मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता क्यों है जरूरी?

मासिक धर्म के प्रति जागरूकता का अभाव थमा नहीं है क्योंकि आज भी ऐसी कई लड़कियां हैं, जो मासिक धर्म के दौरान हुई लापरवाही और अस्वच्छता का परिणाम भुगत रही हैं। पढ़े इस विषय पर एक आलेख… 

menstruation

Last Updated on जुलाई 13, 2023 by Neelam Singh

भारत में मासिक धर्म से संबंधित कई त्यौहार मनाये जाते हैं। उनमें से एक ओडिशा में मनाया जाने वाला रज पर्व अथवा राजा पर्ब उत्सव है। यह तीन दिनों तक चलने वाला एक अनूठा त्योहार है। इस त्यौहार को लेकर मान्यता है कि इस दौरान धरती माता मासिक धर्म से गुज़रती हैं। रज पर्व के दौरान ओडिशा के लोग धरती माता के प्रति सम्मान के रूप में तीन दिनों तक खुदाई, बुवाई एवं जुताई जैसे सभी कृषि कार्यों को रोक देते हैं। इसके अलावा असम के गुवाहटी में मनाया जाने वाला अम्बुबाची मेला भी मासिक धर्म चक्र का ही प्रतीक है। अम्बुबाची शब्द अम्बु और बाची दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है जिसमें अम्बु का अर्थ है पानी और बाची का अर्थ है उतफूलन। यह शब्द स्त्रियों की शक्ति और उनकी जन्म क्षमता को दर्शाता है। इस मेले का आयोजन देवी कामाख्या की रजस्वला अवधि के दौरान किया जाता है, जो कि देवी कामाख्या की प्रजनन क्षमता का प्रतीक है। यही कारण है कि असम में लड़कियों के नारीत्व प्राप्ति को एक रस्म या उत्सव की तरह मनाया जाता है। लेकिन एक तरफ मासिक धर्म के महत्व को दर्शाने के लिए इस तरह के त्योहार मनाए जाते हैं तो दूसरी ही ओर युवतियों एवं महिलाओं के लिए ज़रूरी मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता को कई जगहों पर नज़रंदाज़ किया जाता है।

एक पहलू यह भी 

त्योहारों के यह केवल दो उदाहरण हैं। ऐसे ही मिलते जुलते पर्व भारत के और प्रांतों में भी मनाए जाते हैं। लेकिन जो समाज मासिक धर्म को एक त्यौहार के रूप में मनाता है, वही समाज अपने घरों में रहने वाली किशोरियों को मासिक धर्म के दौरान हेय दृष्टि से देखता है। भारत में किया गया एक शोध मासिक धर्म के दौरान लड़कियों के साथ होने वाले भेदभाव केे बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। जैसे कि मासिक धर्म के दौरान अचार नहीं छूने देना, पूजा घर में प्रवेश करने नहीं देना, रसोईघर में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगाना, ज़मीन पर सोने के लिए बाध्य करना, इत्यादि।

शोध बताते हैं कि भारत के पड़ोसी देश नेपाल में मासिक धर्म के दौरान किशोरियों को पशुओं के तबेले में रहने के लिए बाध्य किया जाता है। इस दौरान माना जाता है कि लड़कियां अपवित्र हो गई हैं इसलिए उनकी छाया भी नहीं पड़नी चाहिए वरना सामने वाला व्यक्ति भी अपवित्र हो जाएगा। 

हो सकती हैं कई बीमारियाँ 

इन उदाहरणों का उद्देश्य समाज के उस छिपे हुए चेहरे को सामने लाना है, जो इन धार्मिक त्यौहारों के पीछे छुपा है। मासिक धर्म एक जैविक प्रक्रिया है, जो लड़कियों के नारीत्व में प्रवेश का संकेत देती है। लेकिन मासिक धर्म को लेकर रूढ़िवादी मानसिकता इस बात का परिचायक है कि यह विषय समाज द्वार अवहेलना का पात्र रहा है और इसकी चुप्पी स्वास्थ्य को लेकर भी कई चिंताएं विकसित करती है। जैसे- मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता ना होने से कई स्वास्थ्य संबंधित बीमारियां होने का खतरा होता है क्योंकि जब तक खुलकर बातचीत नहीं होगी, तब तक यह मुद्दा विचारहीन रहेगा।

