कुछ शोध में द्विभाषिकता (bilingualism) और हकलाने (stuttering) के बीच संबंध होने का उल्लेख किया गया है। इन अध्ययनों में यह दावा किया गया है कि जो लोग एक से अधिक भाषा बोलते हैं वे उस समय हकलाने लगते हैं जब वे दूसरी भाषा अच्छी तरह से बोल नहीं पाते हैं। इसके अलावा, समय-समय पर, यह स्पष्ट है कि सामाजिक दबाव और तनाव धाराप्रवाहता (speech fluency) प्रभावित कर सकते हैं। इस लेख में हमने द्विभाषिकता (bilingualism) और हकलाने (stuttering) के बीच संबंध का उल्लेख किया है।
क्या कई भाषाओं को सीखना धाराप्रवाहता (speech fluency) को प्रभावित करता है?

मोहम्मद एलियास, सीनियर क्लिनिकल ऑडियोलॉजिस्ट, स्पीच लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट, MGM हेल्थकेयर, चेन्नई, तमिलनाडु बताते हैं “कई भाषाओं को सीखना कभी-कभी कुछ कारकों के आधार पर धाराप्रवाहता (speech fluency) को प्रभावित कर सकता है। इस संदर्भ में ‘प्रवाह’ का अर्थ है- “सुचारू और आत्मविश्वास से बोलना”। बहुभाषी व्यक्ति कभी-कभी भाषाओं को मिलाते हैं या शब्द की तलाश करते हैं, जिसे ‘code-switching’ के रूप में जाना जाता है। यह कम प्रवाह का संकेत नहीं देता है, बल्कि कई भाषा प्रणालियों को प्रबंधित करने के मस्तिष्क के तरीके का संकेत देता है।”
चिकित्सा के दृष्टिकोण से, मस्तिष्क विभिन्न भाषाओं को प्रबंधन करने के लिए मजबूत संज्ञानात्मक कार्यों उदाहरण के लिए स्मृति और ध्यान, को मजबूत करना और समस्या-समाधान कोशल का निर्माण करने लगता है। इसके अलावा यदि कोई व्यक्ति किसी एक भाषा का अभ्यास नहीं करता है, तो वह (उसे बोलते समय) संकोच कर सकता है या बोलते समय रुक सकता है।
इसके अलावा, शोध से पता चलता है कि द्विभाषी या बहुभाषी लोगों के मस्तिष्क में संज्ञात्मक नियंत्रण मजबूत होता है, जिससे उनके लिए भाषाओं के बीच स्विच करना आसान हो जाता है। हालांकि यह आमतौर पर बोलने की गति को अस्थायी रूप से धीमा कर देता है, लेकिन यह लंबे समय में मस्तिष्क में तंत्रिका नेटवर्क को मजबूत करता है। अत: एक से अधिक भाषा बोलने से धाराप्रवाहता (speech fluency) या अनुभति क्षमता को नुकसान नहीं होता है।
एलियास आगे बताते हैं, “इसके परिणामस्वरूप शुरूआत में वक्ताओं को किसी भी नई भाषा को बोलने में परेशानी हो सकती है जो कुछ समय में स्वयं दूर हो सकती है। एक कुशल द्विभाषी और बहुभाषी व्यक्ति समय के साथ अपनी सभी भाषाओं में महारत हासिल कर सकते हैं और संज्ञानात्मक लाभ प्राप्त कर सकते हैं।”
भारत में हकलाने वाले लोगों को बहुभाषी संबंधी किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
भारत में हकलाने वाले लोगों को बहुभाषी संबंधी विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए एक साथ कई भाषाओं को बोलना। इसके अलावा भारत में बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं का वातावरण उन्हें तनावग्रस्त कर सकता है।
इसके अलावा उन्हें विभिन्न भाषाई संरचनाओं का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, हिंदी से अंग्रेजी के परिवर्तन में व्याकरणिक और ध्वन्यात्मक अंतर शामिल हैं जो व्यक्ति के हकलाने का कारण बन सकता है। एक भाषा में प्रवाह की थोड़ी कमी लोगों को सचेत कर सकती है, जिससे वे अधिक तनाव महसूस कर सकते हैं, जिससे हकलाने की समस्या बढ़ सकती है।
इसमें सांस्कृतिक और सामाजिक कारक भी शामिल हैं। भारत में, हकलाने जैसे भाषण संबंधी विकारों को सामाजिक त्रुटि के रूप में देखा जाता है। इसका असर कार्यस्थल पर भी पड़ सकता है। उदाहरण के लिए व्यक्ति को प्रस्तुति या साक्षात्कार (interview) देने में परेशानी होती है।
क्या भाषाओं को बदलने (switching languages) से हकलाने की समस्या प्रभावित हो सकती है?
भाषाओं को बदलने से हकलाने की समस्या प्रभावित हो सकती है। उदाहरण के लिए इसमें कमी या बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसा मुख्य रूप से व्यक्ति और संदर्भ के आधार पर होता है। एलियास बताते हैं, “कुछ लोगों में हकलाने की समस्या बढ़ सकती है। ऐसा मुख्य रूप से विभिन्न भाषाई नियम, व्याकरण और उच्चारण के कारण संज्ञात्मक भार के बढ़ने की वजह से हो सकता है। यह समस्या मुख्य रूप से उस व्यक्ति में देखने को मिल सकती है जो किसी भाषा को अच्छे तरह से बोल नहीं पाता है। इसके परिणामस्वरूप चिंता में वृद्धि और धाराप्रवाहता (speech fluency) में कमी हो सकती है।”
इसके विपरीत, व्यक्ति जिस भाषा में सहज होता है उसमें हकलाने की संभावना कम होती है। हकलाने पर शोध से पता चलता है कि भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारक उदाहरण के लिए भाषा के साथ सहजता इसे प्रभावित करते हैं। अत: एक अनुकूल वातावरण में मातृभाषा बोलने से संचार आसान हो सकता है।
एक दिलचस्प तथ्य यह है कि हकलाने वाले कुछ लोगों को सरल ध्वन्यात्मक या धीमी लय वाली भाषाओं में कोई समस्या नहीं होती है। बहुभाषी संदर्भों में स्पीच थेरेपी में अक्सर इस बात पर ध्यान दिया जाता है कि कौन सी भाषाएं हकलाने से प्रभावित होती हैं और उनसे कैसे निपटा जा सकता है।
निष्कर्ष
द्विभाषिकता और हकलाने के बीच एक जटिल संबंध है, जिसे प्रवाह, संज्ञानात्मक भार और सामाजिक कारक जैसे कारक प्रभावित करते हैं। हालांकि इसका भाषण में प्रारंभिक प्रवाह पर प्रभाव पड़ता है लेकिन बहुभाषावाद समय के साथ संज्ञानात्मक क्षमताओं को भी बढ़ाता है। अत: व्यक्तिगत जरूरतों को समझने और सहायक भाषा के प्रयोग का अभ्यास करने से हकलाने को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने में मदद मिल सकती है।
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