जलवायु परिवर्तन अब एक गंभीर विषय बन गया है, जिसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ रहा है, विशेषकर भारत में जहां कई लोग सीमित संसाधनों में रहते हैं। बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और पानी की कमी से बीमारियां, कुपोषण और मानसिक तनाव बढ़ रहे हैं।
इस स्थिति में महिलाएं अहम भूमिका निभा रही हैं। वे लोगों को जागरूक कर रही हैं—जैसे घर ठंडा रखने के तरीके बताना या लू से बचाव सिखाना। अपने अनुभव और जुड़ाव से वे असरदार समाधान निकाल रही हैं।
इसलिए जलवायु और स्वास्थ्य के मुद्दों पर महिलाओं की भूमिका को समझना और मजबूत करना महत्वपूर्ण है क्योंकि असली बदलाव यहीं से शुरू होता है।
महिलाएं संभालती हैं मोर्चा
पिछले कुछ सालों में भारत का तापमान लगातार बढ़ रहा है और लू पहले से ज्यादा तेज़ और लंबी हो गई है। इससे शरीर में पानी की कमी, लू लगना, गर्भवती महिलाओं में समस्याएं और वरिष्ठ नागरिकों में बीमारियां बढ़ रही हैं।
ऐसे समय में महिलाएं सबसे अहम भूमिका निभा रही हैं। वे घर में बढ़ती गर्मी, पानी की कमी और सफाई की समस्याओं को सबसे पहले समझती हैं और उनके आसान समाधान ढूंढती हैं—जैसे घर ठंडा रखना, पानी का सही प्रयोग और लू से बचाव।
समुदाय में भी महिलाएं जागरूकता फैलाती हैं। वे लोगों को ज्यादा पानी पीने, धूप से बचने, हल्का खाना खाने और समय पर इलाज कराने की सलाह देती हैं।
शहरी बस्तियों में महिलाओं की पहल

अहमदाबाद की झुग्गी बस्तियों में Mahila Housing Trust से जुड़ी महिलाएं अत्यधिक गर्मी से निपटने के लिए सरल लेकिन प्रभावी समाधान अपना रही हैं। इसके तहत सफेद सोलर रिफ्लेक्टिव पेंट और बांस की छत जैसी तकनीकों का प्रयोग किया जा रहा है।
यह खास सफेद पेंट जब छतों पर लगाया जाता है, तब यह सूरज की गर्मी (सोलर रेडिएशन) को वापस परावर्तित कर देता है। इससे घर के अंदर का तापमान काफी कम हो जाता है और बाहर तेज गर्मी होने के बावजूद घर के अंदर रहना संभव हो पाता है।
टिन और एस्बेस्टस की छतों वाले घरों में गर्मी बहुत तेजी से बढ़ती है। इसे “कूल रूफ” तकनीक कहा जाता है। Natural Resources Defense Council द्वारा समर्थित अध्ययनों में भी पाया गया है कि यह पहल गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में प्रभावी है।
इस पहल के तहत:
- घरों के अंदर का तापमान 2 से 5 डिग्री तक कम पाया गया
- महिलाएं समुदाय में हीट स्ट्रेस, पानी पीने और वेंटिलेशन पर जागरूकता फैलाती हैं
- स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर पानी और साफ-सफाई की सुविधाएं बेहतर करने पर काम करती हैं
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका
जहां शहरों में महिलाएं घरों को ठंडा बना रही हैं। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत काम करने वाली आशा कार्यकर्ता लोगों की जान बचाने में जुटी हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ये महिलाएं हीटवेव के दौरान सबसे आगे रहती हैं।
बिहार में हर साल गर्मी के मौसम में AES (Acute Encephalitis Syndrome) के कारण हज़ारों बच्चे अस्पताल में भर्ती होते हैं। इस दौरान बच्चों की सही देख-रेख के बारे में अभिभावकों को सही जानकारी देने का काम आशा कार्यकर्ताओं के जिम्मे होता है।
उनकी मुख्य भूमिकाएं निम्नलिखित होती हैं:
- घर-घर जाकर पानी पीने, ORS लेने और लू के लक्षणों के बारे में बताना
- गर्भवती महिलाओं, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को दोपहर की तेज धूप से बचने की सलाह देना
- समय रहते हीटस्ट्रोक के लक्षण पहचानना
- आवश्यकता पड़ने पर लोगों को स्वास्थ्य केंद्रों से जोड़ना
आशा कार्यकर्ताओं की मुख्य विशेषता समुदाय का भरोसा है। इसी भरोसे के कारण उनकी दी गई सलाह को लोग अपनाते हैं, जिससे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को रोका जा सकता है।

रिता देवी, आशा कार्यकर्ता बताती हैं, “जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल प्रभाव ना केवल महिलाओं पर बल्कि हर एक व्यक्ति पर पड़ता है लेकिन महिलाएं इससे बचने के लिए जो समाधान ढूंढ़ती हैं, वो कहीं ना कहीं समाज के लिए भी उपयोगी साबित होते हैं।”
ये उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण हैं?
अहमदाबाद की बस्तियों से लेकर बिहार के गांवों तक ये कहानियां एक महत्वपूर्ण सच्चाई दिखाती हैं। महिलाएं केवल जलवायु परिवर्तन की पीड़ित नहीं हैं बल्कि वे समाधान का नेतृत्व करने वाली शक्ति भी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण महिलाओं के ऊपर हिंसात्मक व्यवहार के आंकड़े बढ़े हैं लेकिन महिलाएं इसे कम करने के लिए प्रयासरत भी हैं।
उनके प्रयास कम लागत वाले और स्थानीय स्तर पर लागू होने वाले हैं। वे स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों को साथ में संबोधित करते हैं और समुदाय की वास्तविक आवश्यकताओं पर आधारित होते हैं। इससे लोगों का जुड़ाव और भरोसा भी बढ़ जाता है।
जैसे-जैसे जलवायु संकट गहराता जा रहा है, वैसे-वैसे यह आवश्यक है कि महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे इन प्रयासों को नीतियों में जगह मिले, ऐसे समुदाय-आधारित मॉडलों को विस्तारित किया जाए और आशा जैसी प्रणालियों को और मजबूत किया जाए।
बदलते जलवायु के इस दौर में सबसे असरदार समाधान अक्सर वहीं से आते हैं, जहां लोग समस्या को रोज़ जीते हैं और इन समाधानों की अगुवाई आज महिलाएं कर रही हैं।
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