डिजिटल युग में, जहां इंटरनेट और सोशल मीडिया ने पूरी दुनिया को आपस में जोड़ दिया है, सोशल मीडिया स्वास्थ्य और सेहत से संबंधित आवश्यक जानकारी लोगों तक पहुंचाने का एक प्रभावी माध्यम बन गया है। आज के समय में लोग अपनी सेहत को लेकर जागरूक होने के लिए लगातार नई जानकारी तलाश रहे हैं। इसी बीच, हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे हैं। लाखों फॉलोअर्स वाले ये इन्फ्लुएंसर्स अपनी ऑनलाइन पहचान के जरिए लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं और उन्हें शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी और सुझाव देते हैं।
प्रेरणा से गलत जानकारी तक
उनकी पोस्ट और बातें अक्सर निजी अनुभवों और सोच-समझकर तैयार की गई सामग्री से भरी होती हैं। इनमें खान-पान, व्यायाम, मानसिक शांति और स्वस्थ जीवनशैली जैसे कई विषय शामिल होते हैं। सोशल मीडिया पर इन हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स के बढ़ते प्रभाव ने लोगों को अपनी सेहत का ध्यान रखने के महत्व के बारे में जागरूक किया है। लेकिन इसके साथ एक गंभीर चिंता भी सामने आई है—इनमें से कई लोगों के पास स्वास्थ्य से जुड़ी पेशेवर योग्यता नहीं होती। ऐसे में उनकी दी गई सलाह हमेशा भरोसेमंद नहीं हो सकती। यह चिंता खासतौर पर डाइट और पोषण के मामले में ज्यादा गंभीर है, क्योंकि गलत स्वास्थ्य जानकारी लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है।

इस संदर्भ में इस महीने की शुरुआत में रूसी वेगन रॉ फूड इन्फ्लुएंसर झन्ना सैमसोनोवा की मौत को नजरअंदाज करना मुश्किल है। इंस्टाग्राम पर उन्हें 38,000 लोग फॉलो करते थे। वह पूरी तरह कच्चे शाकाहारी डाइट को बढ़ावा देती थीं और करीब एक दशक तक सिर्फ फल, बीज, जूस और स्मूदी जैसे कच्चे शाकाहारी खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहीं। मलेशिया में उनकी 39 साल की उम्र में मौत हो गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, उनकी मौत भूख और अत्यधिक थकान के कारण हुई। उनकी मां ने न्यूयॉर्क पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में बताया कि उनकी बेटी की मौत हैजा जैसी बीमारी के कारण हुई थी। उनका मानना था कि अत्यधिक थकान और पूरी तरह वेगन डाइट के कारण शरीर पर पड़े दबाव ने भी उनकी बेटी की हालत को प्रभावित किया। ध्यान देने वाली चीज़ यह है कि सैमसोनोवा पोषण विशेषज्ञ नहीं थीं।
सैमसोनोवा उन कई हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स में से एक थीं, जो सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हुए और लोगों को बेहतर स्वास्थ्य के लिए अपनी-अपनी डाइट और जीवनशैली अपनाने की सलाह देते हैं। उनकी आकर्षक पोस्ट और प्रभावशाली चीज़े उन लोगों को आसानी से प्रभावित करती हैं, जो ज्यादा स्वस्थ और बेहतर जीवन जीना चाहते हैं। कुल मिलाकर, इन इन्फ्लुएंसर्स ने सही खान-पान और व्यायाम के जरिए अपनी सेहत का ध्यान रखने के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाई है।
क्या इन पर भरोसा किया जा सकता है?
