मल्टीपल स्क्लेरोसिस प्रबंधन के लिए देखभाल महत्वपूर्ण है: राहुल चावला

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मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) के बारे में सही जानकारी होना इस बीमारी से जूझ रहे लोगों, उनके परिवार और उनकी देखभाल करने वालों के लिए आवश्यक है। यह एक लंबे समय तक रहने वाली बीमारी है, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर गहरा असर डाल सकती है। लेकिन सही जानकारी होने से इसके लक्षणों को बेहतर तरीके से संभालने, सही इलाज चुनने और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने में मदद मिलती है। THIP Media को दिए एक इंटरव्यू में डॉ. राहुल चावला, कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट, इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रेन एंड स्पाइन, लाजपत नगर ने इस बीमारी के बारे में विस्तार से बताया और समझाया कि इसका सही तरीके से इलाज और प्रबंधन कैसे किया जाना चाहिए।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) क्या है और इसके मुख्य लक्षण क्या हैं?

मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) एक लंबे समय तक रहने वाली ऑटोइम्यून तंत्रिका संबंधी बीमारी है। ऑटोइम्यून का अर्थ है कि शरीर की अपनी प्रतिरक्षा (इम्यून) कोशिकाएं, जो सामान्यतः बीमारियों से बचाती हैं, गलती से शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर ही हमला करने लगती हैं। इस बीमारी में नसों के चारों ओर मौजूद मायलिन शीथ नामक सुरक्षात्मक परत को नुकसान पहुंचता है। यह परत मस्तिष्क से शरीर के विभिन्न हिस्सों तक संदेशों को तेजी से पहुंचाने में मदद करती है। लेकिन इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मायलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा देती है। इसके कारण नसों में संदेशों का आदान-प्रदान धीमा या बाधित हो जाता है। इस प्रक्रिया को डिमायलिनेशन कहा जाता है।

मायलिन के नष्ट होने से तंत्रिका कोशिकाएं भी प्रभावित होने लगती हैं। हालांकि, समय के साथ कुछ हद तक मरम्मत होती है, लेकिन प्रभावित हिस्सों पर कठोर निशान बन जाते हैं। मस्तिष्क की एमआरआई में ये निशान प्लाक के रूप में दिखाई देते हैं। मल्टीपल स्क्लेरोसिस में यह प्रक्रिया समय-समय पर मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के अलग-अलग हिस्सों में दोबारा होती रहती है, जिससे बीमारी के लक्षण बार-बार उभर सकते हैं। इसी कारण इस बीमारी को ‘मल्टीपल स्क्लेरोसिस’ कहा जाता है।

इस बीमारी के मुख्य लक्षण क्या हैं?

मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) एक डिमायलिनेटिंग बीमारी है, अर्थात् इसमें नसों के चारों ओर मौजूद मायलिन की सुरक्षात्मक परत को नुकसान पहुंचता है। NMO और MOGAD जैसी कुछ अन्य बीमारियां भी इसी तरह की होती हैं। मायलिन को नुकसान पहुंचने से तंत्रिका कोशिकाएं ठीक से काम नहीं कर पातीं।

मस्तिष्क का हर हिस्सा अलग-अलग काम करता है, जैसे सीखना, याददाश्त, देखने की क्षमता, शरीर की हरकतों और हाथ-पैरों की गतिविधियों को नियंत्रित करना। इसलिए एमएस के लक्षण इस पर निर्भर करते हैं कि मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है। एमएस में अक्सर ऑप्टिक नर्व (आंख से मस्तिष्क तक संदेश पहुंचाने वाली नस) प्रभावित होती है। इसे ऑप्टिक न्यूराइटिस कहा जाता है। इसके कारण धुंधला दिखाई देना या आंखों की रोशनी कम होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

अगर मस्तिष्क का सेरिबेलम हिस्सा प्रभावित हो जाए, तो मरीज को चलने और संतुलन बनाए रखने में कठिनाई हो सकती है। ऐसे व्यक्ति की चाल कभी-कभी शराब के नशे में चलने वाले व्यक्ति जैसी लग सकती है।

कर्टिकोस्पाइनल ट्रैक्ट्स वे तंत्रिका तंतु हैं जो शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करते हैं। इनमें मायलिन की मात्रा अधिक होती है, इसलिए डिमायलिनेशन का इन पर ज्यादा असर पड़ता है। इससे शरीर की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं और उनमें अकड़न आ सकती है।

अगर डिमायलिनेशन रीढ़ की हड्डी में होता है, तो मरीज के दोनों पैरों या चारों हाथ-पैरों में कमजोरी आ सकती है। इसके अलावा पेशाब से जुड़ी समस्याएं और हाथ-पैरों में सुन्नपन भी हो सकता है। कुल मिलाकर, एमएस के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ है।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस के जोखिम कारक या संभावित कारण क्या हैं?

