जब लोगों को कहीं जाना होता है, तब वे अक्सर ऑटो-रिक्शा या कैब का प्रयोग करते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि इन्हें चलाने वाले ड्राइवर किन समस्याओं से गुजरते हैं?
भारत के शहरों में बढ़ता ट्रैफिक और पुराने वाहनों से निकलने वाला धुआं ड्राइवरों को हर रोज़ प्रदूषण के बहुत करीब रखता है। ऑटो और कैब ड्राइवर और वे लोग जो रोज़ घंटों बाइक या साइकिल चलाते हैं, लगातार जहरीली हवा में सांस लेते हैं। इससे उनके फेफड़ों और पूरे शरीर पर बुरा असर पड़ता है।यह लेख प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य, आंखों और जीवन की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभावों को समझाता है।
सूक्ष्म कणों से बढ़ता जानलेवा स्वास्थ्य संकट
ट्रैफिक-जनित हवा में छोटे कण (PM2.5, PM10), नाइट्रोजन-डाइऑक्साइड (NO2), ओज़ोन, और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) होते हैं। PM2.5 जैसी सूक्ष्म कणें फेफड़ों में गहरी तक जाकर रक्तप्रवाह में पहुंच सकती हैं और हृदय-वाहिका तथा फेफड़ों रोगों का कारण बनती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ग्लोबल एयर क्वालिटी गाइडलाइन और अन्य व्यापक समीक्षाओं से पता चलता है कि वायु प्रदूषण से हृदय रोग, स्ट्रोक, COPD (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज), अस्थमा और फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ता है। यह मौतों का कारण बनता है।
वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 99% से अधिक आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है, जहां हवा में प्रदूषण WHO की एयर क्वालिटी गाइडलाइंस से अधिक है और हर साल 42 लाख मौतें बाहरी हवा में प्रदूषण की वजह से होती है।
ड्राइवर अधिक क्यों प्रभावित हैं?
- व्यावसायिक-कारण: वे रोज़ाना कई घंटे ट्रैफ़िक-धाराओं में रहते हैं। घर में रहने वाले या ऑफिस में काम करने वाले लोगों की तुलना में उनकी सांस के ज़रिए लिया गया प्रदूषक बोझ अधिक होता है।
- इन-व्हीकल (vehicle-cab) कंसन्ट्रेशन: कई अध्ययनों से पता चलता है कि वाहन के अंदर प्रदूषकों की सांद्रता बाहर के आसपास के स्तर से अलग और कभी-कभी ज़्यादा हो सकती है, विशेषकर बंद खिड़कियों, रुक-रुक कर चलने और दिन-भर ब्रेक ना लेने की स्थिति में।
- वाहन के बिल्कुल पास स्रोत: ड्राइवर सीधे वाहनों के एग्जॉस्ट पाइप, डीज़ल धुएँ और ब्रेक-टायर से निकलने वाले कणों के पास होते हैं।
- कई अध्ययनों से पता चलता है कि ऑटो-रिक्शा और कैब के अंदर PM का स्तर बाहर के बराबर या कभी-कभी अधिक होता है।
- खराब वेंटिलेशन, पुराने वाहन और फिल्टर: इनके कारण ड्राइवर लगातार प्रदूषित हवा सांस में लेते रहते हैं।
ड्राइवरों की समस्या उनकी जुबानी

मुजफ्फरपुर में अनेक चौराहे और ऑटो स्टैंड हैं, जैसे- मिठनपुरा, अघोरिया बाज़ार, भगवानपुर, रामदयालु इत्यादि जहां ऑटो-रिक्शा वाले रहते हैं। घंटों सवारी के इंतज़ार में खड़े रहना और आते-जाते वाहनों से निकलने वाली प्रदूषित हवा में लगातार सांस लेना उनकी दिनचर्या में शामिल होता है।
मिठनपुरा स्थित एक ऑटो-रिक्शा ड्राइवर राजू बताते हैं, “हमलोग करीब 6 बजे ऑटो लेकर निकलते हैं। अभी सर्दियां है, तो 7 बजे तक निकल जाते हैं। इसके बाद लगातार सड़क पर गाड़ियों की संख्या बढ़ती जाती है। हालांकि, ई-रिक्शा और CNG वाली गाड़ियों के आने के बाद से पेट्रोल गाड़ियों की संख्या कम हुई है लेकिन फिर भी दिनभर प्रदूषित हवा में रहने के कारण लगातार खांसी होने लगती है। जब कफ के कारण समस्या होती है या सर्दी-जुकाम होता है, तब ठीक होने में समय लगता है।”
मुजफ्फरपुर रेलवे स्टेशन स्थित ऑटो-रिक्शा ड्राइवर्स बताते हैं कि ऑनलाइन गाड़ी बुकिंग एप्स के आ जाने से बुकिंग बढ़ी है और अधिक वाहन अब सड़कों पर निकलने लगे हैं। मुजफ्फरपुर की हवा भी अब काफी जहरीली हो रही है। वहीं, दूसरी ओर गाड़ी समेत लोगों की जनसंख्या बढ़ने के कारण ट्रैफिक की समस्या बढ़ गई है इसलिए कई बार रुकना पड़ता है और ट्रैफिक सिग्नल पर भी रुकना होता है। इस दौरान अधिकांश ड्राइवर्स गाड़ी का इंजन बंद नहीं करते हैं और लगातार धुआं निकलते रहता है। कई बार अधिकांश लोग गंदे तेल का प्रयोग करते हैं, जो सस्ता मिल जाता है, जिससे प्रदूषण और बढ़ जाता है। मास्क भी कितनी देर तक लगाया जाए, जब हवा ही जहरीली होते जा रही है।
ड्राइवर पर वायु प्रदूषण का प्रभाव
वाहनों से निकलने वाला धुआं शहरी माहौल में वायु प्रदूषण का एक मुख्य कारण है और यह यात्रियों के साथ-साथ ड्राइवरों के स्वास्थ्य पर भी असर डालता है। वाहन के अंदर प्रदूषकों का कंसंट्रेशन आस-पास के माहौल की तुलना में अधिक होता है और यह ट्रांसपोर्ट के तरीके के साथ बदलता रहता है।

