जानें रक्त दाता एवं प्राप्तकर्ता के लिए क्यों जरूरी है NAT

रक्तदान भले ही महादान हो लेकिन कभी-कभी परोपकार की उम्मीद से किया गया कार्य भी किसी के लिए जानलेवा बन सकता है, अगर उसे बिना जांचे-परखे किया गया हो।

blood donation

Last Updated on जून 21, 2023 by Neelam Singh

एक गर्भवती महिला को प्रसव के दौरान रक्त की कमी होने के कारण रक्त चढ़ाना पड़ा और कई अस्पतालों में यह एक सामान्य प्रक्रिया है। अस्पताल से वापस आने के करीब 1-2 हफ्तों के बाद महिला की तबीयत बिगड़ने लगी। जैसे – चक्कर, मिचली, थकान, बुखार, कमजोरी आदि की समस्या आनी लगी। पहले तो उसने इसे सामान्य लक्षण समझकर नजरअंदाज कर दिया लेकिन जब स्थिति ख़राब होने लगी, तब चिकित्सीय परामर्श में पता चला कि उन्हें एचआईवी एड्स है जबकि उन्हें इस बीमारी के होने का कोई अंदाजा नहीं था। बाद में जब छानबीन की गई तब पता चला कि प्रसव के दौरान जो रक्त चढ़ाया गया था, उसमें एचआईवी एड्स का संक्रमण था जबकि रक्त चढ़ाने से पहले उसकी जांच भी की गई थी लेकिन उस महिला को संक्रमण हो चुका था। (पीड़ित महिला के परिजन द्वारा साझा की गई जानकारी)

रक्त दान को महादान कहा जाता है क्योंकि रक्त की बूंदें किसी व्यक्ति के जीवन को बचाने में सक्षम होती हैं लेकिन रक्त को महादान तभी कहा जा सकता है, जब रक्त दान किसी व्यक्ति के जीवन को बचा सके। कई बार लोग जाने-अनजाने में बिना रक्त की जांच किए रक्त चढ़ा देते हैं, जिससे प्राप्तकर्ता कई बीमारियों के चपेट में आ सकते हैं। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसा 

विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि दान किए गए रक्त का उपयोग करने से पहले संक्रमण की जांच की जानी चाहिए, जिसमें एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और सिफलिस की जांच अनिवार्य होनी चाहिए। रक्त दान किए गए रक्त की स्क्रीनिंग के लिए ELISA तकनीक की सहायता लेकर Transfusion Transmitted Infectious Marker (TTIs) टेस्ट किया जाता है। 

साथ ही विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बात की भी अनुशंसा करता है कि प्रभावी संगठन और एकीकृत रक्त आपूर्ति नेटवर्क के माध्यम से रक्त संग्रह, परीक्षण, प्रसंस्करण, भंडारण और वितरण से संबंधित सभी गतिविधियों को राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित किया जाना चाहिए। 

रक्त की स्क्रीनिंग अनेक कारणों पर निर्भर करती है। इसे प्रत्येक देश और क्षेत्र की स्थितियों के अनुसार करने की आवश्यकता होती है। जैसे- भौगोलिक कारण, किसी क्षेत्र में खास रोग का प्रसार एवं अगर कोई व्यक्ति पहली बार रक्त दान कर रहा है, तब भी डोनेट किए गए रक्त की जांच जरुरी होती है। 

सबकी जरूरतें अलग-अलग

कई लोगों को अपातकालीन स्थिति में रक्त की आवश्यकता होती है, तो कुछ लोगों को नियमित अंतराल पर रक्त की आवश्यकता होती है। जैसे- 2021 Thalassaemia International Federation Guidelines for the Management of Transfusion-dependent Thalassemia शोध के अनुसार थैलेसीमिया रोगियों को हर 2-4 हफ्तों में ब्लड ट्रांसफ्युजन की आवश्यकता होती है, मतलब हर 2-4 हफ्तों में इन्हें रक्त चढ़ाना पड़ता है, जिसमें अत्याधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है कि जो रक्त चढ़ाया जा रहा है, वह बिल्कुल शुद्ध हो यानी कि उसमें किसी तरह का संक्रमण ना हो, जो वर्तमान या भविष्य में थैलेसीमिया रोगियों के लिए खतरा बन जाए लेकिन कई बार असावधानियां हो जाती हैं, जिसका खामियाजा रोगी को भुगतना पड़ता है। 

महाराष्ट्र में थैलेसीमिया से ग्रसित चार बच्चों का इलाज किया जा रहा था, जिसके लिए NAT परीक्षण के बाद रक्त चढ़ाया जाना था लेकिन सुविधा के अभाव में रक्त दूषित हो गया। साथ ही उन चारों बच्चों को दूषित एवं संक्रमित रक्त चढ़ाने के कारण वे एचआईवी एड्स से भी ग्रसित हो गए। उनमें से एक बच्चे की मृत्यु भी हो गई। 

NAT बन सकता है प्रभावी जांच 

NAT (Nucleic Acid Testing) एक महत्वपूर्ण जांच है, जिसके जरिए उन बीमारियों की जांच भी की जा सकती है, जो शुरूआती स्तर पर हैं मतलब वैसी बीमारियां जिसके लक्षण वर्तमान समय में नहीं दिखाए दे रहे लेकिन भविष्य में दिखाई दे सकते हैं। 

