प्रोस्टेट एक छोटी, अखरोट के आकार की ग्रंथि है जो केवल पुरुषों में पाई जाती है। यह एक तरल बनाती है जो शुक्राणु को पोषण देता है और उन्हें शरीर में ले जाने में मदद करता है। प्रोस्टेट कैंसर आमतौर पर बुजुर्ग पुरुषों में होता है, जैसे सौम्य प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH) या यह कैंसर। इस लेख में हमने यह जानने का प्रयास किया है कि यह कितनी गंभीर समस्या है ताकि इससे सुरक्षित रहा जा सके।
प्रोस्टेट कैंसर के जोखिम कारक
किसी भी अन्य कैंसर की तरह, प्रोस्टेट कैंसर के विभिन्न कारण हैं। उदाहरण के लिए, व्यक्तिगत, पर्यावरण और आनुवंशिकी।
हालांकि, मुख्य जोखिम कारक है उम्र। अधिकतर मामलों में यह 60 साल या उससे अधिक उम्र के पुरुषों में पाया जाता है। सांवले त्वचा वाले पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर का खतरा गौरी त्वचा वाले पुरुषों की तुलना में अधिक होता है। अगर परिवार में किसी को प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो या यदि BRCA1 और BRCA2 जीन मौजूद हों, तो जोखिम बढ़ जाता है।
चूंकि, प्रोस्टेट ग्रंथि मूत्रमार्ग (urinary tract) के बहुत करीब होती है, इसलिए इसके अधिकांश लक्षण पेशाब से संबंधित होते हैं। इससे लोगों को विभिन्न समस्याएँ हो सकती हैं, पेशाब करने में कठिनाई या दर्द, पेशाब का कमजोर प्रवाह, बार-बार पेशाब की आवश्यकता, विशेषकर रात में, पेशाब या वीर्य में खून, श्रोणि (pelvic) क्षेत्र में असुविधा और स्तंभन दोष (erectile dysfunction)।
कैंसर की कोशिकाएँ फैल सकती हैं इसलिए कभी-कभी प्रोस्टेट कैंसर रोगियों को हड्डियों में दर्द हो सकता है, आमतौर पर रीढ़ की हड्डी या कूल्हे (hip) में। कभी-कभी प्रोस्टेट का बढ़ना केवल रेक्टल जांच (per rectal examination) के दौरान ही पता चलता है और मरीज को कोई लक्षण नहीं होते हैं। अगर किसी व्यक्ति में ऊपर बताए गए जोखिम कारक या लक्षण हों, तो उन्हें तुरंत यूरोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए।
प्रोस्टेट कैंसर की शुरुआती जांच
कैंसर की जांच (Cancer Screening) का अर्थ है कैंसर को उसके लक्षण दिखने से पहले ढूँढना। प्रोस्टेट कैंसर की जांच का उद्देश्य है इसका पता लगाना है, ताकि इसका उपचार किया जा सके और यह पूरे शरीर में फैल सकता है। चूंकि, यह बुजुर्ग पुरुषों में आम है, इसलिए इसकी जांच करना महत्वपूर्ण है। कुछ देशों ने इसके लिए नियमित स्क्रीनिंग प्रोग्राम अपनाए हैं, लेकिन यह अभी भी विवादास्पद विषय है।
प्रोस्टेट कैंसर की जांच ब्लड टेस्ट (PSA – Prostate Specific Antigen) और डिजिटल रेक्टल जांच (DRE) के द्वारा की जाती है। PSA (Prostate-specific antigen) एक प्रोटीन है जो प्रोस्टेट की कैंसर वाली (malignant) और गैर-कैंसर वाली (benign) दोनों प्रकार की कोशिकाओं से बनता है। प्रोस्टेट कैंसर की कोशिकाएँ आमतौर पर बेगिन कोशिकाओं की तुलना में ज्यादा PSA बनाती हैं, जिससे रक्त में PSA का स्तर बढ़ जाता है। PSA का स्तर कुछ दवाइयों जैसे finasteride (Propecia, Proscar) और dutasteride (Avodart), प्रोस्टेट संक्रमण (prostatitis) या बेगिन प्रोस्टेटिक हाइपरट्रॉफी (BPH) जैसी गैर-कैंसर स्थितियों में भी बढ़ सकता है।
प्रोस्टेट कैंसर स्क्रीनिंग
प्रोस्टेट कैंसर स्क्रीनिंग के कुछ लाभ और दुष्प्रभाव हो सकते हैं, जिनकी जानकारी होना आवश्यक है। इसका मुख्य लाभ यह है कि इससे कैंसर का समय रहते पता चल जाता है। इसके विपरीत इसका दुष्प्रभाव यह है कि कि कभी-कभी अत्यधिक जांच (overdiagnosis) और अत्यधिक इलाज (overtreatment) हो सकता है। कुछ प्रोस्टेट कैंसर धीरे बढ़ते हैं, कभी शरीर के बाहर नहीं फैलते, लक्षण नहीं दिखाते और इलाज की आवश्यकता भी नहीं पड़ती है।
