाम के लिए स्वास्थ्य जांच (प्रिवेंटिव हेल्थ स्क्रीनिंग) की सुविधा उपलब्ध है। अर्थात्, वेलनेस पर निवेश बढ़ रहा है, लेकिन उसका लाभ अभी सभी कर्मचारियों तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा है।

आज कामकाजी लोगों के सामने स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे बड़ी तीन चुनौतियां कौन-सी हैं?

मेरे अनुसार, आज कामकाजी लोगों के सामने स्वास्थ्य से जुड़ी तीन सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है तनाव और बर्नआउट। लंबे काम के घंटे, लगातार स्क्रीन के सामने रहना और बेहतर प्रदर्शन का दबाव इसकी मुख्य वजह हैं। इससे चिंता, नींद की समस्या और काम में रुचि कम होने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। दूसरी चुनौती है जीवनशैली संबंधी बीमारियां। मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं अब 40 साल से कम उम्र के पेशेवरों में भी तेजी से बढ़ रही हैं। इसका मुख्य कारण लंबे समय तक बैठे रहकर काम करना और अनियमित दिनचर्या है। तीसरी चुनौती है काम और निजी जीवन के बीच संतुलन की कमी। जब काम और निजी जिंदगी की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं, तब मानसिक थकान बढ़ती है, शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता और लंबे समय में सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इसका सीधा प्रभाव कर्मचारियों की उत्पादकता, कंपनी में लंबे समय तक बने रहने और नेतृत्व क्षमता पर भी पड़ता है।

क्या आपको लगता है कि आज भारतीय कंपनियां कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति पहले से अधिक संवेदनशील हुई हैं?

हां, पहले की तुलना में भारतीय कंपनियां कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अधिक जागरूक हुई हैं। कई संस्थानों ने अब काउंसलिंग, एम्प्लॉयी असिस्टेंस प्रोग्राम (EAP) और वेलनेस पहल शुरू की हैं। सभी कंपनियों में यह व्यवस्था समान रूप से लागू नहीं है। तनाव, अवसाद या मासिक धर्म से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए मेडिकल लीव लेना आज भी कई जगह आसान नहीं है। शारीरिक बीमारियों को समझना और स्वीकार करना अपेक्षाकृत आसान होता है, जबकि मानसिक और हार्मोनल स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को अभी भी उतनी गंभीरता नहीं मिलती। अर्थात् जागरूकता बढ़ी है, लेकिन इसे हर संगठन में समान रूप से लागू करने की जरूरत है।

कर्मचारियों की सेहत में निवेश करना किसी भी संगठन के लिए क्यों जरूरी है?

कर्मचारियों की सेहत में निवेश करना सीधे तौर पर कंपनी के प्रदर्शन से जुड़ा होता है। स्वस्थ कर्मचारी अधिक उत्पादक, उत्साही और चुनौतियों का बेहतर सामना करने वाले होते हैं। वहीं, खराब स्वास्थ्य के कारण अनुपस्थिति, काम के दौरान कम प्रदर्शन और नौकरी छोड़ने की संभावना बढ़ जाती है। अगर कंपनियां समय रहते कर्मचारियों की सेहत पर ध्यान दें, तो भविष्य में इलाज का खर्च भी कम होता है और बर्नआउट जैसी समस्याओं से बचाव होता है। इसके अलावा, इससे कंपनी की अच्छी छवि बनती है, बेहतर प्रतिभाओं को आकर्षित करने और उन्हें लंबे समय तक बनाए रखने में भी मदद मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण चीज़ यह है कि स्वस्थ कर्मचारी ही लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन और मजबूत नेतृत्व दे सकते हैं।

क्या वेलबीइंग (Well-being) कार्यक्रमों और कर्मचारियों की भागीदारी (Engagement) या कंपनी में बने रहने (Retention) के बीच कोई संबंध है?

बिल्कुल। अच्छी तरह से तैयार किए गए वेलबीइंग कार्यक्रम कर्मचारियों की भागीदारी और कंपनी में लंबे समय तक बने रहने की संभावना को बढ़ाते हैं। जिन कंपनियों में स्वास्थ्य और वेलनेस कार्यक्रम प्रभावी होते हैं, वहां कर्मचारियों में बर्नआउट कम होता है, काम के प्रति जुड़ाव बढ़ता है और नौकरी छोड़ने की दर भी घटती है। कर्मचारी सिर्फ अच्छी सैलरी ही नहीं, बल्कि यह भी चाहते हैं कि कंपनी उनकी सेहत और भलाई का भी ध्यान रखे। इन कार्यक्रमों का सबसे ज्यादा असर तब होता है, जब वे केवल औपचारिक योजना न होकर कंपनी की कार्य संस्कृति और नेतृत्व का हिस्सा बन जाएं।

क्या महामारी के बाद कंपनियों के कर्मचारियों की सेहत को प्राथमिकता देने के तरीके में बदलाव आया है? अगर हां, तो कैसे?

हां, महामारी के बाद इस सोच में बड़ा बदलाव आया है। अब कंपनियां केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक स्वास्थ्य को भी उतना ही महत्वपूर्ण मानने लगी हैं। कई संस्थानों ने EAP, काउंसलिंग, तनाव प्रबंधन कार्यक्रम, लचीली कार्य व्यवस्था (Flexible Work) और वेलनेस भत्ते जैसी सुविधाएं शुरू की हैं। हाइब्रिड और वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्थाओं ने कर्मचारियों को काम और निजी जीवन के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद की है। साथ ही, मैनेजरों को भी इस बात की ट्रेनिंग दी जा रही है कि वे तनाव के संकेत पहचान सकें और अपनी टीम की बेहतर मदद कर सकें। अब कई कंपनियां कर्मचारियों की भागीदारी, बर्नआउट और स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण करके उसी के अनुसार वेलनेस कार्यक्रम तैयार कर रही हैं। अर्थात्, महामारी के बाद कंपनियों का ध्यान केवल बीमारी का इलाज करने से हटकर पहले से ही स्वास्थ्य की देखभाल करने पर आ गया है।

अगर बजट और संसाधनों की कोई कमी न हो, तो आप अपनी कंपनी के लिए कैसा कर्मचारी स्वास्थ्य कार्यक्रम बनाना चाहेंगी?

