HIV का नाम सुनते ही लोग घबरा जाते हैं क्योंकि इसे एक विवादास्पद विषय माना जाता है। भारतीय समाज में इससे संबंधित सामाजिक त्रुटियां या मिथक भी देखने को मिलते हैं, जिनकी वजह से लोग इसका उपचार समय रहते नहीं करा पाते हैं। चेंजमेकर्स की इस कड़ी में हम गौतम यादव की कहानी लेकर आए हैं, जो न सिर्फ HIV के प्रति जागरूकता फैला रहे हैं बल्कि इससे पीड़ित लोगों की भी सहायता कर रहे हैं।
दिल्ली के रहने वाले गौतम यादव को साल 2009 में पता चला कि उन्हें HIV है, तब से वे लोगों में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि HIV को लेकर लोगों के मन में वास्तविक जानकारी से ज्यादा भ्रामक और मिथक हैं, जो उन्हें गुमराह करती है। अत: उनकी वास्तविकता जानना महत्वपूर्ण है।

गौतम बताते हैं, “हमारे समाज में HIV को लेकर एक मिथक है कि इससे लोग जल्दी मर जाते हैं लेकिन यह सच नहीं है। इसके अलावा, लोग अधूरी जानकारी के कारण अपनी जान को खतरे में डाल देते हैं। ध्यान रखें कि HIV का अर्थ जीवन का समाप्त होना नहीं है बल्कि इसका प्रबंधन करना संभव है। उदाहरण के लिए, सही आहार का करना।”
अभिनेता बनने के सपने का टूटना
जब गौतम 18 साल के थे, तब उन्हें पता चला कि वे HIV से पीड़ित हैं। एक समय था, जब गौतम चाहते थे कि वे एक अभिनेता बने लेकिन जब HIV से पीड़ित होने का पता चला तो उनका यह सपना टूट गया। उनके मन में नकारात्मक विचार आने लगे लेकिन उन्होंने स्वयं को संभाला और यह सोचा कि इस रोग से पीड़ित कितने ही लोगों के मन में यही विचार आते होगें। अत: उन्होंने HIV से संबंधित अधिक-से-अधिक जानकारी प्राप्त करना शुरू किया ताकि वे लोगों के इन प्रश्नों के उत्तर दे सकें।

वर्तमान में गौतम एक गैर-सरकारी संस्था के साथ मिलकर HIV के प्रति जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। इसके साथ ही ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों की भी सहायता कर रहे हैं। इसके तहत वे लोगों को HIV से जुड़ी गलतफहमियों और सामाजिक भेदभाव से बाहर निकलने में मदद करते हैं। साथ ही, उन्हें सही जानकारी, काउंसलिंग, समय पर जांच और इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में भेजने में भी मदद करते हैं। अब तक वे 500 से ज़्यादा HIV पॉजिटिव लोगों की मदद कर चुके हैं।
लोग ताना मारते थे
गौतम बताते हैं कि “अधिकांश लोगों को मेरा काम पसंद नहीं है क्योंकि उन्हें लगता है कि मैं समाज में HIV संक्रमण फैला रहा हूं इसलिए वे मुझे ताना मारते थे।” जब वे किशोर थे, तब उन्हें सेक्सुअल ओरिएंटेशन के बारे में जानकारी नहीं थी लेकिन एक बार उन्हें प्रिंस मानवेंद्र सिंह गोहिल से बात करने का मौका मिला, जो स्वयं भारत के पहले खुले तौर पर समलैंगिक घोषित हुए राजकुमार हैं।
गौतम आगे बताते हैं, “अन्य किशोरों की तरह मुझे भी नहीं पता था कि मेरे साथ क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है। मैं अकेला महसूस कर रहा था। साल 2008 में इंटरनेट की बेहतर सुविधा नहीं थी। टीवी पर एक इंटरव्यू देखकर मुझे समलैंगिकता के बारे में पता चला और फिर प्रिंस मानवेंद्र से संपर्क किया। उन्होंने मुझे नाज़ फाउंडेशन से जुड़ने की सलाह दी। काउंसलिंग के जरिए मुझे पता चला कि मैं समलैंगिक हूं।”
लोगों की बात पर ध्यान देना बंद करना
चूंकि, गौतम के एक से अधिक साथी दे इसलिए कांउसलर ने उन्हें HIV एड्स की जांच कराने की सलाह दी और इस प्रकार उनके इससे पीड़ित होने की पुष्टि हुई।
गौतम बताते हैं, “आज भी जब लोगों को पता चलता है कि मैं पॉजिटिव हैं, तब सबसे पहले उनके मन में यही सवाल आता है कि मैं कितने दिन और जिंदा रहूंगा। मुझे भी नहीं पता था कि मैं कितने समय तक जी पाऊंगा। मेरे बाद मेरे माता-पिता का ख्याल कौन रखेगा? इस तरह के सवाल मन में बार-बार उठने लगे थे जिनकी वजह से मैं चिंतित रहने लगा।”
हालांकि, इस दौरान गौतम की हालत थोड़ी नाज़ुक थी लेकिन उन्होंने HIV से पीड़ित लोगों से मिलना नहीं छोड़ा। इससे उन्हें समझ आया कि समय पर दवाई लेना और आवश्यक सावधानी बरतना कितना महत्वपूर्ण है। अत: गौतम ने लोगों की बात पर ध्यान देना बंद कर दिया।
लोगों की मानसिकता बदलना आवश्यक है
आधुनिक युग में भी HIV के प्रति लोगों की रूढिवादी सोच देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए, टीवी पर इसके विज्ञापन आने पर चैनल को बदलना। लोगों के इसी रवैये के कारण इस बीमारी का खतरा लोगों (विशेष रूप से युवाओं) में फैल रहा है और वे दवाई लेने से कतरा रहे हैं।
निष्कर्ष
गौतम को अपने निजी जीवन में लोगों के तानों का सामना करना पड़ा, जिनसे वे बिल्कुल भी नहीं घबराएं। उन्होंने अपने प्रयासों को जारी रखा और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा, अब तक वे अमेरिका, स्विट्ज़रलैंड और थाईलैंड जैसे 25 से ज़्यादा देशों में कॉन्फ्रेंस के लिए जा चुके हैं और हमसफर ट्रस्ट तथा यूनेस्को जैसी कई संस्थाओं से मिलकर काम कर रहे हैं।
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