छत्तीसगढ़ की हरित संपदा: भारत की औषधीय अर्थव्यवस्था को गति देना

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छत्तीसगढ़, जिसे अक्सर भारत का “हर्बल स्टेट” कहा जाता है, अपने घने जंगलों और प्राकृतिक संपदा के लिए जाना जाता है। राज्य का लगभग आधा हिस्सा जंगलों से ढका हुआ है, जिससे यह औषधीय पौधों का एक बड़ा प्राकृतिक भंडार बन गया है। यहां की समृद्ध जैव विविधता सदियों से पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का आधार रही है और आज आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं में भी इसकी अहम भूमिका बढ़ रही है।

दुनियाभर में आयुर्वेद और हर्बल चिकित्सा की बढ़ती मांग के बीच छत्तीसगढ़ ट्राइबल लोक स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधीय पौध बोर्ड (CGTLHT & MPB) राज्य में सतत स्वास्थ्य सेवा और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह बोर्ड औषधीय पौधों के संरक्षण, किसानों को सहयोग देने और शोध को बढ़ावा देने जैसे कई क्षेत्रों में काम कर रहा है। THIP Media ने बोर्ड के अध्यक्ष श्री विकास मरकाम से बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने सरकार की नीतियों, जमीनी स्तर पर हो रहे बदलावों और औषधीय पौधों के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ की बढ़ती भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश।

बोर्ड का मुख्य उद्देश्य क्या है और औषधीय पौधों पर ध्यान देने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

हमारे बोर्ड का मुख्य उद्देश्य जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों में औषधीय पौधों का संरक्षण और विकास करना है। जिन औषधीय पौधों की बाजार में अधिक मांग है और जिनका आर्थिक महत्व ज्यादा है, उनकी संगठित तरीके से खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। हम महिला कल्याण संगठनों के साथ मिलकर औषधीय पौधों की खेती का दायरा बढ़ाना चाहते हैं। इससे महिलाओं को लंबे समय तक रोजगार और आय के बेहतर अवसर मिलेंगे, साथ ही वे आर्थिक रूप से अधिक सशक्त बन सकेंगी। यह पहल केवल औषधीय पौधों के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण, सतत विकास और स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं, को मजबूत बनाना भी है।

छत्तीसगढ़ को अक्सर सामाजिक और शैक्षणिक चुनौतियों वाले राज्य के रूप में देखा जाता है। इस सोच को बदलने और जागरूकता, समावेशन व शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आपने क्या पहल की है?

कई राज्यों में सरकारी योजनाएं ज़मीनी स्तर तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाती हैं, विशेषकर महिलाओं तक। लेकिन छत्तीसगढ़ की तस्वीर इससे अलग है। राज्य में साक्षरता दर अभी और बेहतर हो सकती है, फिर भी महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण में उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

छत्तीसगढ़ की बड़ी आबादी आदिवासी और अनुसूचित समुदायों से आती है। शिक्षा के क्षेत्र में अभी काम करने की आवश्यकता है, लेकिन कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में राज्य ने अच्छी प्रगति की है। इसी संभावना को देखते हुए बोर्ड ने महिलाओं को प्रशिक्षण देकर और उनकी क्षमता बढ़ाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने पर विशेष ध्यान दिया।

पहले महिलाएं मुख्य रूप से धान, मक्का और दूसरी पारंपरिक फसलों की खेती करती थीं। बोर्ड ने उन्हें औषधीय पौधों की खेती के बारे में जानकारी दी और बताया कि इससे भविष्य में बेहतर आमदनी और बाजार के अच्छे अवसर मिल सकते हैं।

इसके लिए महिलाओं को खेती का प्रशिक्षण, मिट्टी की जांच और बायोबैंक के माध्यम से जरूरी सहयोग उपलब्ध कराया गया। लगातार प्रयासों और सहयोग से महिला कल्याण संगठनों और बोर्ड के बीच भरोसा मजबूत हुआ।

आज ये महिलाएं आत्मविश्वास के साथ औषधीय पौधों की खेती कर रही हैं। उनकी सफलता इसका उदाहरण है कि सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और भरोसे के साथ महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सकता है।

किसान अक्सर पूछते हैं कि अगर वे औषधीय फसलों की खेती करें, तो उनकी उपज की बिक्री और बाजार तक पहुंच कैसे सुनिश्चित होगी?

हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि किसानों को केवल खेती तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी उपज की प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन भी करना चाहिए, ताकि उन्हें बेहतर आय मिल सके। हमारा बोर्ड भी इसी सोच के साथ काम कर रहा है। किसान खेती करने के लिए तैयार हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उनकी उपज की सुनिश्चित खरीद और उचित मूल्य दिलाना है।

इसी उद्देश्य से हमने महिला कल्याण संगठन को बोर्ड से बायबैक गारंटी (BuyBack Guarantee) के माध्यम से जोड़ा है, ताकि उन्हें अपनी उपज की बिक्री को लेकर भरोसा और लंबे समय तक सहयोग मिल सके। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले के गौरेला क्षेत्र में लगभग 150 एकड़ बंजर भूमि थी। यहां तीन-चार गांवों के किसानों और महिला कल्याण संगठन की सदस्यों ने मिलकर औषधीय फसलों की खेती शुरू की।

आज इसी भूमि पर बड़े पैमाने पर लेमनग्रास की खेती की जा रही है। किसानों की मदद के लिए वहीं लेमनग्रास प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की गई है और आवश्यक मशीनें भी लगाई गई हैं। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़े हैं, उत्पाद की गुणवत्ता बेहतर हुई है और किसानों को अधिक लाभ मिल रहा है।

भविष्य में जहां भी बड़े स्तर पर औषधीय फसलों की खेती होगी, वहां इसी तरह की प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने की योजना है। इससे किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा, उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ेगी और अधिक व्यापारी जुड़ेंगे। इस तरह औषधीय पौधों की खेती के लिए एक मजबूत, टिकाऊ और लाभदायक व्यवस्था विकसित की जा सकेगी। आधुनिक सोच अपनाएं और छत्तीसगढ़ को कृषि और औषधीय पौधों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर और मजबूत राज्य बनाने में अपनी भागीदारी निभाएं।

क्या औषधीय फसलों के उचित मूल्य तय करने के लिए बोर्ड कोई व्यवस्था विकसित कर रहा है?

बिल्कुल। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए हैं। पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का लाभ केवल लगभग 16 लघु वनोपजों तक सीमित था, लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाकर लगभग 96 लघु वनोपजों तक कर दिया गया है। इसमें हर्रा, बहेड़ा, आंवला जैसे कई महत्वपूर्ण औषधीय और आर्थिक रूप से मूल्यवान वन उत्पाद भी शामिल हैं।

हालांकि, कुछ उत्पाद फिलहाल MSP के दायरे में नहीं हैं, लेकिन हमारी दीर्घकालिक योजना स्पष्ट है। जैसे-जैसे किसान और महिला स्वयं सहायता समूह उत्पादन और कारोबार में मजबूत होंगे, वैसे-वैसे उन्हें चरणबद्ध तरीके से MSP आधारित खरीद व्यवस्था से जोड़ा जाएगा, ताकि उन्हें उनकी उपज का उचित और सुरक्षित मूल्य मिल सके।

आने वाले समय में बोर्ड का विशेष ध्यान महिला स्वयं सहायता समूहों को आत्मनिर्भर बनाने पर है। वर्तमान में राज्य में औषधीय पौधों की नर्सरियां सीमित संख्या में हैं। इसे ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ के पांच जिलों में मॉडल नर्सरी स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। इन नर्सरियों से महिला किसानों और वन क्षेत्रों से जुड़े समुदायों को उच्च गुणवत्ता वाले पौधे निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे।

