“मां, जल्दी करो बस निकल जाएगी; उफ्फ आज स्कूल जाने का मन नहीं है;” बच्चों का सुबह उठकर नखरे करना, माता-पिता का बच्चों को बहला-फुसलाकर स्कूल ले जाना, ये सारी चीजें कोरोना के समय कहीं गुम-सी हो गई थी। अब एक बार फिर ये सारी चीजें शुरु हो गई हैं। अब कहीं उत्साह है, तो कहीं निराशा क्योंकि बीते दो सालों में बहुत कुछ बदल भी तो गया है। आइये जानते हैं कैसे कोरोना काल ने बच्चों/छात्रों के वयक्तित्व को प्रभावित किया है ।
बच्चों में लिखने की आदत हुई कम

मुजफ्फरपुर स्थित एक प्राइवेट स्कूल में 8वीं क्लास की विद्यार्थी नव्या की मां इप्शा पाठक ने बताया कि, “बच्चों को वैक्सीन लगने के बाद डर थोड़ा कम हुआ है लेकिन लोगों की लापरवाही के कारण अब भी डर बरकरार है। बच्चों का स्कूल जाना बहुत जरुरी भी हो गया था क्योंकि घर में रहते-रहते बच्चों का सामाजिक व्यवहार काफी प्रभावित हुआ है, जिस कारण बच्चे अपनी भावनाएं सही तरह से व्यक्त नहीं कर पा रहे थे। दिनभर स्कूल की पढ़ाई फोन से ही हो रही थी और इस वजह से बच्चों द्वारा मोबाइल का प्रयोग बढ़ गया था।” उन्होंने आगे बताया कि ऑनलाइन पढाई कि वजह से बच्चों की लिखने की आदत कम हो गई है। इप्शा ने कहा, “इसके लिए किसी एक को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं है क्योंकि अभिभावकों ने भी कहीं ना कहीं बच्चों को ढील दी और स्कूल वालों ने गृहकार्य पर ठीक से ध्यान नहीं दिया। बच्चों के अंदर लिखने की आदत फिर से शुरू करने के लिए उन्हें रोज एक पन्ना लिखने के लिए देना चाहिए।”
स्कूल खुलने की बात पर नव्या ने कहा कि उसे ऑफलाइन कक्षाएं ही पसंद है क्योंकि इससे अपने दोस्तों के साथ लंच करने, स्कूल की क्रियाकलापों में भाग लेने और दोस्तों के साथ घुमने का मौका मिलता है। उसने बताया, “हम पहले वीडियो कॉल पर ही बातें कर पा रहे थे लेकिन अब दोस्तों से मिलना मुमकिन हो पाया है”।
अजनबियों से लगता था डर

मुजफ्फरपुर बिहार की रहने वाली नेहा केशरी अपने बेटे अर्थव के बारे में बताती हैं कि कोरोना के बाद अचानक बच्चे को स्कूल भेजने में उन्हें बहुत डर लग रहा था। लेकिन स्कूल में इंतजाम सही थे इसलिए बच्चे को स्कूल भेजना शुरु कर दिया।
दिनभर घर में रहते-रहते अर्थव किसी भी अनजान व्यक्ति को देखकर डर जाता था क्योंकि उसे लोगों के साथ घुलने-मिलने की आदत नहीं थी। हालांकि अब स्कूल खुलने के बाद अर्थव के सामाजिक व्यवहार में बहुत परिवर्तन आया है। अब वह अनजान लोगों को देखकर डरता नहीं है और उनसे सही तरीके से मिलता है। उन्होंने आगे कहा कि एकल परिवार का प्रचलन बढ़ने की वजह से बच्चे के साथ घर में बातें करने के लिए कोई नहीं होता है, जिस कारण बच्चों को स्कूल भेजना जरुरी हो जाता है। अर्थव अभी नर्सरी क्लास में पढ़ रहा है और स्कूल में उसका काफी मन लगने लगा है, जिस कारण छुट्टी होने पर भी उसे स्कूल की याद सताने लग जाती है।
किताबों से ज़्यादा ज़रूरी हो गए हैं ऑनलाइन नोट्स
वहीं केंद्रीय विद्यालय गन्नीपुर के प्राचार्य संजीव सिन्हा कहते हैं बच्चे अब किताबों से ज्यादा ऑनलाइन सामाग्री पर ध्यान दे रहे हैं। अब बच्चे ऑनलाइन वीडियो लिंक, नोट्स ढूंढते हैं ताकि कम मेहनत पर ही उन्हें अपने विषय से संबंधित सारी जानकारी मिल जाए और वे उसे पढ़ करके पास हो जाएं। साथ ही बच्चों के अंदर लिखने की आदत ख़त्म हो गई है, जिस कारण बच्चे अपनी परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहे हैं। ऑनलाइन क्लास के कारण अब बच्चों को ऑबजेक्टिव प्रश्नों को हल करने की आदत लग गई है। यही कारण है कि कई बच्चों को ऑफलाइन पढाई रास नहीं आ रही है।
बच्चों का सम्पूर्ण विकास हुआ प्रभावित