ऐसा कोई एक निश्चित कारण नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि किसी व्यक्ति को मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) जरूर होगा। कुछ ऐसे कारक हैं जो इस बीमारी का खतरा बढ़ा सकते हैं। 20 से 40 वर्ष की महिलाओं में पुरुषों की तुलना में इसके होने की संभावना अधिक होती है। इसके अलावा, भूमध्य रेखा से दूर स्थित ठंडे या स्कैंडिनेवियाई देशों में यह बीमारी अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती है।

पारिवारिक इतिहास भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि माता-पिता में से किसी को एमएस है, तो बच्चों में इस बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें यह बीमारी निश्चित रूप से होगी।

कुछ वायरस, जैसे एपस्टीन-बार (Epstein–Barr) वायरस और अन्य वायरल संक्रमणों को भी एमएस से जोड़ा गया है। माना जाता है कि बचपन में होने वाले कुछ वायरल संक्रमण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में ऐसे बदलाव ला सकते हैं, जो आगे चलकर वयस्क अवस्था में एमएस का कारण बन सकते हैं। ये केवल संभावित जोखिम कारक हैं और इनके आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि किस व्यक्ति को एमएस होगा।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस का निदान कैसे किया जाता है और इसमें एमआरआई व अन्य जांचों की क्या भूमिका होती है?

किसी भी तंत्रिका संबंधी बीमारी का पता लगाने के लिए डॉक्टर कई चीज़ों का ध्यान रखते हैं।

सबसे पहले मरीज की मेडिकल हिस्ट्री देखी जाती है। एमएस में अक्सर लक्षण बार-बार आते हैं और फिर कुछ समय के लिए कम या खत्म हो जाते हैं। मरीज को धुंधला दिखाई देना, शरीर के एक हिस्से में कमजोरी (हेमिपेरेसिस), दोनों पैरों में कमजोरी या चलने के दौरान संतुलन बिगड़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ये लक्षण धीरे-धीरे कुछ दिनों में बढ़ते हैं, स्ट्रोक की तरह अचानक नहीं होते हैं।

इसके बाद क्लिनिकल जांच की जाती है। यदि मरीज को देखने में परेशानी है, तो आंखों की जांच की जाती है। यदि हाथ-पैरों में कमजोरी है, तो डॉक्टर मांसपेशियों की अकड़न (स्पास्टिसिटी) और अन्य तंत्रिका संबंधी संकेतों की जांच करके यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि समस्या किस हिस्से में है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम इमेजिंग जांच है। यदि एमएस या किसी अन्य डिमायलिनेटिंग बीमारी का संदेह हो, तो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी का एमआरआई कराया जाता है। मरीज के लक्षणों के आधार पर रीढ़ की हड्डी के किसी विशेष हिस्से की विस्तृत जांच भी की जा सकती है। उदाहरण के लिए, यदि दोनों पैरों में कमजोरी है, तो रीढ़ की हड्डी के उस हिस्से की विशेष जांच के साथ पूरे स्पाइन और मस्तिष्क का एमआरआई कराया जाता है। एमएस के मरीजों में अक्सर कई जगहों पर घाव पाए जाते हैं। इनमें से कुछ लक्षण पैदा करते हैं, जबकि कुछ बिना किसी लक्षण के भी हो सकते हैं।

एमआरआई में डॉक्टर T2 और FLAIR सीक्वेंस पर दिखाई देने वाले विशेष बदलावों को देखते हैं। डिमायलिनेशन के कारण मायलिन परत को नुकसान पहुंचता है, जिससे ये बदलाव दिखाई देते हैं। इसके अलावा कॉन्ट्रास्ट डाई देकर भी जांच की जाती है। सक्रिय (एक्टिव) लीजन कॉन्ट्रास्ट लेने के बाद स्पष्ट दिखाई देते हैं, जबकि पुराने (क्रॉनिक) लीजन ऐसा नहीं करते। इन जांचों से एमएस का पता लगाने में मदद मिलती है, लेकिन ऐसे ही बदलाव कुछ अन्य डिमायलिनेटिंग या संक्रमण संबंधी बीमारियों में भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए डॉक्टर पहले उन बीमारियों को भी बाहर करते हैं।

