भारत में अधिकांश महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है, जैसा कि NFHS-5 सर्वेक्षण (2019-21) से पता चलता है। इस सर्वेक्षण के अनुसार, 18-49 वर्ष की 29.3% विवाहित महिलाओं को उनके पति द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है।
यह समस्या कर्नाटक (44.4%), बिहार (40.0%) और मणिपुर (39.4%) जैसे राज्यों में और भी गंभीर है, जहां सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। इससे पता चलता है कि भारत में घरेलू हिंसा को समाप्त करने के लिए जागरूकता, आवश्यक कदम और नीतिगत बदलाव की आवश्यकता है।
घरेलू हिंसा (Spousal violence) में क्षेत्रीय असमानताएं
डेटा से पता चलता है कि विभिन्न क्षेत्रों में घरेलू हिंसा की दरों में बड़ा अंतर है। दक्षिणी राज्यों उदाहरण के लिए, कर्नाटक (44.4%) और तमिलनाडु (38.1%) में मामले सबसे अधिक हैं, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों जैसे नागालैंड (6.4%) और मिज़ोरम (10.9%) में यह संख्या काफी कम है। इसके अलावा, बिहार (40.0%) और तेलंगाना (36.9%) जैसे राज्यों में भी घरेलू हिंसा के मामले अधिक हैं, जिससे यह साबित होता है कि यह समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में फैली हुई है।
इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों (31.6%) में शहरी क्षेत्रों (24.2%) की तुलना में अधिक घरेलू हिंसा के मामले सामने आते हैं। इसका कारण गरीबी, सामाजिक मान्यताएं और सहायता प्राप्त करने में कठिनाई हो सकता है। इससे पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए विशेष सहायता कार्यक्रमों की आवश्यकता है क्योंकि वहां उनके पास घरेलू हिंसा से बचने के अवसर और संसाधन कम उपलब्ध होते हैं।
समय के साथ बढ़ते मामलें
NFHS-4 (2015-16) और NFHS-5 (2019-21) के डेटा के अनुसार, घरेलू हिंसा की दर लगभग वैसी ही बनी हुई है, जो मामूली रूप से 31.2% से घटकर 29.3% हो गई है। इसका अर्थ है कि लगभग हर तीन में से एक विवाहित महिला घरेलू हिंसा का शिकार है। इसमें कोई खास सुधार न दिखना यह दर्शाता है कि घरेलू हिंसा को खत्म करने में रिपोर्टिंग की कमी, सामाजिक अपमान और कमजोर कानून प्रवर्तन जैसी समस्याएं मुख्य बाधाएं बनी हुई हैं।
हालांकि, महिलाओं की सुरक्षा के लिए घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम (2005) जैसे कानून मौजूद हैं, लेकिन इनका सही तरीके से पालन नहीं होता है। अधिकांश महिलाएं घरेलू हिंसा की रिपोर्ट इसलिए नहीं करती हैं क्योंकि उन्हें बदला लिए जाने का डर होता है, वे आर्थिक रूप से अपने पति पर निर्भर होती हैं, या समाज का दबाव महसूस करती हैं कि परिवार की इज्जत बचाने के लिए चुप रहना चाहिए।
घरेलू हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध
घरेलू हिंसा केवल शारीरिक चोट ही नहीं पहुंचाती है, बल्कि इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी लंबे समय तक रहता है। जो महिलाएं घरेलू या यौन हिंसा का शिकार होती हैं, वे अक्सर अवसाद, चिंता और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी गंभीर मानसिक समस्याओं से जूझती हैं। इसके अलावा बार-बार घरेलू हिंसा सहने से उनका आत्मविश्वास कम हो सकता है, वे भावनात्मक रूप से असहाय महसूस करने लगती हैं और उनके मन में कभी-कभी आत्महत्या करने के विचार भी आने लगते हैं।
अध्ययन से पता चलता है कि लंबे समय तक तनावपूर्ण रिश्ते में रहने से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली बदल सकती है, जिससे तनाव के हार्मोन बढ़ जाते हैं और सोचने-समझने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसके अलावा, घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) और हृदय रोगों का खतरा भी रहता है।
इस समस्या को हल करने के लिए कई स्तरों पर प्रयास करने की जरूरत है। घरेलू हिंसा के मानसिक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाना, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुधारना, और ऐसा माहौल बनाना जरूरी है जहां महिलाएं सहायता मांग सकें। इसके अलावा, परिवारों में शुरू से ही शिक्षा और सही समय पर सहायता करके इस हिंसा को रोका जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत में घरेलू हिंसा के आंकड़े यह दिखाते हैं कि यह एक गंभीर समस्या है। हालांकि घरेलू हिंसा के प्रति जागरूकता बढ़ी है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं को घर में सुरक्षित महसूस कराने के लिए अभी भी आवश्यक कदम उठाना बाकी है। उदाहरण के लिए, कानून को मजबूत करना, पीड़ितों के लिए बेहतर समर्थन सेवाएं उपलब्ध कराना और घरेलू हिंसा को सहने की सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को चुनौती देना।
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