डॉ. अदिति उदेशी, MBBS, MD, DNB (मनोरोग), एक परामर्शदाता मनोचिकित्सक हैं और उन्हें पाँच वर्षों का अनुभव है। डॉ. उदेशी मुंबई के सनफ्लावर डायग्नोस्टिक एंड पॉलीक्लिनिक में कंसल्टेंट के रूप में कार्यरत हैं।
THIP Media के साथ एक विशेष इंटरव्यू में डॉ. अदिति उदेशी बताती हैं कि स्वास्थ्य साक्षरता का अर्थ समय पर और प्रभावी कार्रवाई करना है।
मरीजों के द्वारा की जाने वाली आम गलतियां क्या हैं?
इसे मरीज की गलती कहना ठीक नहीं है। अक्सर डर या झिझक की वजह से मरीज अपनी पूरी जानकारी नहीं बताते, जैसे नशे की आदत या यौन स्वास्थ्य संबंधी जानकारी। इसलिए डॉक्टर के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसा माहौल बनाए जहाँ मरीज बिना डर के खुलकर बात कर सके।
बातचीत में सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी अहम भूमिका निभाती है। कई बार मरीज अपने लक्षणों को आम बोलचाल के शब्दों में बताते हैं, जैसे “गैस मस्तिष्क में चढ़ गई”, जो माइग्रेन या चिंता जैसी समस्या का संकेत हो सकता है। डॉक्टर को ऐसे शब्दों का सही अर्थ समझना आवश्यक होता है।
इसके अलावा, जब बहुत से परिवार के सदस्य बीच में बोलते हैं तब सही जानकारी मिलना मुश्किल हो जाता है। दवाओं, तिथि या लक्षणों को लेकर अलग-अलग बातें बताई जाती हैं, जिससे डॉक्टर के लिए मरीज की सही स्थिति समझना कठिन हो जाता है।
स्वास्थ्य साक्षरता क्या है? यह महत्वपूर्ण क्यों है?
स्वास्थ्य साक्षरता का अर्थ है शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सही तरीके से समझना। इसमें सही और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित इलाज व भरोसेमंद स्वास्थ्य जानकारी तक पहुँच शामिल है। स्वास्थ्य साक्षरता का एक अहम हिस्सा मानसिक बीमारियों और संक्रामक रोगों से संबंधित गलत धारणाओं और डर को खत्म करना भी है, यह समझते हुए कि ये भी अन्य बीमारियों की तरह जैविक कारणों से होती हैं। अंत में, स्वास्थ्य साक्षरता ज्ञान और सही समय पर सही फैसले लेने से संबंधित है—अर्थात् बीमारी को नज़रअंदाज़ करने या इलाज में देर करने के बजाय समय पर और प्रभावी कदम उठाना, जिसमें बचाव के उपाय भी शामिल हैं।
यदि किसी मरीज को अपने स्वास्थ्य स्थिति की बुनियादी जानकारी हो, तो यह समग्र उपचार प्रक्रिया के लिए कितना सहायक है?
यदि किसी मरीज को अपने स्वास्थ्य स्थिति की बुनियादी जानकारी हो, तो यह समग्र उपचार प्रक्रिया के लिए काफी सहायक है। ऐसे मरीज दवाइयों और थेरेपी का सही से पालन करते हैं, डॉक्टर के साथ बेहतर तालमेल बनता है और खुलकर बातचीत हो पाती है। सही सवाल पूछ पाने की क्षमता से मरीज अपने इलाज से जुड़े फैसलों में भी सक्रिय रूप से शामिल हो पाता है। अंततः, इससे मरीज की सेहत में सुधार होता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है।
चिकित्सा गलत जानकारी उपचार प्रक्रियाओं को कितना प्रभावित कर सकती है?
चिकित्सा गलत जानकारी उपचार प्रक्रियाओं को गहरा असर डाल सकती है। इस वजह से मरीज किसी खास इलाज के बारे में गलत धारणा बना लेते हैं और सही समय पर डॉक्टर के पास जाने में देर कर देते हैं। जब तक वे डॉक्टर से मिलते हैं, तब तक समस्या अक्सर बढ़ चुकी होती है। इसके बाद भी मरीज और उनके परिवार की गलतफहमियों को दूर करने में काफी समय लग जाता है, जिससे इलाज में और देरी हो सकती है। कई बार गलत जानकारी के कारण मरीज बेवजह की जाँच या इलाज की माँग करने लगते हैं, जिससे इलाज और जटिल हो जाता है।
आपके मरीजों के सबसे आम मिथक क्या हैं?