मनोचिकित्सक डॉ. बिंदा सिंह कहती हैं कोरोना के कारण बच्चों के मानसिक विकास पर काफी प्रभाव पड़ा है। ऐसा नहीं है कि ऑनलाइन कक्षाएं चलने से केवल नुकसान ही हुआ हो बल्कि इसके कई फायदे भी हुए हैं। जहां एक ओर बच्चों ने तकनीकी ज्ञान को हासिल किया है। वहीं दूसरी ओर उनका मानसिक और सामाजिक विकास भी प्रभावित हुआ है। जैसे – जिन प्रश्नों के जवाब लिखने में बच्चों को मात्र आधे घंटे का समय लगता था, अब उन्हीं प्रश्नों को लिखने के लिए बच्चों को 50 मिनट का समय लग रहा है।
अब बच्चों की दिनचर्या बदल गई थी। वे अपने अनुसार उठते थे और क्लास कर लेते थे क्योंकि रिकोर्डिग की सुविधा थी लेकिन अब नियत समय पर उठ कर उन्हें स्कूल जाना पड़ा रहा है, जिस कारण बच्चों के अंदर चिड़चिड़ाहट, अनमनापन भी बढ़ रहा है। ये स्थिति केवल बच्चों की ही नहीं है बल्कि कई माता-पिता को भी दोबारा पहले जैसी दिनचर्या में ढलने में समय लग रहा है। वहीं बच्चों को घर पर रहने के दौरान वीडियो गेम खेलने की आदत लग गई थी, जो उन्हें अब नहीं मिल पा रहा है, इस कारण भी बच्चों के अंदर गुस्सा बढ़ रहा है।
अभिभावकों को भी है परेशानी
अपने पास आए एक केस का उदाहरण देते हुए डॉ. बिंदा बताती हैं कि, कई अभिभावकों को सुबह लंच बनाने, बच्चों को तैयार करने, बस स्टॉप तक छोड़ने में आलस का अनुभव हो रहा है। अब जब बच्चे स्कूल से वापस लौटे तब अभिभावक बच्चों से बातें करें क्योंकि स्कूल से आने के बाद बच्चों के पास कई बातें होती हैं, जिन्हें वे सुनाना चाहते हैं। साथ ही अब बच्चों की शारीरिक क्रियाकलापों में रूचि को बढ़ाएं, योगा या ध्यान लगाना सिखाएं, छोटे-छोटे समूहों में बच्चों को बांटकर उनसे कोई कार्य करने को कहें, जिसमें लिखित अभ्यास को भी शामिल करें ताकि बच्चों के अंदर लिखने की आदत विकसित हो सके।
जिस प्रकार एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। उसी प्रकार ऑनलाइन शिक्षा के दौरान कुछ अच्छे पहलू भी सामने आएं हैं। जैसे – घर पर रहने के दौरान माता-पिता और परिवार के साथ बच्चों के भावनात्मक संबंध विकसित हुए हैं जो एक महत्वपूर्ण भावनात्मक बदलाव है।
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