डॉ. आकाश जायसवाल एक जराचिकित्सक (Geriatric Medicine specialist) हैं। उन्होंने अपनी मेडिकल पढ़ाई AIIMS, नई दिल्ली से की और गेरियाट्रिक मेडिसिन (बुजुर्गों की स्वास्थ्य देखभाल) में ट्रेनिंग भी पूरी की। इसके बाद, उन्होंने AIIMS में तीन साल तक काम किया और अब वह गुरुग्राम के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट में विशेषज्ञ डॉक्टर (Consultant) के रूप में काम कर रहे हैं। THIP मीडिया के साथ बातचीत में डॉ. आकाश जायसवाल वरिष्ठ नागरिकों द्वारा सामना की जाने वाली समस्याओं का उल्लेख करते हैं।
मरीजों के द्वारा की जाने वाली आम गलतियां क्या हैं?
मरीजों के द्वारा की जाने वाली आम गलतियों में अपनी समस्या को केवल उम्र का असर मानकर नजरअंदाज करना शामिल है। उदाहरण के लिए, अगर किसी वरिष्ठ नागरिक को भूलने की परेशानी हो रही है, तो वे सोचते हैं कि ऐसा होना स्वभाविक है। इसी कारण वे डॉक्टर के पास नहीं जाते हैं। इसके अलावा, डॉक्टर द्वारा किए जाने वाले प्रश्नों का उत्तर, “हां, होता है… उम्र की वजह से है।” इस प्रकार देने की भी गलती करते हैं।
स्वास्थ्य साक्षरता क्या है? यह महत्वपूर्ण क्यों है?
स्वास्थ्य साक्षरता का अर्थ है यह समझ होना कि कौन-सी बीमारी के क्या लक्षण होते हैं और जब ये लक्षण नजर आएं तो समय पर डॉक्टर से सलाह लेना। स्वास्थ्य साक्षरता बीमारी की पहचान करने और समय रहते इलाज कराने के प्रेरित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
मरीज को उसके स्वास्थ्य की बुनियादी जानकारी होना उसके समग्र उपचार प्रणाली के लिए कितना सहायक है?
मरीज को उसके स्वास्थ्य की बुनियादी जानकारी होना उसके समग्र उपचार प्रणाली के लिए काफी सहायक है क्योंकि डॉक्टर के लिए इलाज की प्रक्रिया, सावधानियों और आगे क्या होगा, यह समझाना आसान हो जाता है। साथ ही, ऐसा मरीज डॉक्टर की सलाह और दवाओं का ठीक से पालन करता है, जिससे उसका इलाज बेहतर तरीके से होता है।
चिकित्सा गलत सूचना उपचार प्रक्रियाओं को कितना प्रभावित कर सकती है?
चिकित्सा गलत सूचना उपचार प्रक्रियाओं को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है। अगर मरीज को यह गलतफहमी हो जाए कि ऐलोपैथिक दवाएं हमेशा नुकसान करती हैं, तो डर की वजह से वे इलाज कराने से कतरा सकते हैं। डॉक्टर आमतौर पर प्रत्येक उपचार प्रक्रिया के लाभ और दुष्प्रभावों की जानकारी मरीज को देते हैं। कई बार जल्दी इलाज करना बहुत जरूरी होता है जो कि मरीज की स्थिति पर निर्भर करता है। ऐसा न करने पर बीमारी गंभीर रूप ले सकती है और मरीज की तबियत बिगड़ सकती है।
आपके मरीजों के सबसे आम मिथक क्या हैं?
मरीज विभिन्न प्रकार के मिथकों से प्रभावित होते हैं। डिमेंशिया के संदर्भ में मुख्य मिथक यह है- कि :यह एक लाइलाज बीमारी है।” जो कि सच नहीं है। अगर बीमारी की पहचान शुरुआत में हो जाए, तो दवाओं से इसके बढ़ने की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, मस्तिष्क को सक्रिय रखने वाले व्यायाम भी फायदेमंद हो सकते हैं। अत: समय रहते इसकी पहचान करना महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बढ़ने से उपचार प्रणाली कम कारगर होती है। अत: अगर किसी को बार-बार भूलने की आदत, उलझन, चीजों के नाम याद न आना या ऐसा कोई मानसिक बदलाव दिखे जो रोजमर्रा की जिंदगी में परेशानी पैदा करे, तो डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए।
ऑनलाइन स्वास्थ्य संबंधी गलत सूचनाओं से कैसे बचा जा सकता है?
मैं अक्सर अपने मरीज़ों को यही सलाह देता हूँ कि इंटरनेट पर मौजूद किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति (influencers) की बातों पर भरोसा करने की बजाय प्रशिक्षित डॉक्टरों की सलाह मानें। कुछ मीडिया स्रोत केवल ध्यान खींचने के लिए सनसनीखेज़ सुर्खियाँ लगाते हैं, जिससे चिकित्सा गलत सूचना फैल सकती है। चिकित्सा विज्ञान (Medical science) लगातार बदल रहा है, इसलिए ऐसे विशेषज्ञों से सलाह लेना ज़रूरी है जो नई रिसर्च के साथ अपडेटेड रहते हैं।
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