भारत में इस समय 35.5% बच्चे बौनापन (स्टंटिंग) से प्रभावित हैं। ऐसे बच्चों की लंबाई उनकी उम्र के अनुसार कम रह जाती है और उन्हें शरीर व मानसिक विकास से जुड़ी ऐसी समस्याएं हो सकती हैं, जिन्हें बाद में पूरी तरह ठीक करना संभव नहीं होता है। इससे प्रभावित बच्चे पढ़ाई में कमजोर प्रदर्शन कर सकते हैं, लंबे समय तक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ सकते हैं और बड़े होने पर उनके काम करने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। वास्तव में, बच्चे के जीवन के पहले 1000 दिनों में मिलने वाली देखभाल उसके भविष्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अगर इस दौरान बच्चे को पर्याप्त पोषण और सही देखभाल नहीं मिलती है, तो 18 से 23 महीने की उम्र के बीच बौनापन सबसे अधिक बढ़ सकती है और पहले 1000 दिनों के बाद इसे ठीक करना मुश्किल हो जाता है।
बौनेपन की समस्या को समझना
बच्चों में बौनेपन का असर केवल उनके स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव पूरे देश के मानव संसाधन और विकास पर पड़ सकता है। विश्व बैंक के अनुसार, बचपन में इसके कारण वयस्क होने पर लंबाई में हर 1% की कमी आर्थिक उत्पादकता में लगभग 1.4% की कमी से जुड़ी होती है। भारत में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (NFHS-4) के अनुसार, बिहार (48%), उत्तर प्रदेश (46%) और झारखंड (45%) में स्टंटिंग की दर सबसे अधिक पाई गई। वहीं, केरल और गोवा में यह दर सबसे कम, लगभग 20% थी। देश के करीब 40% जिलों में बौनापन की दर 40% से अधिक थी।
सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि इसका संबंध पोषण के अलावा कई सामाजिक और आर्थिक कारणों से है। इनमें मां की शिक्षा, ग्रामीण क्षेत्र में रहना और परिवार की आय जैसे कारक शामिल हैं। परिवार में कैलोरी की कमी भी कई सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से प्रभावित होती है। इनमें परिवार के मुखिया की उम्र और शिक्षा, घर का प्रति व्यक्ति सालाना खर्च, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के जरिए मिलने वाले अनाज की मात्रा, परिवार के सदस्यों का व्यवसाय, औपचारिक ऋण तक उनकी पहुंच, जमीन और पशुधन का मालिकाना हक और भोजन में विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों की उपलब्धता शामिल हैं।
ऊपर बताए गए इतने सारे कारणों को देखते हुए यह आश्चर्य की चीज़ नहीं है कि महामारी के दौरान भारत में इसको नियंत्रित करने की गति धीमी हो गई। महामारी के कारण बच्चों की उचित देखभाल और उनके विकास के लिए जरूरी माहौल प्रभावित हुआ, जिससे इस समस्या पर नियंत्रण पाना और चुनौतीपूर्ण हो गया।
रोकथाम के प्रयास
भारत सरकार कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है, क्योंकि कुपोषण अक्सर बच्चों में बौनापन का कारण बनता है। सरकार की नीतियों का उद्देश्य बच्चों के पोषण में सुधार करना, स्कूलों में बच्चों के दाखिले और उपस्थिति को बढ़ाना, तथा बच्चों में कुपोषण की रोकथाम, पहचान और इलाज करना है। इसके अलावा, लैंगिक असमानता कम करना, गांवों में स्वस्थ वातावरण और बेहतर पोषण को बढ़ावा देना, साफ पानी और स्वच्छता की सुविधा उपलब्ध कराना, गर्भावस्था से पहले और बाद में उचित देखभाल, टीकाकरण और संक्रामक बीमारियों से बचाव भी इन प्रयासों का हिस्सा हैं।
पोषण अभियान की प्रगति रिपोर्ट में भी व्यवहार में बदलाव लाकर स्तनपान को बढ़ावा देने, लड़कियों की शिक्षा, स्वच्छता और अन्य उपायों में निवेश करने की सिफारिश की गई है, ताकि बौनेपन के मामलों को कम किया जा सके।
राष्ट्रीय पोषण मिशन और सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम जैसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों का उद्देश्य आपसी तालमेल के जरिए इसे, कुपोषण, खून की कमी (एनीमिया) और कम वजन वाले बच्चों की संख्या को कम करना है। इसके साथ ही बेहतर निगरानी, समय पर चेतावनी और राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को उचित दिशा-निर्देश देने पर भी जोर दिया जाता है।
कुछ राज्यों के प्रयास इसका उदाहरण हैं। झारखंड में किशोरियों और गर्भवती महिलाओं के पोषण पर ध्यान देकर और सही उम्र में उचित सहायता देकर इसके मामलों को कम करने में सफलता मिली। बिहार में आंगनवाड़ी केंद्रों को बच्चों के लिए ई-लर्निंग केंद्रों के रूप में विकसित किया गया। प्रवासी कामगारों के बच्चों को भी इन केंद्रों से जोड़ा गया और उन्हें दूध व अंडे जैसे पौष्टिक भोजन देने के साथ-साथ सही तरीके से पूरक आहार देने पर ध्यान दिया गया।
पोषण बच्चे के विकास पर क्या असर डालता है?