भले ही हेल्थ इन्फ्लुएंसर्स ने खान-पान और फिटनेस के बारे में लोगों को जागरूक करने में योगदान दिया हो, लेकिन स्वास्थ्य जैसे गंभीर विषय पर सलाह देने के लिए उनकी योग्यता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

शालिनी अरविंद, चीफ डाइटिशियन, के, बन्नेरघट्टा रोड, फोर्टिस अस्पताल, बेंगलुरु, बताती हैं, “हमारे पास एक मरीज आई थी, जिसने बिना सोचे-समझे अपनी डाइट में बहुत ज्यादा छाछ शामिल कर ली थी। उसके शरीर में सोडियम का स्तर कम हो गया था, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहा जाता है। उसे भ्रम होने लगा था और वह जी मिचलाने, उल्टी और सिरदर्द जैसी समस्याओं से जूझ रही थी। कभी-कभी हमारे पास ऐसे मरीज भी आते हैं, जिन्हें कीटो आहार के बाद वजन बढ़ना, फैटी लिवर, कमजोर इम्युनिटी और शरीर में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी जैसी समस्याएं होती हैं।”
भारतीय विज्ञापन मानक परिषद ने 2022–2023 की अपनी शिकायतों की वार्षिक रिपोर्ट में विराट कोहली, एमएस धोनी, कैटरीना कैफ और बिपाशा बसु को उन इन्फ्लुएंसर्स में शामिल किया, जिनके खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें मिली थीं। रिपोर्ट में बताया गया कि परिषद द्वारा जांची गई हर चार ब्रांड सामग्री में से एक में इन्फ्लुएंसर से जुड़ा नियम उल्लंघन पाया गया। आंकड़ों के अनुसार, इन्फ्लुएंसर से जुड़े उल्लंघनों की हिस्सेदारी 26% थी और उनके खिलाफ 2,039 शिकायतें दर्ज की गई थीं।
सरकारी दिशानिर्देश
इस साल मार्च में उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के तहत उपभोक्ता मामलों के विभाग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सेलिब्रिटीज, इन्फ्लुएंसर्स और वर्चुअल इन्फ्लुएंसर्स के लिए “एंडोर्समेंट्स नो-हाउज़!” नाम से कुछ दिशानिर्देश जारी किए।
इन नियमों के अनुसार, किसी उत्पाद या सेवा का प्रचार करते समय भाषा सरल और आसानी से समझ आने वाली होनी चाहिए। इसमें ‘विज्ञापन’, ‘प्रायोजित’, ‘सहयोग’ या ‘पेड प्रमोशन’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है। कोई व्यक्ति ऐसे उत्पाद या सेवा की सिफारिश नहीं कर सकता, जिसे उसने खुद प्रयोग या अनुभव नहीं किया है या जिसके बारे में उसने पूरी जानकारी और जरूरी जांच नहीं की है।
पैसे लेकर या किसी अन्य लाभ के बदले किए जाने वाले ब्रांड प्रचार में ‘विज्ञापन’, ‘एड’, ‘प्रायोजित’, ‘सहयोग’ या ‘साझेदारी’ में से किसी एक शब्द का प्रयोग किया जा सकता है।
नियमों के अनुसार, जिन इन्फ्लुएंसर्स या सेलिब्रिटीज के पास अपने ज्ञान, पहचान, पद या दर्शकों के साथ संबंध के कारण किसी उत्पाद, सेवा, ब्रांड या अनुभव के बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने की क्षमता है, उन्हें यह साफ बताना जरूरी है कि यह प्रचार है।
यह जानकारी प्रचार के संदेश में ऐसी जगह और तरीके से दी जानी चाहिए कि वह साफ दिखाई दे और उसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो।
नियमों में सेलिब्रिटीज और इन्फ्लुएंसर्स को यह भी सलाह दी गई है कि वे खुद जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि विज्ञापन देने वाला व्यक्ति या कंपनी विज्ञापन में किए गए दावों को सही साबित करने में सक्षम है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि बहुत कम इन्फ्लुएंसर्स इन दिशानिर्देशों का सही तरीके से पालन करते हैं।
शालिनी बताती “इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया का दौर अब बना रहेगा। स्वास्थ्य और पोषण से जुड़ी सामान्य जानकारी फैलाना अच्छी चीज़ है, लेकिन समस्या तब होती है जब इससे गलत धारणाएं फैलने लगती हैं। आप कह सकते हैं कि भोजन में फाइबर लेना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, लेकिन यह कहना कि वजन कम करने के लिए फाइबर ही एकमात्र उपाय है, गलत और चिंताजनक है।”
इसके अलावा, पोषण और डाइट के क्षेत्र में हर व्यक्ति का शरीर और मेटाबॉलिज्म अलग होता है। इसलिए सभी लोगों के लिए एक जैसी डाइट या एक ही समाधान काम नहीं कर सकता।
क्या किया जाना चाहिए?