मैं ऐसा व्यापक और संतुलित स्वास्थ्य कार्यक्रम तैयार करना चाहूंगी, जिसमें बीमारी का इलाज ही नहीं, बल्कि उसकी रोकथाम पर भी पूरा ध्यान दिया जाए। इसमें बेहतर मेडिकल इंश्योरेंस, हर साल उम्र के अनुसार स्वास्थ्य जांच, गोपनीय मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग, फिटनेस, पोषण, अच्छी नींद और सही कार्य मुद्रा (Ergonomics) से जुड़ी सुविधाएं शामिल हों।साथ ही, कर्मचारियों के काम का बोझ संतुलित रखा जाए, लचीले काम के घंटे हों और पर्याप्त आराम का समय सुनिश्चित किया जाए। मैनेजरों को भी कर्मचारियों की भलाई को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। सबसे जरूरी बात यह है कि कर्मचारियों की सेहत को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कंपनी की संस्कृति और नेतृत्व का हिस्सा बनाया जाए।

जो स्टार्टअप या छोटी कंपनियां शुरुआत से ही अच्छी वेलनेस संस्कृति बनाना चाहती हैं, उन्हें आप क्या सलाह देंगी?

स्टार्टअप और छोटी कंपनियों को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि कर्मचारियों की भलाई केवल महंगे कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि अच्छी कार्य संस्कृति से आती है। शुरुआत में उचित काम के घंटे, स्पष्ट जिम्मेदारियां, खुला और सुरक्षित कार्य माहौल तथा बुनियादी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराना सबसे जरूरी है। नेताओं को खुद भी स्वस्थ आदतों का उदाहरण पेश करना चाहिए, जैसे समय पर छुट्टी लेना, काम और निजी जीवन के बीच सीमाएं तय करना और मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना। लचीले काम के घंटे, नियमित बातचीत और सहानुभूतिपूर्ण नेतृत्व जैसी छोटी पहलें भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं।

आपके अनुसार ‘वेलबीइंग-फर्स्ट’ (Wellbeing-First) कार्यस्थल कैसा होना चाहिए?

मेरे लिए ‘वेलबीइंग-फर्स्ट’ कार्यस्थल वह है, जहां कर्मचारियों की सेहत को बेहतर प्रदर्शन की बुनियाद माना जाए, न कि उसके बदले की जाने वाली कोई कीमत। ऐसे कार्यस्थल पर काम का बोझ संतुलित होता है, प्राथमिकताएं स्पष्ट होती हैं और कर्मचारियों की निजी जिंदगी का सम्मान किया जाता है। मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को नीतियों, नेतृत्व और रोजमर्रा के कामकाज का हिस्सा बनाया जाता है। मैनेजर कर्मचारियों से खुलकर बातचीत करते हैं, लचीलेपन को बढ़ावा दिया जाता है और काम के घंटों से ज्यादा परिणामों को महत्व दिया जाता है। ऐसे माहौल में कर्मचारी सुरक्षित महसूस करते हैं, खुलकर अपनी बात रख पाते हैं और लंबे समय तक बेहतर प्रदर्शन कर पाते हैं।

क्विक शॉट्स

एक ऐसी चीज़, जिस पर आप चाहती हैं कि ज़्यादा CHRO खुलकर बात करें?
लंबे समय तक रहने वाला बर्नआउट और प्रेज़ेंटीइज़्म नेतृत्व और कंपनी के भविष्य पर कितना बड़ा असर डालता है।

सैबेटिकल (लंबी छुट्टी) — ट्रेंड या ज़रूरत?
आज के समय में यह सिर्फ ट्रेंड नहीं, बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ और प्रभावी तरीके से काम करने के लिए एक ज़रूरत बनता जा रहा है।

अगर आपको पूरी कंपनी में सिर्फ एक स्वास्थ्य नीति लागू करने का मौका मिले, तो वह क्या होगी?
काम के बोझ और कार्य घंटों की स्पष्ट सीमा तय करना।

हर कंपनी को कौन-सी वेलबीइंग पहल जरूर अपनानी चाहिए?
मैनेजरों को इस चीज़ की ट्रेनिंग देना कि वे कर्मचारियों में तनाव के शुरुआती संकेत पहचान सकें और समय रहते मदद कर सकें।

कॉर्पोरेट दुनिया में कौन-सा वेलबीइंग ट्रेंड आपको ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है?
सिर्फ एक-दो दिन के वेलनेस कार्यक्रम या केवल ऐप आधारित समाधान, जिनके पीछे मजबूत कार्य संस्कृति और नेतृत्व का समर्थन न हो।

अगले 5 वर्षों में कौन-से वेलबीइंग ट्रेंड सबसे महत्वपूर्ण होंगे?
मानसिक स्वास्थ्य की रोकथाम पर ज़ोर, डेटा के आधार पर वेलबीइंग कार्यक्रम, लचीली कार्य व्यवस्था और कर्मचारियों की सेहत को नेतृत्व के प्रदर्शन का अहम हिस्सा बनाना।

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