यदि मरीज के लक्षण सामान्य एमएस जैसे नहीं हैं, तो सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (सीएसएफ) की जांच के लिए लंबर पंक्चर किया जाता है। इसमें शुगर, प्रोटीन और कोशिकाओं की संख्या की जांच कर संक्रमण की संभावना को खारिज किया जाता है। एमएस की पुष्टि के लिए ओलिगोक्लोनल बैंड्स (OCBs) भी देखे जाते हैं। इनकी मौजूदगी यह संकेत देती है कि शरीर में कुछ विशेष प्रतिरक्षा प्रोटीन (इम्युनोग्लोबुलिन) अधिक मात्रा में बन रहे हैं। यह एमएस के निदान के महत्वपूर्ण मानकों में से एक है।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस का वर्तमान मानक इलाज क्या है और इससे बीमारी को कैसे नियंत्रित किया जाता है?

करीब 80–85% मरीजों में रिलैप्सिंग-रिमिटिंग एमएस देखा जाता है। इसमें कुछ समय के लिए लक्षण उभरते हैं और फिर कम या पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। कई बार पहला अटैक बिना इलाज के भी ठीक हो सकता है। हल्की कमजोरी रह सकती है और मरीज महीनों या वर्षों तक सामान्य जीवन जी सकता है, जब तक कि दोबारा बीमारी का अटैक न आए। दो अटैक के बीच बीमारी आमतौर पर नहीं बढ़ती।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस की पुष्टि होने के बाद सबसे पहले मरीज को हाई-डोज़ स्टेरॉयड, अर्थात् पल्स मेथाइलप्रेडनिसोलोन थेरेपी दी जाती है। इससे अचानक बढ़े तंत्रिका संबंधी लक्षणों को नियंत्रित करने और नसों को होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलती है। जरूरत के अनुसार स्टेरॉयड 2–3 महीने तक दिए जा सकते हैं।

इसके बाद डॉक्टर यह तय करते हैं कि मरीज को डिजीज-मॉडिफाइंग थेरेपी (DMT) शुरू करनी है या नहीं। पहले यह इलाज दूसरे अटैक के बाद शुरू किया जाता था, लेकिन अब यदि मल्टीपल स्क्लेरोसिस की पुष्टि हो जाए, तो पहला अटैक आने के बाद ही DMT शुरू की जा सकती है। यह थेरेपी बीमारी की मूल प्रक्रिया पर असर डालती है और भविष्य में दोबारा अटैक आने का खतरा कम करती है।

पहले इसके उपचार में इंटरफेरॉन दवाओं का अधिक प्रयोग होता था। अब कई नई खाने वाली दवाएं उपलब्ध हैं, जो बीमारी के दोबारा उभरने का जोखिम कम करती हैं और इनके दुष्प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम होते हैं। यदि मरीज के मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी में अधिक संख्या में लीजन हों या बीमारी गंभीर हो, तो एलेम्टुज़ुमैब (Alemtuzumab) या नैटालिज़ुमैब (Natalizumab) जैसी प्रभावी मोनोक्लोनल एंटीबॉडी दवाएं दी जा सकती हैं। वहीं, यदि बीमारी अपेक्षाकृत हल्की हो, तो कम प्रभाव वाली लेकिन कम दुष्प्रभाव वाली दवाओं से इलाज शुरू किया जा सकता है। कौन-सी दवा दी जाएगी, यह मरीज की बीमारी की गंभीरता और एमआरआई रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं।

क्या हाल के वर्षों में मल्टीपल स्क्लेरोसिस के उपचार में कोई नई प्रगति हुई है?

