सुबह 8 बजे तक, जब अधिकांश लोग सुबह का नाश्ता भी नहीं कर पाते है, तब सुनीता देवी नाम की आशा कार्यकर्ता अपने गाँव के पांच घरों में जा चुकी होती है। आज वह महिलाओं को टीकाकरण या गर्भावस्था की देखभाल के लिए नहीं, बल्कि कैंसर के बारे में जागरूक करने के लिए घर-घर जा रही हैं। उनका मुख्य उद्देश्य महिलाओं को कैंसर के शुरुआती लक्षण और समय पर इलाज के बारे में जानकारी देना है।
आशा कार्यकर्ता अक्सर गाँव की महिलाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच पहला या कभी-कभी एकमात्र संपर्क होती हैं। अब उनका काम सर्वाइकल कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाना भी है। यह कैंसर भारतीय महिलाओं में सबसे ज्यादा रोकथाम योग्य है, लेकिन यदि समय पर ध्यान न दिया जाए तो यह नुकसानदायक भी हो सकता है।
सर्वाइकल कैंसर को लेकर जागरूकता
सर्वाइकल कैंसर मुख्य रूप से ह्यूमन पेपिलोमावायरस (HPV) के लगातार संक्रमण के कारण होता है और इसकी स्क्रीनिंग से जल्दी पता लगाया जा सकता है। लेकिन ग्रामीण और कमजोर समुदायों में इसके बारे में बहुत कम जानकारी है। इसके लक्षणों को अक्सर आम महिला रोग समझ लिया जाता है। महिलाएं तब ही डॉक्टर के पास जाती हैं, जब बीमारी बहुत बढ़ जाती है। यहीं पर आशा कार्यकर्ताओं का काम शुरू होता है। वे महिलाओं को समय रहते जानकारी और मदद देती हैं, ताकि बीमारी जल्दी पकड़ी और ठीक की जा सके।

रिता देवी, आशा कार्यकर्ता बताती हैं, “हम महिलाओं को बताते हैं कि यौन संबंध के बाद खून आना, रजोनिवृत्ति के बाद खून आना या लगातार स्त्राव होना सामान्य नहीं है। अकसर महिलाएं सोचती हैं कि ये चीज़ें उम्र बढ़ने या बच्चे के जन्म का हिस्सा हैं।”
आशा कार्यकर्ता साधारण और रोज़मर्रा की भाषा में इन चीज़ों को समझाती हैं क्योंकि पोस्टर और पैम्फलेट से हर बात समझ नहीं आ सकती है। वे घर-घर जाकर, स्वयं सहायता समूह की बैठकों में और ग्राम स्वास्थ्य और पोषण दिवस पर महिलाओं से बात करती हैं, ताकि कोई भी असहज या हिचक महसूस न करे।
महिलाओं को कैंसर स्क्रीनिंग के लिए प्रेरित करना
जागरूकता केवल पहला कदम है। महिलाओं को वास्तव में कैंसर स्क्रीनिंग के लिए प्रेरित करना अधिक चुनौतीपूर्ण है।
कई महिलाएं घर के काम, बच्चों की देखभाल या आवाजाही पर लगी पाबंदियों की वजह से आसानी से घर से बाहर नहीं निकल पाती हैं। कुछ महिलाएं दर्द, निदान या वर्जनाओं के डर से स्क्रीनिंग करवाने से कतराती हैं। आशा कार्यकर्ता अक्सर महिलाओं के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) तक लेकर जाते हैं। आशा कार्यकर्ताओं को इस तरह की मदद के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता या बहुत कम भुगतान किया जाता है।
काम का बोझ
सर्वाइकल कैंसर को लेकर जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी अब आशा कार्यकर्ताओं के पहले से ही भारी कार्यभार में जोड़ दी गई है। कैंसर, मधुमेह, हृदय-रक्तवाहिनी रोगों और स्ट्रोक की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPCDCS) के तहत भी आशा कार्यकर्ताओं को जोड़ने की योजना है, जिसके अंतर्गत 30 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की सूची तैयार करने और उन्हें गैर-संचारी रोगों (NCDs) समेत कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए प्रेरित और सहयोग करने की ज़िम्मेदारी दी गई है।
अन्य आशा कार्यकर्ता बताती हैं, “हमें बताया जाता है कि हमारा काम महत्वपूर्ण है। हालांकि, हमारा काम लगातार बढ़ रहा है, लेकिन हमें उसके अनुसार पैसा नहीं मिलता है। अभी चार महीने से हमें मानदेय (Honorarium) नहीं मिला है।”
अधिकांश आशा कार्यकर्ताओं को सर्वाइकल कैंसर के बारे में बहुत कम ट्रेनिंग मिलती है। अक्सर सिर्फ एक बार लक्षणों जैसी जानकारी दी जाती है। जब महिलाएं स्क्रीनिंग या HPV के बारे में विस्तार से सवाल पूछती हैं, तब आशा कार्यकर्ताओं को अधूरी जानकारी के साथ जवाब देना पड़ता है या उन्हें डॉक्टर के पास भेजना पड़ता है। लेकिन डॉक्टर हर समय उपलब्ध नहीं रहते हैं।
आशा कार्यकर्ताओं का महत्व
भारत में सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम की कोशिश सिर्फ अस्पताल और डॉक्टरों पर नहीं, बल्कि भरोसे पर भी निर्भर है। आशा कार्यकर्ता, जो उसी गाँव या समुदाय की होती हैं, भरोसे की मजबूत कड़ी हैं। महिलाएं उनकी बात इसलिए ज़्यादा सुनती हैं, क्योंकि वे उनकी भाषा, परंपराओं और मुश्किलों को समझती हैं।
पब्लिक हेल्थ के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आशा कार्यकर्ताओं के बिना ग्रामीण इलाकों में बड़े स्तर पर स्क्रीनिंग करना मुश्किल है। शुरुआती पहचान में उनका काम कभी-कभी इलाज योग्य बीमारी और जानलेवा स्थिति के बीच का फर्क तय कर देता है।
फिर भी, उनका योगदान अक्सर दिखाई नहीं देता—पैसा कम मिलता है, पहचान कम होती है, और काम लगातार बढ़ता रहता है।
फ्रंटलाइन की आवाज़ सुनना
कुछ सकारात्मक उदाहरण भी हैं। जैसे, आशा कार्यकर्ता पिंकी अपने गाँव में भरोसे का प्रयोग करके महिलाओं को CAPED के स्क्रीनिंग कैंपों से जोड़ती हैं। एक युवा मां होने के नाते, उनकी अपनी कहानी उन महिलाओं से जुड़ जाती है जिनसे वे मिलती हैं। इससे वह महिलाओं के लिए भरोसेमंद और प्रभावी साथी बन जाती हैं। पिंकी अपनी रोज़मर्रा की यात्राओं में कैंसर से संबंधित मिथक दूर करती हैं, स्क्रीनिंग के डर पर बात करती हैं और महिलाओं को अपने स्वास्थ्य को महत्व देने के लिए प्रेरित करती हैं।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 2005 में आशा कार्यकर्ताओं को इसलिए शामिल किया था ताकि स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से उपलब्ध और स्वीकार्य बन सकें, विशेषकर ग्रामीण इलाकों में।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) के बाद, उनके लगातार प्रयासों से माँ और बच्चे की सेहत में सुधार हुआ। आज भी, आशा कार्यकर्ता उन समुदायों तक पहुँचने का एक मजबूत तरीका हैं, जिन्हें अब तक स्वास्थ्य सेवाएँ नहीं मिल पाती थीं।
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