कैंसर गंभीर रोगों में से एक है, जिसकी पहचान और इलाज समय रहते न किया जाए तो यह जानलेवा साबित हो सकता है। हर साल लाखों लोगों को कैंसर की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ती है। कैंसर के विभिन्न प्रकार हैं, जिनमें हड्डी कैंसर भी शामिल है। हालांकि, यह चिंताजनक है कि प्रति वर्ष हड्डी कैंसर के मामलों में वृद्धि हो रही है लेकिन इसकी रोकथाम भी संभव है। इस लेख में हमने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है।
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम (ICMR-NCDIR) का अनुमान है कि साल 2025 तक देश में कैंसर के मामलों में 12% की वृद्धि होगी। हालांकि, हड्डियों में दर्द विभिन्न कारणों से हो सकता है, जिसमें मामूली चोट, गठिया जैसी स्थितियों से लेकर हड्डी का कैंसर जैसे कारक शामिल है। हड्डी कैंसर के मुख्य लक्षणों में लगातार हड्डियों में दर्द होना, सूजन, थकान या वजन घटना शामिल हैं।
जब लापरवाही बन गई बड़ी भूल
उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के गांव गोलीमोहर में रहने वाले बहादुर सिंह के परिवार की एक घटना हमें सिखाती है कि स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है।
इस परिवार के एक सदस्य बताते हैं, “बहादुर सिंह को एक दिन काम करते समय पैर की उंगली में चोट लग गई थी। हमें लगा कि यह मामूली चोट है, इसलिए हमने इसे गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन धीरे-धीरे यह दर्द बढ़ता गया और इलाज न मिलने के कारण उनकी उंगली काटनी पड़ी।”
कुछ समय तक आराम मिला, लेकिन फिर संक्रमण घुटने तक फैल गया। इसके बाद डॉक्टरों को घुटने के नीचे से पैर काटना पड़ा। तीन साल तक वे कृत्रिम पैर की मदद से चलते रहे, लेकिन आखिरकार उन्हें हड्डी का कैंसर हो गया जिसकी वजह से उनकी मृत्यु हो गई।
इस घटना से हमें एक बड़ी सीख मिली है – किसी भी शारीरिक समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लापरवाही कभी-कभी बहुत भारी पड़ सकती है।
मुख्य कारण
पर्वतीय क्षेत्रों में हड्डियों के कैंसर के मामलों के बढ़ने का मुख्य कारण जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है। हड्डियों के कैंसर को आमतौर पर दो वर्ग में वर्गीकृत किया जाता है। पहला- प्राथमिक जो हड्डी के भीतर होता है एवं दूसरा- जो अन्य अंग से शुरू होकर हड्डियों में फैल जाता है। इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च एंड हेल्थ साइंसेज के अनुसार ओस्टियोसारकोमा, इविंग सारकोमा बच्चों और किशोर में होता है मगर ओस्टियोसारकोमा विश्व स्तर पर सबसे अधिक पाया जाने वाला हड्डियों का ट्यूमर है। इविंग सारकोमा 0-19 वर्ष आयु वर्ग में अधिक पाया जाता है। वहीं, 10-14 व 15-19 वर्ष आयु वर्ग में भी इसका अनुपात सबसे अधिक पाया जाता है।
हड्डी कैंसर में ओस्टियोसारकोमा कोशिकाओं से उत्पन्न होने वाला मुख्य कैंसर है, जो बड़ी हड्डियों के छोरों पर होता है। इविंग सारकोमा एक प्रकार की कोशिका से उत्पन्न होने वाला ट्यूमर है, जो हड्डियों या कूल्हों, पसलियों, कंधें की हड्डियों एवं पैरों के आस-पास नरम उतकों में होता है। वहीं, चोंड्रोसारकोमा कार्टिलेज में उत्पन्न होता है, जो हाथ, पैर या श्रेणी की हड्डियों को प्रभावित करता है। इसके अलावा, मेटास्टेटिस हड्डी कैंसर सामान्य रूप से शरीर के अन्य भागों में उत्पन्न होता है। कैंसर कोशिकाएं अपने प्राथमिक स्थान से हड्डियों में स्थानांतरित होती है, जिसे मेटास्टेटिक कैंसर कहा जाता है।
हालांकि, हड्डियों के कैंसर को रोकना किसी चुनौती से कम नहीं है लेकिन कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाकर ऐसा किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, संतुलित आहार करना।

चंद्रकला बिष्ट, गांव चैखुटा, विकासखण्ड धारी, जनपद नैनीताल उत्तराखंड बताती हैं, “पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का समय जटिल कार्यो को करने में व्यतीत होता है, जिसमें शारीरिक गतिविधि काफी अधिक होती है। अक्सर इन कामों को करने में चोट लगने का खतरा बना रहता है। कई बार महिलाएं घास, लकड़ी, पानी के लिए जंगलों में जाती हैं, जहां अक्सर गिरनें से उनकी हड्डियां टूट जाती हैं। नजदीकी स्वास्थ्य केन्द्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक ना होने के कारण वे उपचार नहीं करा पाती हैं। अधिकांश लोग घरेलू उपचार पर निर्भर रहते हैं, जो कई बार हड्डी कैंसर का रूप धारण कर लेता है। इस क्षेत्र के स्वास्थ्य केन्द्रों में डाॅक्टरों एवं उपकरणों का अभाव भी हड्डी कैंसर की संभावना को बढ़ा रहा है।”

डाॅ प्रमोद चैरसिया, हरीओम हाॅस्पिटल, लखनऊ बताते हैं, “हड्डियों के कैंसर के लिए मुख्य कारक -आनुवंशिक है इसलिए लोग इसके प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं। इसके साथ ही लंबे समय तक ऐसे व्यक्ति के सम्पर्क में रहने, लंबे समय से हड्डियों में संक्रमण से इसके बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। अक्सर पाया गया है कि लोगों द्वारा लापरवाही बरतने से हड्डियों के कैंसर के मामलों में वृद्धि हो रही है। अत: इसके प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। इस स्थिति में कुछ सामान्य टेस्ट जैसे- एक्स-रे, सीटी स्कैन, MRI स्कैन एवं PIT स्कैन कराना लाभकारी हो सकता है।”
खून की जांच से यह पता चल सकता है कि शरीर में कुछ एंजाइमों का स्तर बढ़ा हुआ है, जो हड्डियों में ट्यूमर होने का संकेत दे सकता है। लेकिन केवल खून की जांच से हड्डी के कैंसर की पुष्टि नहीं की जा सकती है। इसकी सही पहचान के लिए बायोप्सी की जरूरत होती है। बायोप्सी में डॉक्टर संदिग्ध जगह से ऊतक (टिशू) का नमूना लेते हैं और जांच कर यह पता लगाते हैं कि उसमें कैंसर की कोशिकाएँ हैं या नहीं।
निष्कर्ष
हड्डी कैंसर से पीड़ित लोगों की संख्या के कम होने का दावा विभिन्न रिपोर्टों में किया गया है लेकिन इसके गंभीर रूप लेने पर इसका इलाज करना मुश्किल हो जाता है। अत: जरूरी है कि लोग अपनी हड्डियों के स्वास्थ्य को लेकर जागरूक रहें और किसी भी असामान्य लक्षण नज़र आने पर डॉक्टर से तुरंत मिले।
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