अमेरिकन कैंसर सोसाइटी (ACS) की सलाह है कि पुरुषों को यह अवसर मिलना चाहिए कि वे अपने डॉक्टर (health care provider) के साथ मिलकर निर्णय लें कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर की स्क्रीनिंग करानी है या नहीं। यह निर्णय स्क्रीनिंग के अनिश्चितता, जोखिम और संभावित लाभ की जानकारी लेने के बाद लेना चाहिए।
- 50 साल – उन पुरुषों के लिए जिनका प्रोस्टेट कैंसर का जोखिम सामान्य है और जिनकी जीवन प्रत्याशा (life-expectancy) अगले 10 साल है।
- 45 साल – उन पुरुषों के लिए जिनका प्रोस्टेट कैंसर का जोखिम अधिक है। इसमें शामिल हैं: अफ्रीकी अमेरिकी पुरुष जिनके पहले दर्जे के परिवार सदस्य (पिता या भाई) को जल्दी उम्र में (65 साल से पहले) प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो।
- 40 साल – उन पुरुषों के लिए जिनका जोखिम अधिक है अर्थात् जिनके एक से अधिक पहले दर्जे के परिवार सदस्य को जल्दी उम्र में प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो।
55–69 साल के पुरुषों को PSA टेस्ट के लाभ और दुष्प्रभाव की जानकारी होनी चाहिए। PSA टेस्ट से थोड़ी बहुत जीवन सुरक्षा (small survival benefit) मिल सकती है। इसी वजह से इसे ग्रेड C सिफारिश दी गई है, अर्थात् यह सभी के लिए आवश्यक नहीं है, लेकिन सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।
भारत में प्रोस्टेट कैंसर
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) ने 2022 में अपने ड्राफ्ट कंसेंसस में उल्लेख किया है कि: “उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर, किसी भी उम्र के भारतीय जनसंख्या में जनसंख्या-आधारित (population-based) स्क्रीनिंग की सिफारिश नहीं की जा सकती है।” इसका कारण यह है कि प्रोस्टेट कैंसर से संबंधित जीवन रक्षा (cancer-specific survival) में कोई सुधार नहीं हुआ है।इसके अलावा, कुल जीवन रक्षा (overall survival) पर भी नियमित जनसंख्या-आधारित स्क्रीनिंग से कोई लाभ नहीं मिला है, जैसा कि कोक्रेन मेटा-विश्लेषण (Cochrane Meta-analysis) में पाया गया।
प्रोस्टेट कैंसर से मृत्यु में कमी पाने के लिए लगभग 10 साल लग सकते हैं। इसलिए जिन पुरुषों की जीवन प्रत्याशा 10–15 साल से कम है, उन्हें जान लेना चाहिए कि प्रोस्टेट कैंसर की स्क्रीनिंग अधिक लाभदायक नहीं होती है।
अंततः, इसकी जांच करानी है या नहीं, यह निर्णय लोगों को अपने डॉक्टर से चर्चा करने के बाद लेनी चाहिए।
प्रोस्टेट कैंसर बायोप्सी
जब इसका शक होता है, तब अल्ट्रासाउंड (Ultrasonography) और MRI (Magnetic Resonance Imaging) जैसी जांच की जाती है और फिर प्रोस्टेट से कोशिकाओं का नमूना लेकर बायोप्सी (Prostatic Biopsy) की जाती है। अगर बायोप्सी में कैंसर का पता चलता है तो अगला कदम यह जानना होता है कि कैंसर कितना तेज़ी से बढ़ रहा है (grade)। इसके लिए सबसे सामान्य तरीका Gleason स्कोर है। इसमें 6 का स्कोर कम-ग्रेड, 7 का स्कोर मध्यम-ग्रेड, और 8–10 का स्कोर उच्च-ग्रेड (तेज़ बढ़ने वाला) प्रोस्टेट कैंसर दर्शाता है। इसके अलावा, जीनोमिक टेस्टिंग (Genomic Testing) यह पता लगाती है कि कैंसर की कोशिकाओं में कौन-कौन से जीन म्यूटेशन मौजूद हैं।
जब इसका निदान (diagnosis) हो जाता है, तब रोग का स्टेज (Stage) और जोखिम स्तर (Risk Stratification) तय करता है कि इलाज किस प्रकार का होगा। इलाज के विकल्पों में शामिल हैं: सक्रिय निगरानी (Active Surveillance) / इंतजार करके देखना (Waitful Watching), सर्जरी (Surgery), रेडियोथेरेपी (Radiotherapy), हार्मोनल थेरेपी (Hormonal Therapy), कीमोथेरेपी (Chemotherapy) और इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy)।
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