दुनिया भर में दर्द कम करने के लिए प्रयोग होने वाली ओपिओइड एक गंभीर समस्या बन रही हैं। हालांकि, पहले इन्हें चिकित्सा में लाभदायक माना जाता था, लेकिन अब ये लत, बीमारी और मौत का कारण बन रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार ओपिओइड पर बढ़ती निर्भरता एक गंभीर संकट बन चुकी है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आकंड़े
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2023 में दुनिया भर में लगभग 31.6 करोड़ लोगों ने नशीले पदार्थों का प्रयोग किया। इनमें से करीब 6.1 करोड़ लोगों ने ओपिओइड का गैर-चिकित्सीय प्रयोग किया।नशीले पदार्थों से होने वाली 6 लाख मौतों में से लगभग 4.5 लाख मौतें सिर्फ इनकी वजह से होती हैं। इससे पता चलता है कि ये एक गंभीर वैश्विक संकट हैं।
मॉर्फीन, कोडीन और फेंटानिल जैसी ओपिओइड दवाएं दर्द के इलाज में दी जाती हैं, लेकिन ये मस्तिष्क पर असर डालकर लत पैदा कर सकती हैं। धीरे-धीरे यह लत निर्भरता बन जाती है, जो जानलेवा हो सकती है।
भारत में स्थिति
भारत में भी यह एक गंभीर समस्या है। कुछ क्षेत्रों में इनका प्रयोग सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से स्वीकार किया जाता है, और चिकित्सा में भी ओपिओइड दवाएं दर्द कम करने के लिए दी जाती हैं।हालांकि, भारत में अभी बड़े स्तर पर ओपिओइड महामारी नहीं फैली है, लेकिन स्थिति फिर भी चिंताजनक है।
केन्द्र सरकार की ओर से 2019 में किए गए एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत में लाखों लोग ओपिओइड के आदी हैं। करीब 5.7 करोड़ लोग गांजा और ओपिओइड का सेवन करते थे, जिनमें से लगभग 72 लाख लोगों को इलाज की आवश्यकता थी।
ओवरडोज के मामले भी होते हैं, लेकिन कम रिपोर्ट किए जाते हैं। इसकी वजह सामाजिक झिझक, जागरूकता की कमी और सीमित स्वास्थ्य सुविधाएं हैं।
देश में एक तरफ ओपिओइड का दुरुपयोग हो रहा है, तो दूसरी तरफ गंभीर बीमारियों के मरीजों को आवश्यक दवाएं नहीं मिल पाती हैं। अर्थात् कहीं अत्यधिक प्रयोग है, तो कहीं कमी। इसी कारण विश्व स्वास्थ्य संगठन की नई सिफारिशें महत्वपूर्ण हैं। इनमें इसकी लत के उपचार को स्वास्थ्य प्रणाली का हिस्सा बनाने, ओवरडोज से बचाव और इन दवाओं के सही प्रयोग पर जोर दिया गया है।
ओपिओइड की निर्भरता को कम करने के तरीके
भारत में इन सिफारिशों को लागू करने के लिए कई कदम आवश्यक हैं। सबसे पहले, ओपिओइड की लत को अपराध नहीं बल्कि स्वास्थ्य समस्या माना जाना चाहिए, ताकि लोग बिना डर के इलाज करा सकें।
नशा मुक्ति केंद्रों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ानी होगी, विशेषकर ग्रामीण और छोटे शहरों में। ओवरडोज से बचाव के लिए जीवन रक्षक दवाएं भी अधिक उपलब्ध करानी होंगी।
साथ ही डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को इनके सुरक्षित प्रयोग का बेहतर प्रशिक्षण देना आवश्यक है, ताकि अनजाने में लत की समस्या न बढ़े।
अन्य तरीके
इस समस्या से निपटने के लिए समाज में जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है। जब तक लोग इसकी गंभीरता नहीं समझेंगे, तब तक समाधान मुश्किल रहेगा। स्कूलों, कॉलेजों और मीडिया में इस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए।
इसको लेकर कई गलत धारणाएं भी हैं, जैसे इसे कुछ बीमारियों का इलाज या लंबे समय तक स्वस्थ रहने का साधन मानना।
यह समस्या सिर्फ दवाओं की नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित जटिल मुद्दा है। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो यह “दर्द की दवा” आगे चलकर “दर्द का कारण” बनती जाएगी।
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