बच्चे के विकास में पोषण की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन क्या केवल पोषण पर ध्यान देना ही पर्याप्त है? सरकार की विभिन्न योजनाएं बच्चों के स्वास्थ्य के कई पहलुओं पर काम कर रही हैं, फिर भी बौनपान की समस्या बनी हुई है। इसलिए बच्चे के जीवन के पहले 1000 दिनों और उसके रोजमर्रा के जीवन में मौजूद उन सभी कारणों पर ध्यान देने की जरूरत है, जो उसके विकास को प्रभावित करते हैं।
बच्चे के विकास पर जन्म से पहले ही कई चीजों का असर शुरू हो जाता है। माता-पिता से मिलने वाले आनुवंशिक गुण यह तय करते हैं कि बच्चे के जीन किस तरह काम करेंगे। जन्म के तुरंत बाद बच्चे की आंत में मां और आसपास के वातावरण से अलग-अलग सूक्ष्मजीव पहुंचने लगते हैं। इन सूक्ष्मजीवों के साथ बच्चे के शरीर का एक संबंध बनता है, जो उसकी रोगों से लड़ने की क्षमता, भोजन पचाने की प्रक्रिया और यहां तक कि मानसिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर सकता है।
जीवन के पहले 1000 दिनों में होने वाली बीमारियां और कुपोषण बच्चे की आंत में मौजूद इन अच्छे सूक्ष्मजीवों के विकास को प्रभावित कर सकते हैं और उनकी परिपक्वता में देरी कर सकते हैं। इसके अलावा, बच्चे की भूख, पोषण, आनुवंशिक बदलाव, प्रतिरक्षा प्रणाली और संक्रमण जैसी चीजों के आधार पर परजीवी संक्रमण का खतरा भी बना रहता है। बच्चा किस तरह का भोजन खाता है और किस वातावरण में बड़ा होता है, इसका उसके विकास पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। खासतौर पर संसाधनों की कमी वाले देशों में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। इसमें पानी, स्वच्छता और साफ-सफाई (WASH) की सुविधाएं, बच्चे को दूध या अन्य आहार देने से जुड़ी आदतें, साफ-सफाई और बच्चे की देखभाल के तरीके तथा घर का वातावरण शामिल हैं। बच्चे के विकास को लेकर परिवार और समाज की सांस्कृतिक सोच और स्थानीय मान्यताएं भी महत्वपूर्ण होती हैं। ये सभी कारक मिलकर बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करते हैं। इसका असर उसकी पढ़ाई, समझने की क्षमता और आगे के विकास पर भी पड़ सकता है।
समस्या का समाधान कैसे हो?
बौनेपन से निपटने के लिए केवल पोषण पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। लंबे समय तक प्रभाव डालने के लिए ऐसा व्यापक प्रयास जरूरी है, जिसमें स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, स्वच्छता, परिवार और सामाजिक परिस्थितियों जैसे कई क्षेत्रों को एक साथ जोड़ा जाए। इसके साथ ही अलग-अलग पीढ़ियों संबंधी कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
बच्चों के स्वास्थ्य को समझते समय कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना जरूरी है—बच्चों में यह समस्या किन-किन कारणों से होती है? इन कारणों के बीच क्या संबंध है? और बच्चे की सामान्य लंबाई और विकास कब धीमा पड़ने लगता है या रुक जाता है?
इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने और वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर बेहतर नीतियां बनाने के लिए Action Against Stunting Hub काम कर रहा है। इसे UKRI GCRF की मदद मिलती है और यह भारत, सेनेगल और इंडोनेशिया में 17 साझेदार संस्थानों के साथ काम करता है। भारत में यह हब ICMR-National Institute of Nutrition और Indian Institute of Public Health-Gandhinagar के साथ मिलकर काम करता है। भारत में इसकी अगुवाई डॉ. भारती कुलकर्णी करती हैं।
इस शोध का उद्देश्य बच्चों में बौनेपन को केवल एक समस्या के रूप में अलग-अलग हिस्सों में देखने के बजाय बच्चे के संपूर्ण विकास को समझना है। इसमें बच्चे के जैविक, सामाजिक, पर्यावरणीय और व्यवहार से जुड़े पहलुओं और उनके आपसी संबंधों को समझने पर जोर दिया जाता है।
इस शोध में यह समझने की कोशिश की जा रही है कि बच्चे के विकास को प्रभावित करने वाला ‘बायो-डेवलपमेंटल’ वातावरण कैसे काम करता है। अर्थात् बच्चे के जैविक, शारीरिक और सामाजिक वातावरण के बीच किस तरह का संबंध होता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, इसकी रोकथाम के लिए बच्चे के पूरे विकास को ध्यान में रखना चाहिए। कुपोषण को चार आपस में जुड़े वातावरणों के परिणाम के रूप में देखा जाता है—भौतिक वातावरण, घर और आसपास का वातावरण, शिक्षा का वातावरण और व्यापक खाद्य व्यवस्था। इन सभी पर सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का भी प्रभाव पड़ता है। इन सभी पहलुओं को समझकर बच्चों के लिए ऐसा बेहतर वातावरण तैयार किया जा सकता है, जिससे हर बच्चा अपने जीवन में अपनी पूरी क्षमता तक विकास कर सके।

(स्रोतः एक्शन अगेंस्ट स्टंटिंग हब)
इस सोच को अपनाते हुए अब हमें बच्चों के विकास को अलग-अलग हिस्सों में देखने के बजाय ‘Whole Child Approach’ (WCA) अर्थात् बच्चे के संपूर्ण विकास पर ध्यान देने की सोच अपनानी होगी। इसके लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, सामाजिक सुरक्षा और अन्य क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। सभी विभागों को मिलकर ऐसी नीतियां और योजनाएं बनानी होंगी, जो बच्चों के विकास की अलग-अलग जरूरतों को एक साथ पूरा कर सकें। उदाहरण के लिए, पौष्टिक भोजन तक पहुंच बढ़ाने वाली नीतियों में स्वास्थ्य और कृषि विभागों का सहयोग जरूरी है। वहीं, शुरुआती बचपन की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा विभागों के बीच तालमेल की जरूरत हो सकती है।
निष्कर्ष
भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से विविध देश में बच्चों की जरूरतों को पूरा करने के लिए नीतियां और योजनाएं बनाते समय स्थानीय सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है। इसके लिए समुदायों से जुड़ना और उनकी जरूरतों व समस्याओं को समझना भी महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, साफ पानी और स्वच्छता की सुविधा बढ़ाने वाली योजनाओं में विभिन्न समुदायों के सामने आने वाली समस्याओं और बाधाओं को ध्यान में रखना चाहिए। इसी तरह, बच्चों के शुरुआती विकास से जुड़ी योजनाओं में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में बच्चे की परवरिश से जुड़ी स्थानीय परंपराओं और मान्यताओं को भी समझना जरूरी है।
अंत में, भारत में Whole Child Approach (WCA) को प्रभावी बनाने के लिए सभी स्तरों पर लोगों की भागीदारी जरूरी है। इसमें नीति बनाने वाले लोग, स्वास्थ्यकर्मी, शिक्षक, समुदाय के नेता और परिवार शामिल हैं। सभी हितधारकों की भागीदारी से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि नीतियां और योजनाएं स्थानीय संस्कृति के अनुकूल, क्षेत्र की जरूरतों के अनुसार और बच्चों व परिवारों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई और लागू की जाएं।
Disclaimer: Medical Science is an ever evolving field. We strive to keep this page updated. In case you notice any discrepancy in the content, please inform us at factcheck@thip.in. You can futher read our Correction Policy here. Never disregard professional medical advice or delay seeking medical treatment because of something you have read on or accessed through this website or it's social media channels. Read our Full Disclaimer Here for further information.