इसके साथ ही बोर्ड डॉक्टरों और पारंपरिक चिकित्सा विशेषज्ञों को अपने हर्बल गार्डन विकसित करने के लिए भी प्रोत्साहित कर रहा है। इससे जंगलों से औषधीय पौधों के अत्यधिक दोहन की आवश्यकता कम होगी और उनका संरक्षण भी सुनिश्चित होगा। जिला स्तर पर विकसित की जाने वाली मॉडल नर्सरियां इस पूरे तंत्र को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

हमारा उद्देश्य चरणबद्ध तरीके से उचित मूल्य, टिकाऊ खेती, महिलाओं की भागीदारी और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है, ताकि किसान और महिला समूह केवल आज ही नहीं, बल्कि भविष्य में भी आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें।

युवा पीढ़ी को औषधीय पौधों से जोड़ने और प्रेरित करने के लिए, खासकर स्कूल हर्बल गार्डन जैसी पहल के तहत क्या योजना बनाई गई है?

हम स्कूलों में हर्बल गार्डन को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि बच्चों को छोटी उम्र से ही औषधीय पौधों के बारे में जानकारी और व्यावहारिक अनुभव मिल सके। इससे हमारी पारंपरिक चिकित्सा संबंधी जानकारी भी सुरक्षित रहेगी और बच्चों में पर्यावरण संरक्षण की भावना भी विकसित होगी।

मिडिल स्कूल, हाई स्कूल और हायर सेकेंडरी स्कूलों में हर्बल गार्डन विकसित किए जा रहे हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधे लगाए जाते हैं और उनकी नियमित देखभाल की जाती है। साथ ही, विशेष रूप से बॉटनी, विज्ञान और संबंधित विषयों के विद्यार्थियों को इन पौधों की पहचान, उनके उपयोग और महत्व के बारे में पढ़ाया जाता है।

उदाहरण के तौर पर, बच्चों को बताया जाता है कि कुछ औषधीय पौधों का प्रयोग किडनी संबंधी समस्याओं में कैसे किया जाता है, खजूर का पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकने में कैसे मदद करता है, काली मिर्च का पारंपरिक रूप से बुखार में कैसे प्रयोग किया जाता है और स्टीविया मधुमेह मरीजों के लिए चीनी का प्राकृतिक विकल्प कैसे बन सकता है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य बच्चों को औषधीय पौधों की पहचान करना, उनके महत्व को समझना और उनके संरक्षण के प्रति जागरूक बनाना है, ताकि वे भविष्य में जंगलों या खेतों में इन पौधों को पहचान सकें और उनकी रक्षा कर सकें। यही स्कूल हर्बल गार्डन की मूल सोच है।

जो किसान अभी बोर्ड से जुड़े नहीं हैं या स्वतंत्र रूप से खेती करना चाहते हैं, क्या उनके लिए सब्सिडी या सरकारी सहयोग की कोई योजना है?

स्वतंत्र रूप से खेती करने वाले किसानों को भी बोर्ड विभिन्न तरीकों से सहयोग प्रदान कर रहा है। बोर्ड उन्हें पौधरोपण सामग्री, बीज और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराता है, जबकि खेती और उससे जुड़े सभी कार्य किसान स्वयं करते हैं। इससे पारदर्शिता बनी रहती है और बोर्ड खेती के संचालन में सीधे हस्तक्षेप नहीं करता।

आज भी औषधीय पौधों की खेती करने वाले किसान बोर्ड के नियमित संपर्क में रहते हैं। आवश्यकता पड़ने पर वे बोर्ड से तकनीकी सलाह और मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं, लेकिन अपनी खेती का पूरा संचालन स्वतंत्र रूप से करते हैं।

क्या बोर्ड औषधीय दवाओं और औषधीय पौधों के निर्माण एवं प्रोसेसिंग पर भी काम कर रहा है?