हाँ। पहले मल्टीपल स्क्लेरोसिस के इलाज में मुख्य रूप से इंटरफेरॉन दवाओं का प्रयोग किया जाता था। अब कई नई दवाएं उपलब्ध हैं, जिनका चयन मरीज की जरूरत और दवाओं के संभावित दुष्प्रभावों को ध्यान में रखकर किया जाता है। इनमें से अधिकांश दवाएं प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने का काम करती हैं। इससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है, इसलिए कई विकल्प उपलब्ध होने से मरीज के लिए सबसे उपयुक्त इलाज चुनना आसान हो जाता है।

हर साल नई और अधिक प्रभावी दवाएं विकसित हो रही हैं, जो बीमारी के दोबारा उभरने का खतरा कम करती हैं और पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित तथा बेहतर सहन की जाती हैं।

जांच तकनीकों में भी काफी सुधार हुआ है। आधुनिक एमआरआई मशीनें पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील हैं और इसका जल्दी पता लगा सकती हैं। इसके अलावा न्यूरोफिलामेंट और अन्य बायोमार्कर जैसी नई जांचों पर भी शोध चल रहा है। ये अभी परीक्षण के चरण में हैं और भारत में नियमित प्रयोग के लिए उपलब्ध या अनुशंसित नहीं हैं।

क्या घर पर मल्टीपल स्क्लेरोसिस के लक्षणों का पता लगाने वाली कोई तकनीक उपलब्ध है?

मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक तंत्रिका संबंधी बीमारी है, जिसमें बदलाव मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के भीतर होते हैं। फिलहाल इसका पता लगाने के लिए घर पर प्रयोग की जा सकने वाली कोई जांच, जैसे रक्तचाप या ब्लड शुगर मापने की मशीन, उपलब्ध नहीं है।

एमएस के लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे कुछ दिनों में विकसित होते हैं, अचानक नहीं। यदि पहले से इसका उपचार करा रहे मरीज में कोई नया लक्षण दिखाई दे, तो उसे तुरंत अपने न्यूरोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए और नए लीजन की जांच के लिए मस्तिष्क का एमआरआई कराना चाहिए।

कुछ संकेत ऐसे हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है, जैसे लंबे समय तक रहने वाली थकान, चिंता, अवसाद और लहरमिट्स फेनोमेनन, जिसमें गर्दन झुकाने पर पीठ या हाथ-पैरों में बिजली के झटके जैसी असामान्य अनुभूति होती है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। फिलहाल ऐसा कोई घरेलू उपकरण नहीं है जो मल्टीपल स्क्लेरोसिस का पता लगा सके।

क्या जीवनशैली में बदलाव या थेरेपी मल्टीपल स्क्लेरोसिस को नियंत्रित करने में मदद करते हैं?

हाँ। स्वस्थ जीवनशैली अपनाने से इसके प्रबंधन में मदद मिलती है। धूम्रपान इस बीमारी का एक जोखिम कारक है, इसलिए धूम्रपान छोड़ने से इसके होने या दोबारा अटैक आने का खतरा कम हो सकता है। नियमित व्यायाम, योग, ध्यान और संतुलित जीवनशैली अवसाद और चिंता जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करती है, जो मल्टीपल स्क्लेरोसिस के मरीजों में अक्सर देखी जाती हैं।

हालांकि, ये उपाय बीमारी के दोबारा उभरने को नहीं रोकते, लेकिन मरीज की शारीरिक क्षमता और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाने में मदद करते हैं। फिजियोथेरेपी और पुनर्वास से मांसपेशियों की अकड़न कम होती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और रोजमर्रा के काम करना आसान हो जाता है।

मल्टीपल स्क्लेरोसिस के उपचार का वर्तमान परिदृश्य क्या है?

मल्टीपल स्क्लेरोसिस पर लगातार शोध हो रहा है और इसके इलाज में पिछले कुछ वर्षों में काफी प्रगति हुई है। नई दवाएं पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हैं, उनके दुष्प्रभाव कम हैं और मरीज उन्हें बेहतर तरीके से सहन कर पाते हैं। साथ ही, एमआरआई जैसी जांच तकनीकें भी लगातार बेहतर हो रही हैं।

फिर भी, इसका अभी तक पूरी तरह इलाज संभव नहीं है। ऐसी कोई दवा नहीं है जो इस बीमारी को हमेशा के लिए खत्म कर सके। इलाज का मुख्य उद्देश्य बीमारी के दोबारा अटैक को रोकना और उसे नियंत्रण में रखना है।

जिन मरीजों में प्रभावी दवाओं के बावजूद बार-बार अटैक आते रहते हैं, उनके लिए स्टेम सेल प्रत्यारोपण एक उभरता हुआ उपचार विकल्प माना जा रहा है। स्टेम सेल और मेसेंकाइमल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट पर अभी शोध जारी है और शुरुआती परिणाम उम्मीद जगाने वाले हैं।

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