मनोचिकित्सा (Psychiatry) को लेकर समाज में विभिन्न प्रकार की गलतफहमियाँ और मिथक फैले हुए हैं। उनमें से कुछ आम गलत धारणाएँ इस प्रकार हैं:
- “मनोचिकित्सक पागल लोगों के डॉक्टर होते हैं।”
यह एक मुख्य गलतफहमी है। मनोचिकित्सा उन मानसिक बीमारियों से संबंधित है जिनका संबंध मस्तिष्क के जैविक कारणों से होता है। मनोचिकित्सक भी अन्य डॉक्टरों की तरह वैज्ञानिक और प्रमाणित तरीकों से इलाज करते हैं। - “सभी मानसिक दवाइयाँ नींद की गोलियाँ होती हैं या लत लगाती हैं।”
यह बिल्कुल गलत है। मानसिक दवाइयाँ मस्तिष्क के विभिन्न हिस्सों और रिसेप्टर्स पर काम करती हैं। कुछ दवाइयों से नींद आ सकती है, लेकिन कई दवाइयाँ ऐसी नहीं होती हैं। इसलिए सभी दवाओं को एक जैसा समझना सही नहीं है। - आस्था के नाम पर झाड़-फूँक या केवल बाबा-तांत्रिकों पर भरोसा करना इलाज में देरी करता है।
आस्था और आध्यात्मिकता मन को सुकून दे सकती है, लेकिन मानसिक बीमारी में सिर्फ ऐसे उपायों पर निर्भर रहना सही इलाज में देर कर देता है। समय पर पेशेवर मदद लेना महत्वपूर्ण है। - “अब मैं ठीक महसूस कर रहा हूँ, इसलिए दवा बंद कर सकता हूँ।”
आप बेहतर इसलिए महसूस कर रहे हैं क्योंकि दवा असर कर रही है। मानसिक दवाइयाँ तय मात्रा और तय समय के लिए दी जाती हैं। अगर कोई दुष्प्रभाव हो तो डॉक्टर से बात करें, दवाइयों को बदला या समायोजित किया जा सकता है। - “इस दवा से मेरे दोस्त को दुष्प्रभाव हुआ था, तो मुझे भी होगा।”
हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है और दवाइयों का असर भी विभिन्न होता है। किसी और को हुआ दुष्प्रभाव आपको होगा, यह आवश्यक नहीं है। इलाज हमेशा व्यक्ति के अनुसार तय किया जाता है। - “मानसिक या लंबे समय की बीमारी के साथ सामान्य जीवन नहीं जिया जा सकता।”
यह एक खुद को कम आँकने वाली सोच है। सही इलाज, दवा और थेरेपी के साथ मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोग भी एक संतोषजनक और सफल जीवन जी सकते हैं। - “थेरेपी और काउंसलिंग एक ही हैं। मनोवैज्ञानिक और मनोचिकित्सक भी एक जैसे होते हैं।”
थेरेपी आमतौर पर लंबी अवधि की होती है, जबकि काउंसलिंग अक्सर किसी खास स्थिति के लिए कम समय की होती है। मनोवैज्ञानिक (Psychologist) थेरेपी देते हैं लेकिन दवा नहीं लिख सकते हैं। मनोचिकित्सक (Psychiatrist) मेडिकल डॉक्टर होते हैं, जो दवाइयाँ भी लिखते हैं और जटिल मानसिक बीमारियों का इलाज करते हैं।
ऑनलाइन स्वास्थ्य गलत जानकारी से दूर रहने के लिए मरीजों को आपकी सबसे आम सलाह क्या है?
मैं अपने मरीजों को निम्नलिखित सलाह देती हूँ:
- अपने लक्षण इंटरनेट पर खोजने से बचें। चिकित्सा गलत जानकारी से बेवजह घबराहट हो सकती है या गलत निष्कर्ष निकल सकते हैं।
- इलाज शुरू करने से पहले डॉक्टर की योग्यता ज़रूर जाँचें। इससे यह सुनिश्चित होता है कि किसी योग्य और प्रशिक्षित डॉक्टर से इलाज करा रहे हैं।
- डॉक्टर से सवाल पूछने में हिचकिचाएँ नहीं। अपने इलाज को समझना आपको अपनी सेहत से जुड़े सही और समझदारी भरे फैसले लेने में मदद करता है।
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