डॉ. केतन पारिख, कंसल्टेंट और जाने-माने बाल रोग सर्जन, एनएच-एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल और डॉ. एल. एच. हीरानंदानी मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई का मानना है कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लिए लाइसेंस की व्यवस्था होनी चाहिए। वह बताते हैं, “अगर मैं किसी मरीज को गलत सलाह देता हूं, तो एक डॉक्टर के तौर पर मुझ पर कार्रवाई हो सकती है। लेकिन खुद को डाइटिशियन, पोषण विशेषज्ञ, ब्यूटी और स्किन एक्सपर्ट बताने वाले इन लोगों पर किसी ऐसे काउंसिल या संस्था का नियंत्रण नहीं है, जो गलत सलाह देने पर उनके खिलाफ कार्रवाई कर सके। इसलिए लाइसेंस की व्यवस्था होनी चाहिए। आज अधिकांश लोग खुद को ‘सर्टिफाइड’ कॉस्मेटोलॉजिस्ट और न्यूट्रिशनिस्ट बताते हैं, लेकिन उन्हें सर्टिफिकेट किसने दिया है? जिस संस्था ने उन्हें सर्टिफाइड किया है, क्या वह मान्यता प्राप्त और भरोसेमंद है?”
इन्फ्लुएंसर्स को फॉलो करने वालों को भी सावधानी से फैसला लेना चाहिए। शालिनी के अनुसार, लोगों को इन्फ्लुएंसर की योग्यता और प्रमाणपत्रों की जांच करनी चाहिए और उनकी लिंक्डइन प्रोफाइल भी देखनी चाहिए। वह बताती हैं, “भारत में योग्य और रजिस्टर्ड डाइटिशियन बहुत कम हैं। इन्फ्लुएंसर्स को अपनी प्रोफाइल पर अपने प्रमाणपत्र दिखाने चाहिए। डाइटेटिक्स में शरीर की कार्यप्रणाली, भोजन से जुड़े सूक्ष्मजीव विज्ञान और पोषण जैव रसायन जैसे कई विषय शामिल होते हैं, इसलिए यह इतना आसान विषय नहीं है।”
दिल्ली की लेखिका और योग में रुचि रखने वाली प्राची रतूड़ी मिश्रा साफ-सुथरा और संतुलित भोजन करने में विश्वास रखती हैं। वह सोशल मीडिया पर कुछ चुनिंदा लोगों को फॉलो करती हैं, जिनमें रुजुता दिवेकर भी शामिल हैं। वह बताती हैं, “वह बहुत समझदारी की बातें करती हैं, जिनमें से कई बातें हमने अपनी दादी और मां से भी सुनी हैं। जहां तक योग की बात है, यह एक संपूर्ण विज्ञान है और इसके बारे में मिलने वाली जानकारी में से सही जानकारी को चुना जा सकता है। मैं भी कुछ ऐसे लोगों को फॉलो करती हूं जिनका आध्यात्मिक ज्ञान प्रभावशाली है। इसके अलावा, कई योग इन्फ्लुएंसर्स सुरक्षित तरीके से बहुत आसान आसन सिखाते हैं, जिन्हें कोई व्यक्ति खुद भी कर सकता है। लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगी कि जिस चीज को आप फॉलो कर रहे हैं, उसके बारे में आपको बुनियादी जानकारी जरूर होनी चाहिए। बिना समझे किसी को आंख बंद करके फॉलो करना सही नहीं है।”
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