मासिक धर्म के दौरान अस्वच्छता के कारण प्रजनन और यूटीआई (Urinary Tract Infection) जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप भविष्य में बांझपन हो सकता है। मासिक धर्म उत्पादों को बदलने के बाद हाथ धोने की उपेक्षा करने से हेपेटाइटिस बी और Thrush जैसे संक्रमण फैल सकते हैं।

मेंस्ट्रुअल कप है विकल्प

मासिक धर्म के प्रति जागरूकता फैलाने की ओर अग्रसर दिप्ती कशालकर एक कैम्पैन चलाती हैं ‘Periods Cup Cause’ के नाम से। उन्होंने मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ्ता के बारे में बताया, “मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता ना होने से कई बीमारियां हो जाती हैं, जिसका नतीजा कई सालों बाद मालूम पड़ता है।”

Dipti

उन्होंने आगे बताया, “देखा जाए, तो आदिवासी इलाकों एवं ग्रामीण-कस्बों में मासिक धर्म से जुड़ी कई वर्जनाएं हैं, जिसका एक कारण आर्थिक तंगी भी है। जिस परिवार की मासिक आय ही 2000 हो, वो कैसे हर महीने 100 रूपये का पैड खरीद सकते हैं। उनके लिए वैसे उपाय कारगर हो सकते हैं, जो किफायती और टिकाऊ हो, जैसे कि मेंस्ट्रुअल कप। इसे एक बार खरीद लेने के बाद कम से कम 8-10 सालों तक निश्चिंत हो सकते हैं। इसलिए आदिवासी या आर्थिक तौर पर कमज़ोर परिवारों के बीच मेंस्ट्रुअल कप का वितरण, इस्तेमाल करने के तरीकों और उसके फायदे के बारे में बताना चाहिए।” 

पाठ्यक्रम में बदलाव ज़रूरी 

Somya Singhal

Her Haq की सह संस्थापक सौम्या सिंघल बताती हैं, “मासिक धर्म के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए सबसे पहले पाठ्यक्रम में बदलाव की ज़रूरत है ताकि बच्चों को मासिक धर्म के बारे में सही जानकारी मिल सके। इससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि विद्यालयोंं में मासिक धर्म से जुड़ा पाठ कलात्मक तरीके से पढ़ाया जाए ताकि बच्चे समझ सकें। वरना बच्चों के लिए इंटरनेट से ज्ञान प्राप्त करना मुश्किल नहीं है लेकिन इंटरनेट से ली गई जानकारी कई बार बच्चों के अंदर नकारात्क प्रवृत्ति गढ़ने का प्रयास करती है। मासिक धर्म के दौरान अस्वच्छता कई बीमारियों की वजह है इसलिए ना केवल लड़कियों को बल्कि लड़कों को भी मासिक धर्म के प्रति साक्षर करना जरूरी है। साथ ही सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि सार्वजनिक वितरण केंद्रों पर भी सैनिटरी पैड उपलब्ध कराया जाए और सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति की ओर ध्यान दिया जाए ताकि लड़कियों को मासिक धर्म के दौरान परेशानी ना हो।” 

ASER की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने आगे बताया, “भारत में केवल 76.2% विद्यालयों में उपयोग योग्य शौचालय हैं जबकि 21% में अनुपयोगी शौचालय सुविधाएं हैं। इनमें से 68.4% विद्यालयों में लड़कियों के लिए अलग उपयोग के लिए शौचालय हैं, जबकि 10.8% में अलग शौचालय की सुविधा नहीं है। कई बार शौचालय की सुविधा नहीं होने के कारण लड़कियों को लड़कों के शौचालय का इस्तेमाल करना पड़ता है। लेकिन लड़कियों को डर भी रहता है कि ‘कहीं किसी को पता लग गया तो?’ शौचालयों की कमी के कारण हर साल 23% लड़कियां विद्यालय छोड़ देती हैं।”

दुनिया अब 6G की ओर बढ़ रही है, नयी तकनीकें आ चुकी हैं और प्रगति का आयाम अब काफी विकसित हो रहा है। ऐसे में मासिक धर्म के प्रति जागरूकता की कमी विकासशील समाज को भी पीछे धकेल सकती है। अगर दूनिया की आधी आबादी स्वस्थ नहीं होगी, तब ना ही आर्थिक विकास संभव है और ना सामाजिक विकास। इसलिए अब समय आ गया है कि लोग अपने सोच के दायरे को संकुचित ना रखें और बदलावों को स्वीकार करें।  

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