Heamatologist

पटना के वरिष्ठ हेम्टोलॉजिस्ट डॉ. अविनाश कुमार सिंह बताते हैं, “वर्तमान समय में ELISA- Enzyme Linked Immunosorbent Assay और Chemiluminescence Enzyme Immunoassay (CLEIA) द्वारा डोनेट किए रक्त की जांच होती है, जिससे एचआईवी एड्स, हेपेटाइटिस, आदि संक्रामक बीमारियों का पता लगाया जा सकता है लेकिन हर बार ये परीक्षण सटीक परिणाम नहीं देते हैं, मतलब ये उन बीमारियों की जानकारी नहीं देते जो शरीर में सुप्त अवस्था में है। ऐसे में जरूरतमंदों को  ELISA और CLEIA जांच के बाद रक्त चढ़ा दिया जाता है, जिसके बाद उन मरीजों में एचआईवी एड्स आदि बीमारियों के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, जिन्हें संक्रामक रक्त चढ़ाया गया था मगर पारंपरिक जांच में बीमारियों का पता नहीं चल पाया था। 

इस तरह की खामियों को देखते हुए ही NAT परीक्षण की सलाह दी जाती है। NAT के जरिए उन संक्रमणों की जांच की जाती है, जो सुप्त अवस्था में है और उनके लक्षण सामने नहीं आ रहे। इस अवधि को विंडो पीरियड कहा जाता है, मतलब संक्रमण होने और संक्रमण के लक्षणों के सामने आने की अवधि के बीच की अवस्था, जिसे NAT के जरिए पता लगाया जा सकता है और इस विंडो पीरियड को कम किया जा सकता है। साथ ही NAT परीक्षण के परिणाम केवल 24 घंटों में ही सामने आ जाते हैं। NAT के जरिए 10-33 दिन पहले हुए एचआईवी के संक्रमण की जांच भी की जा सकती है।

हालांकि NAT परीक्षण की कीमत बहुत ज्यादा है, जिस कारण कई केंद्रों में इसे नहीं अपनाया जा रहा मगर NAT रक्त दाता एवं प्राप्तकर्ता दोनों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। एक ओर जहां रक्त दान करने वाले व्यक्ति को किसी भी तरह के संक्रमण की जानकारी मिल जाएगी तो वहीं दूसरी ओर प्राप्तकर्ता भी संक्रमण की चपेट में आने से बच जाएंगे।”

एक क्रांतिकारी जांच है NAT

Roche diagnostics

डॉ. संदीप सेवलिकर, Roche Diagnostics India में चिकित्सा और वैज्ञानिक मामलों के प्रमुख बताते हैं, “NAT परीक्षण रक्त सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक परिवर्तनकारी दृष्टिकोण के रूप में सामने आ सकता है। साथ ही NAT अन्य स्क्रीनिंग प्रक्रियाओं से भी भिन्न है।  NAT के जरिए विंडो पीरियड को कम किया जा सकता है क्योंकि इसके जरिए वायरल आनुवंशिक के निम्न स्तर पर भी संक्रमण का पता लगाया जा सकता है।” 

NAT परीक्षण भारत में कुछ केंद्रों में शुरू किया गया है लेकिन यह ड्रग एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 और उसके नियमों के अनुसार TTIs के लिए अनिवार्य स्क्रीनिंग टेस्ट नहीं है। भारत में नियमित NAT परीक्षण को लागू करने में प्रमुख बाधाएं इसकी उच्च लागत और अधिकांश रक्त केंद्रों में तकनीकी विशेषज्ञता की कमी है। NAT परीक्षण लागू करने के साथ-साथ रक्तदान शिविर एवं रक्तदान के क्षेत्र में कार्य कर रहे, विशेषज्ञों एवं सहकर्मियों को तकनीकी परीक्षण देना भी एक चुनौती है। इसके साथ ही रक्त की कीमतों का सटीक निर्धारण करना भी महत्वपूर्ण है ताकि बिचौलिये रक्तदान को व्यापार ना बना दें एवं जरूरतमंद लोगों तक शुद्ध एवं सुरक्षित रक्त पहुंच सकें, इसके लिए दाता एवं प्राप्तकर्ता को भी जागरूक करने की आवश्यकता है।  

Blood man

ब्लडमैन नाम से मशहूर मुकेश हिसारिया बताते हैं, “NAT वाकई एक क्रांतिकारी परीक्षण है लेकिन लोगों को NAT की जानकारी नहीं है। साथ ही NAT काफी महंगा भी है, जिस कारण कई केंद्रों में इसकी सुविधा को शुरू नहीं किया गया है क्योंकि NAT परीक्षण की सफल जांच के बाद रक्त की कीमत बढ़ जाएगी, जिससे कई लोगों तक अपातकालीन स्थिति में रक्त पहुंचने में देरी हो सकती है लेकिन NAT परीक्षण रक्तदान की दिशा में एक सराहनीय दृष्टिकोण है।” 

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