पार्किंसन बीमारी में रोजमर्रा के काम करना मुश्किल हो जाता है, जैसे चलना, उठना-बैठना, बोलना, कपड़े पहनना और लिखना। इसके कारण व्यक्ति उदास या परेशान हो सकता है और अक्सर दूसरों पर निर्भर रहने लगता है। वरिष्ठ नागरिक इस बीमारी से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं और उन्हें रोजमर्रा के कामों में हमेशा किसी की मदद की आवश्यकता महसूस होती है। ऐसे में WALK नामक यंत्र लाभदायक साबित हो सकता है, जिससे पार्किंसन (Parkinson’s Disease) रोगी अपना जीवन आसानी से जी सकते हैं।
इस समस्या को दूर करने हेतू WALK नामक एक नया आविष्कार किया गया। WALK एक पहनने योग्य मेडिकल डिवाइस है, जिसे डॉक्टरों की पुष्टि के साथ विकसित किया गया है और यह विशेषकर पार्किंसन रोगियों में चलने में रुकावट (FOG – फ्रीजिंग ऑफ गेट) को कम करने के लिए बनाया गया है। इसे मुंबई की हेल्थ टेक्नोलॉजी कंपनी लाइफस्पार्क टेक्नोलॉजीज ने तैयार किया है। यह डिवाइस पैरों में पहनने के लिए है और इसे मोबाइल ऐप और क्लाउड-आधारित क्लिनिकल मॉनिटरिंग सिस्टम से जोड़ा जा सकता है, जिससे मरीज की चलने की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सकती है।

इस डिवाइस को इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर अमे देसाई ने डॉ. देवेंद्र देसाई के साथ मिलकर विकसित किया, जो लगभग तीन दशकों के अनुभव वाले सीनियर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट हैं। WALK के पीछे प्रेरणा दोनों, व्यक्तिगत और वैज्ञानिक, थी। देसाई को अपने दादाजी के अनुभवों से पार्किंसन बीमारी के बारे में समझ मिली और साथ ही BITS पिलानी और लीड्स यूनिवर्सिटी में न्यूरल मोटर कंट्रोल पर उनकी अकादमिक ट्रेनिंग ने इस डिवाइस के डिज़ाइन और सोच को आकार दिया।
कदमों के लय की मोनिटरिंग
WALK एक पहनने योग्य डिवाइस है, जिसे पैरों के निचले हिस्से पर पहना जाता है। यह चलते समय पैरों की गति को लगातार मापता और ट्रैक करता है। इसमें एक्सेलेरोमीटर, जाइरोस्कोप और इनर्टियल मेज़रमेंट यूनिट्स लगे होते हैं और जब व्यक्ति अचानक रुकने लगता है या कदमों की लय बिगड़ती है, तब यह डिवाइस हल्की कंपन और हल्का इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजता है। ये संकेत व्यक्ति को फिर से सही तालमेल में चलने में मदद करते हैं।
यह डिवाइस एक स्मार्टफोन ऐप से जुड़ा होता है, जिससे मरीज अपनी थेरेपी सेटिंग्स बदल सकते हैं, चलने की प्रगति देख सकते हैं और पार्किंसन में एक्सरसाइज कर सकते हैं। साथ ही इसमें एक क्लाउड प्लेटफ़ॉर्म भी होता है, जहां चलने का डेटा सुरक्षित रहता है और डॉक्टर दूर से मरीज की स्थिति देख सकते हैं तथा इलाज को बेहतर बना सकते हैं। इससे घर पर भी लगातार चिकित्सीय देखभाल संभव हो पाती है।
कई पड़ावों से गुजरना पड़ा
WALK को मेडिकल डिवाइस के नियमों के अनुसार बनाया गया है। इसकी रिसर्च 2018 में शुरू हुई और 2021 में इसका प्रोटोटाइप तैयार हुआ। मरीज़ों और न्यूरोलॉजिस्ट की प्रतिक्रिया के आधार पर इसमें लगातार सुधार किए गए। कंपनी को ISO 13485 सर्टिफिकेशन मिला, जो मेडिकल डिवाइस की क्वालिटी का मानक है। इसके बाद CDSCO से टेस्ट लाइसेंस मिला, जिसमें डिवाइस की सुरक्षा, शरीर के साथ तालमेल और इलेक्ट्रिकल सुरक्षा की जांच की गई। सभी टेस्ट पास होने के बाद मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस भी मिला।
इसके साथ ही, WALK का क्लिनिकल ट्रायल बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (NIMHANS) में न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों की देखरेख में किया गया। 20 पार्किंसन मरीज़ों पर किए गए ट्रायल में डिवाइस ने अच्छी प्रतिक्रिया दिखाई। इसके नतीजों से पता चला कि दवा और फिजियोथेरेपी को साथ में प्रयोग करना लाभदायक हो सकता है।
लाइफस्पार्क टेक्नोलॉजीज को IIT बॉम्बे के SINE इनक्यूबेशन सेंटर का भी सहयोग मिला, जहां उन्हें प्रोटोटाइप बनाने, डॉक्टरों के नेटवर्क और मेंटरशिप की सुविधा मिली। हालांकि, इस डिवाइस की कीमत करीब 50,000 रुपये है, लेकिन कंपनी इसे और सस्ता बनाने की कोशिश कर रही है ताकि ज्यादा लोग इसका फायदा उठा सकें।
विज्ञान के समावेशन का कमाल

WALK जैसे पहनने वाले उपकरण से पता चलता है कि भारत में किए गए आविष्कार पार्किंसन जैसी पुरानी बीमारियों में कैसे सहायता कर सकते हैं। जैसे-जैसे वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे पार्किंसन रोगियों की संख्या भी बढ़ती है और अस्पतालों पर मरीजों के उपचार का दबाव बढ़ता है। ऐसे में घर पर रिहैब, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और डॉक्टर की निगरानी से इलाज आसान और सुरक्षित हो सकता है।
निष्कर्ष
WALK से यह भी पता चलता है कि इंजीनियरिंग, मेडिकल साइंस और तकनीक मिलकर स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बना सकते हैं। इस प्रकार की तकनीक स्ट्रोक, मूवमेंट डिसऑर्डर और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल में भी काम आ सकती है। इससे मरीज़ों की आज़ादी, सम्मान और जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है।
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