जी हां। बोर्ड इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहा है। वर्तमान में हम एक डिजिटल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड के रूप में कार्य कर रहे हैं, जहां औषधीय पौधों की खेती और उनकी आपूर्ति आईटी आधारित प्रणाली के माध्यम से संचालित होती है। इस सुव्यवस्थित व्यवस्था के कारण व्यापारी पहले से ही बोर्ड से जुड़े हुए हैं और किसानों से नियमित रूप से उत्पाद खरीद रहे हैं।

इसके साथ ही, हमारी लघु वनोपज समितियां वन उत्पादों और औषधीय पौधों का संग्रह कर उन्हें मूल्यवर्धित उत्पादों में बदलने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। इनके माध्यम से च्यवनप्राश, जामुन जूस, बेल मुरब्बा और बेल जूस जैसे कई उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं, उनकी ब्रांडिंग की जा रही है और उन्हें बाजार में उपलब्ध कराया जा रहा है।

भविष्य में बोर्ड हर्बल दवाओं और औषधीय पौधों के निर्माण एवं प्रोसेसिंग के क्षेत्र में निजी कंपनियों, MSME और स्टार्टअप्स को भी आमंत्रित करेगा। यदि कोई निजी संस्था इस क्षेत्र में प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करना चाहती है या निवेश करना चाहती है, तो सरकार उसे हरसंभव सहयोग और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराएगी।

हमारा उद्देश्य ऐसा मजबूत तंत्र विकसित करना है, जिसमें किसान, महिला समूह, सहकारी संस्थाएं और निजी क्षेत्र मिलकर काम करें। इससे औषधीय पौधों के क्षेत्र में बेहतर वैल्यू एडिशन, बाजार तक आसान पहुंच और सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकेगा।

क्या राज्य में उगाए जाने वाले औषधीय पौधों और हर्बल उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कोई नीति या पहल की जा रही है?

जी बिल्कुल। आयुर्वेद के क्षेत्र में निर्यात को बढ़ावा देने के लिए पहले से ही नीतिगत ढांचा मौजूद है। आयुर्वेदिक दवाओं में प्रयोग होने वाले औषधीय पौधों और हर्बल उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी मांग है और इनमें निर्यात की बड़ी संभावनाएं हैं।

आने वाले समय में हम आयुष मंत्रालय के साथ मिलकर निर्यात संबंधी नीतियों को और मजबूत करेंगे। हमारा लक्ष्य गुणवत्ता, प्रमाणन और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन सुनिश्चित करना है, ताकि राज्य में तैयार होने वाले औषधीय पौधे और आयुर्वेदिक उत्पाद केवल देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के विभिन्न देशों में भी निर्यात किए जा सकें।

हमारी कोशिश है कि आने वाले वर्षों में भारत, विशेष रूप से छत्तीसगढ़, उच्च गुणवत्ता वाले आयुर्वेदिक उत्पादों और औषधीय पौधों के एक भरोसेमंद वैश्विक निर्यातक के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाए।

भारत के किसानों और कृषि क्षेत्र को लेकर आप क्या संदेश देना चाहेंगे?

मैं इस मंच के माध्यम से छत्तीसगढ़ के सभी नागरिकों से अपील करना चाहता हूं कि वे सहयोग और सहभागिता की भावना के साथ आगे आएं। हर गांव और हर नागरिक एक-दूसरे का साथ दे और इस सामूहिक प्रयास का हिस्सा बने।

कृषि हमेशा से छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था और विकास की रीढ़ रही है। आज पारंपरिक खेती के साथ-साथ औषधीय पौधों की खेती किसानों के लिए स्थायी आय और बेहतर भविष्य का एक बड़ा अवसर बनकर उभर रही है।

मैं छत्तीसगढ़ के सभी किसानों और नागरिकों से आग्रह करता हूं कि वे इस अवसर का पूरा लाभ उठाएं और आने वाले समय में इस दिशा में कदम बढ़ाएं। आइए, हम सभी मिलकर सहयोग, नवाचार और सामूहिक प्रयासों के साथ एक मजबूत, समृद्ध और आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ का निर्माण करें।

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