जब अंशु राजपूत नौकरी के इंटरव्यू में जाती हैं, तब उन्हें पहले से पता होता है कि क्या होगा। वे बताती हैं, “लोग मेरे चेहरे को देखकर ही मना कर देते हैं।” अंशु एक एसिड अटैक सर्वाइवर हैं। उनकी कहानी सिर्फ एसिड अटैक के दर्द की नहीं, बल्कि रोज़ होने वाले भेदभाव की भी है, जो उनके आत्मविश्वास और अवसरों को प्रभावित करता है। लेकिन इसी कहानी में बदलाव की उम्मीद भी छिपी है। इन लोगों को बेहतर जीवन देने का काम कर रहा है Chhanv Foundation, जिसकी कहानी इस लेख में दी गई है।
आंकड़ों से संकट का पता चलना
भारत में एसिड अटैक जेंडर-आधारित हिंसा का गंभीर रूप है। शारीरिक चोटों के इलाज के बाद भी सर्वाइवर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती लोगों का सामना करना होता है।
इसी को समझने के लिए The George Institute for Global Health India ने Chhanv Foundation के साथ मिलकर एक अध्ययन किया है, जिसमें सामने आया कि सामाजिक वर्जना कई बार शुरुआती चोट जितना ही नुकसानदायक होती है। Chhanv Foundation एक गैर-सरकारी संस्था है, जो एसिड अटैक सर्वाइवर्स को समाज में अपनी पहचान बनाने में सहायता करता है।
अभियान के शुरूआत की कहानी
साल 2013 में स्थापित Chhanv Foundation की शुरूआत “स्टॉप एसिड अटैक्स” अभियान से हुई थी और अब तक यह पहल 100 से अधिक सर्वाइवर्स के पुनर्वास में मदद कर चुकी है।
इसी काम को और मजबूत बनाने के लिए संस्था ने शोध के साथ मिलकर सर्वाइवर्स के अनुभवों को गहराई से समझने की कोशिश की है। यह अध्ययन नोएडा में नवंबर 2023 से अप्रैल 2024 के बीच हुए हुआ और इसमें 8 महिला सर्वाइवर्स शामिल थीं। इसमें बॉडी मैपिंग तकनीक का प्रयोग किया गया, जिसमें महिलाओं ने अपने शरीर की आकृतियों पर अपने दर्द, अनुभव और संघर्ष को उकेरा।
यह तरीका खास इसलिए था क्योंकि कई बार ट्रॉमा या भाषा की सीमाओं के कारण सर्वाइवर्स अपनी बात शब्दों में नहीं कह पाते लेकिन चित्रों के माध्यम से वे अपनी पूरी कहानी सामने रख पाते हैं।
एसिड सर्वाइवर्स के प्रति सामाजिक रवैया
अध्ययन और ज़मीनी अनुभव दोनों यही बताते हैं कि एसिड अटैक के बाद की सबसे बड़ी लड़ाई शरीर से नहीं बल्कि समाज से होती है। कई बार लोगों का घूरते हुआ चेहरा या बार-बार पीछे मुड़कर देखना और देखकर अपने मुंह या आंखों को ढंक लेना समाज का एक अलग चेहरा प्रस्तुत करता है।
इस शोध के जरिए सर्वाइवर्स से निम्नलिखित बातें सामने आईं-
- उन्हें सार्वजनिक जगहों पर घूरा जाता है और जज किया जाता है
- इससे उनमें आत्मसम्मान में कमी, चिंता और अवसाद बढ़ता है
- कई बार परिवार के अंदर भी अस्वीकृति और हिंसा झेलनी पड़ती है
- उनके चेहरे के कारण उन्हें पढ़ाई और नौकरी के अवसर नहीं मिलते हैं
यही वजह है कि कई महिलाएं आर्थिक और सामाजिक रूप से फिर से खड़े होने में संघर्ष करती हैं।
कुछ साहसी महिलाएं
इन चुनौतियों के बीच Chhanv Foundation सर्वाइवर्स को सिर्फ सहारा नहीं देता बल्कि उन्हें समाज में बदलाव लाने का अवसर देता है।
मुख्य उदाहरण Sheroes Hangout Café है, जहां सर्वाइवर्स खुद काम करती हैं। ये कैफे आगरा, लखनऊ, नोएडा और दिल्ली में मौजूद है, जो महिलाओं को रोजगार देकर उनके अंदर आत्मविश्वास का निर्माण करता है। साथ ही, समाज की सोच को बदलने के लिए मजबूर करता है।
यहां आने वाले लोग सिर्फ चाय-कॉफी नहीं पीते हैं, बल्कि एक नई सोच लेकर जाते हैं। काउंसलिंग, आपसी सहयोग और साझा अनुभव भी सर्वाइवर्स को मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं, जो शोध में भी सामने आया है कि सहयोग और अपने अनुभव साझा करना आत्मस्वीकृति में अहम भूमिका निभाते हैं।
बदलाव की आवश्यकता क्यों

आलोक दीक्षित, संस्थापक, Chhanv Foundation बताते हैं, “हम चाहते हैं कि सरकार सिर्फ अपातकालीन इलाज तक सीमित ना रहे बल्कि लंबे समय तक पुनर्वास पर निवेश करे। सर्वाइवर्स को भी वही अधिकार मिलने चाहिए जो किसी और को मिलते हैं।”
अजीत सिंह, चीफ ऑपरेशंस ऑफिसर, Chhanv Foundation बताते हैं, “Chhanv से जुड़ी कई लड़कियां और महिलाएं अपने दर्द को आवाज़ और जागरूकता में बदल रही हैं। यह अध्ययन ना सिर्फ उनकी चुनौतियों को सामने लाता है बल्कि उनकी ताकत को भी दिखाता है।”

प्रतिष्ठा सिंह, मुख्य लेखिका और शोधकर्ता, The George Institute for Global Health India बताती हैं, “सामाजिक वर्जना कई बार शुरुआती चोट जितना ही अपंग करने वाला साबित होता है। सर्वाइवर्स को परिवारों से अस्वीकृति, शिक्षा और रोजगार में बाधाओं और सार्वजनिक स्थानों पर लगातार निगरानी और आलोचना का सामना करना पड़ता है। ये सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदियां नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और शासन तंत्र की विफलताएं हैं।”
नई पहचान की ओर बढ़ते कदम

Chhanv Foundation का काम यह दिखाता है कि एसिड अटैक के बाद जीवन रुकता नहीं है। अगर सही समर्थन मिले, तो वहीं से एक नई शुरुआत होती है। यह कहानी सिर्फ सर्वाइवर्स की नहीं, बल्कि उस बदलाव की है, जिसमें वे खुद नेतृत्व कर रही हैं।
साथ ही समय-समय पर विभिन्न शोध भी महिलाओं के इस दर्द को सामने लाने की कोशिश करते हैं, ताकि वे अपने अंदर की व्यथा को भले ही बोलकर अगर व्यक्त ना कर पाएं, तो भी उनके पास दूसरा माध्यम अवश्य हो, जिसके जरिए वे अपनी बातों को साझा कर सकें।
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