डॉ. ऋचा सरीन, Pulmonology कंसल्टेंट, र्फोटिस हॉस्पिटल बताती हैं, “हवाओं में प्रदूषण का ऑटो-रिक्शा चलाने वाले या वैसे लोगों के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है, जो अधिकांश समय घर से बाहर रहते हैं और प्रदूषित हवा के संपर्क में रहते हैं क्योंकि वे इसके दुष्प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। PM 2.5 और PM 5 कण और अन्य जहरीली गैसें सूजन का कारण बनते हैं। इनसे प्रभावित होने पर गले में खराश, नाक बहना, आंखों में खुजली और लालिमा, खांसी और सांस लेने में समस्या होती है। लंबे समय तक संपर्क में रहने से सांसों में संक्रमण और अस्थमा की समस्या होने का खतरा बढ़ जाता है।”

डॉ. साकेत शर्मा, MD, DM, सीनियर कंसलटेंट पलमोनरी मेडिसिन, जयप्रभा मेदांता हॉस्पिटल, पटना बताते हैं, “आसपास की हवा प्रदूषित होने से विभिन्न प्रकार की समस्याओं के होने का खतरा रहता है। गाड़ियों से निकलते धुएं में विभिन्न प्रकार के केमिकल्स होते हैं। कार्बन डाइओक्साड, कार्बन मोनोओक्साइड आदि के कण सांसों की नली में पहुंचकर कई तरह की बीमारियों का कारण बन सकते हैं। उदाहरण के लिएष सिलेकोसिस, इम्फाइसिमा (Emphysema)।”
इस रिसर्च के अनुसार लगातार धुल-धुएं के संपर्क में रहने के कारण pneumoconiosis की समस्या का खतरा बढ़ जाता है, जिसे आम भाषा में “dusty lung” भी कहा जाता है। वहीं ऐसा आवश्यक नहीं है कि सांस द्वारा भीतर लिए जाने वाला हर कण नुकसानदायक हो क्योंकि इनमें से अनेक macrophages (एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका जो सुक्ष्म जीवों, मृत कोशिकाओं को नष्ट करने का काम करती है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को सक्रिय करती है) द्वारा समाप्त कर दिए जाते हैं। वहीं, कुछ कण लाल रक्त कोशिकाओं में मिल जाते हैं और पूरे शरीर में फैल जाते हैं, जिससे किडनी, मस्तिष्क या अन्य अंगों के क्षतिग्रस्त होने का जोखिम रहता है।
ऑटो-ड्राइवरों को प्रदूषण से कैसे बचाया जा सकता है?
इसके लिए निम्नलिखित तत्वों पर ध्यान दिया जा सकता है-
- ड्राइवरों को N95/KN95 जैसे प्रमाणित मास्क उपलब्ध कराए जाएं।
- आंखों की जलन से बचाव के लिए सुरक्षात्मक चश्मे (protective eyewear) को बढ़ावा दिया जाए।
- मास्क के सही प्रयोग और फिटिंग पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
- लंबे समय तक लगातार ड्राइविंग से बचाने के लिए शिफ्ट सिस्टम लागू किया जाए।
- ड्राइवरों को स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ा जाए।
- प्रदूषण-जनित बीमारियों को व्यावसायिक बीमारी (occupational disease) के रूप में मान्यता दी जाए।
- बीमार होने पर काम छोड़ने की मजबूरी को कम करने के लिए आय-सहायता तंत्र विकसित किया जाए।
- ऑटो और कैब ड्राइवरों के लिए नियमित फेफड़ों की जांच (स्पायरोमेट्री), आंखों की जांच और BP मधुमेह आदि के टेस्ट अनिवार्य किए जाएं।
निष्कर्ष
ऑटो-ड्राइवर शहरों की आवाजाही का अहम हिस्सा हैं, लेकिन वे सबसे ज़्यादा वायु प्रदूषण झेलते हैं। यह प्रदूषण उनके लिए सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि रोज़ी-रोटी और स्वास्थ्य का खतरा है। लंबे समय तक ट्रैफिक के धुएं में रहने से आंखों, फेफड़ों और ह्रदय पर बुरा असर पड़ता है।
इस समस्या का समाधान केवल मास्क पहनना नहीं है। बेहतर नीतियां, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां, नियमित स्वास्थ्य जांच और स्वच्छ परिवहन आवश्यक हैं।
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