राजस्थान की 18 साल की नूपुर भारद्वाज बधिर लोगों की मदद कर रही हैं। उन्होंने पहली कक्षा में एक बधिर बच्चों से दोस्ती की थी और अपने पिता से भी प्रेरणा मिली। इसके बाद उन्होंने 8 साल तक मेहनत की और ‘संवाद कनेक्ट’ नाम की सेवा शुरू की। संवाद कनेक्ट एक फ्री सेवा है जो स्कूलों, सरकारी दफ्तरों और ऑफिसों में बधिर लोगों (Deaf People) को दूसरों से आसानी से बात करने में मदद करती है। यह सेवा नूपुर के बनाए हुए नूपुर संस्थान के तहत चलती है।
नूपुर भारद्वाज का चयन ISLRTC (इंडियन साइन लैंग्वेज रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर) की मेरिट लिस्ट में हुआ था, जो कि भारतीय सांकेतिक भाषा (Indian Sign Language) में पढ़ाई के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसके बजाय नूपुर ने राजस्थान रिहैबिलिटेशन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (RRRI) से यह कोर्स करने का फैसला किया। ऐसा उन्होंने इसलिए किया ताकि वे राजस्थान के बधिर लोगों की सीधे मदद कर सकें।
व्यक्तिगत अनुभव
नूपुर के जीवन में ये बदलाव अचानक नहीं आया। ये कहानी तब शुरू हुई जब वो सिर्फ 10 साल की थीं। उनके जयपुर के स्कूल में एक नया बच्चा आया जो सुन और बोल नहीं सकता था। स्कूल में कोई भी सांकेतिक भाषा (sign language) नहीं जानता था, इसलिए उस बच्चे के लिए किसी से बात करना बहुत मुश्किल था। लेकिन नूपुर ने अपने पिता, मनोज भारद्वाज से पहले ही थोड़ी बहुत सांकेतिक भाषा सीखी थी। इसी वजह से वो उस बच्चे से बात कर पाईं और उसकी मदद कर सकीं।उस समय नूपुर को समझ आया कि दूसरों की मदद करना बहुत अच्छा लगता है। तभी से उन्होंने अपने पिता के साथ काम करना शुरू कर दिया। अब नूपुर पूरी तरह से बधिर लोगों की सहायता कर रही हैं।
इसके बाद अपने अनुभवों से प्रेरित होकर नूपुर ने कक्षा से बाहर भी बधिर साथियों की मदद करनी शुरू की। सरकारी दस्तावेज़ों और कानूनी कागज़ी कार्रवाई में उनकी सहायता करते हुए, उन्होंने महसूस किया कि सरकारी दफ्तरों में अनुवादकों की कमी है। इसी से ‘संवाद कनेक्ट’ की शुरुआत हुई। वे बताती हैं, “सुगमता सबका अधिकार है और इसमें बधिर समुदाय भी शामिल हैं।” इस साल ‘संवाद कनेक्ट’ को भाषाई समानता और समावेशन पर केंद्रित कई बड़े राज्य कार्यक्रमों में जगह मिली, जिसने इसकी बढ़ती पहुंच और महत्व को और उजागर किया।
लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाना
‘संवाद कनेक्ट’ का नेटवर्क अब तक दर्जनों लोगों को डिजिटल सांकेतिक भाषा उपकरणों का प्रशिक्षण दे चुका है, जो साल 2025 में उनके काम का सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ क्षेत्र है। उनकी कहानी से पता चलता है कि असली बदलाव सिर्फ नीतियों में नहीं, बल्कि सामुदायिक करुणा और जुड़ाव से आता है।

नूपुर भारद्वाज बताती हैं कि “बधिर लड़कियों के शोषण के मामले बहुत चिंताजनक हैं। सांकेतिक भाषा के प्रचार और ज्ञान के अभाव में उन्हें न्याय मिलने में देरी होती है और कभी-कभी उनकी शिकायत भी दर्ज नहीं हो पाती क्योंकि वे क्या बोलना चाहती हैं, ये कोई समझ नहीं पाता। इसके अलावा, अनुवादकों की काफी कमी है, जिसकी वजह से अनेक लड़कियों की आवाज़ दबकर रह जाती है। वे बताती हैं कि एक मामले में नाबालिग को उसके ही परिवार के सदस्य ने शारीरिक शोषण किया लेकिन बच्ची अपनी आपबीती किसी को नहीं बता पाई। मामला उनके संज्ञान में आने पर उन्होंने कानूनी मदद दिलाई और शिकायत दर्ज कराई।”
सबको मिले कानूनी मदद
नूपुर बताती हैं कि “कई बार अपराधी बधिर लोगों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वो अपनी बात कह नहीं पाएंगे। इस सोच को बदलना बहुत जरूरी है।”
नूपुर का मानना है कि हर बधिर व्यक्ति को राहत और कानूनी मदद मिलनी चाहिए और सभी लोगों को कम से कम बुनियादी सांकेतिक भाषा आनी चाहिए। नूपुर का मुख्य उद्देश्य है –सांकेतिक भाषा को बढ़ावा देना, बधिर लोगों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें समाज में बराबरी दिलाना।
निष्कर्ष
नूपुर भारद्वाज ने छोटी उम्र से ही बधिर लोगों की आवश्यकताओं को समझा और उनके लिए काम करना शुरू किया। अपनी पहल ‘संवाद कनेक्ट’ के ज़रिए उन्होंने बधिर लोगों को संवाद, शिक्षा और न्याय जैसी ज़रूरी सेवाओं से जोड़ने का काम किया है। उनका प्रयास यह दर्शाता है कि अगर जज़्बा हो तो कोई भी काम अंसभव नहीं है। नूपुर आज बधिर लोगों की एक मजबूत आवाज़ बन चुकी हैं और समाज को समावेशी बनाने की दिशा में सराहनीय काम कर रही है।
Disclaimer: Medical Science is an ever evolving field. We strive to keep this page updated. In case you notice any discrepancy in the content, please inform us at [email protected]. You can futher read our Correction Policy here. Never disregard professional medical advice or delay seeking medical treatment because of something you have read on or accessed through this website or it's social media channels. Read our Full Disclaimer Here for further information.

