टीबी से लड़ने के लिए जरूरत है नये शोध और जांच प्रक्रियाओं की

साल 2025 तक टीबी को समाप्त करने का संकल्प तब ही हासिल हो सकेगा, जब जांच प्रक्रियाओं में नयापन आएगा और जांच में बढ़ोतरी होगी...

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Last Updated on सितम्बर 14, 2023 by Neelam Singh

मुजफ्फरपुर की रहने वाली प्रीती का टीबी का इलाज अभी चल रहा है। वह बताती हैं कि उन्हें जो दवाईयां सोमवार को खानी होती थी, वे दवाईयां उन्हें दो-तीन दिन के बाद मिलती थी। साथ ही साथ खाने में उन्हें दूध और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ लेने में परेशानी होती थी। घर में आय का निश्चित स्त्रोत नहीं होने के कारण उन्हें टीबी के दौरान काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उस वक्त उन्हें आस-पास के लोगों और घर के अन्य सदस्यों की मदद लेनी पड़ी। तब जाकर उन्हें कुछ सहायता मिली। प्रीती के अनुसार उन्हें टीबी के दौरान सही खान-पान नहीं मिलने के कारण कमज़ोरी महसूस होती थी। उनका एक छोटा बच्चा भी था, जिस कारण उन्हें और भी ज्यादा परेशानी हुई। साथ ही इलाज की प्रक्रिया में काफी देर होती थी और कफ की जांच के साथ साथ छाती का एक्स-रे भी कराना पड़ता था।

वहीं मुजफ्फरपुर के ही रहने वाले लल्लन झा बताते हैं, “टीबी के दौरान प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के ज़रिए टीबी वाले फूड पैकेट मिलते हैं, जिसमें दाल, सोयाबीन, गुड़ मिलता है। इससे काफी मदद तो हो जाती है पर इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए लोगों का जागरूक होना ज़रूरी है। उन्हें पता होना चाहिए कि इस प्रकार की कौन-कौन सी सहायता और कहां मिलती है। इससे टीबी के इलाज में मदद मिल जाती है, पोषण भी मिलता है और आर्थिक तौर पर भी सहुलियत होती है।”

TB food packet

टीबी संक्रमण के विभिन्न आयाम

टीबी के अनेक कारण हैं मगर कुपोषण, गरीबी, जागरुकता के अभाव के कारण टीबी के केसों का बढ़ना वर्तमान समय के लिए चिंता का विषय है। ऐसा इसलिए क्योंकि देश में यदि कुपोषण और गरीबी की वजह से लोग मरने लगें, तो उसके लिए ज़रूरी है कि उचित दिशा-निर्देश द्वारा लोगों के बीच जागरुकता के लिए कार्यक्रम बढ़ाये जाने चाहिए। जांच प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण और आम आदमी तक उनकी पहुँच टीबी की रोकथाम कि लिए आवश्यक है।

कई लोगों में टीबी को लेकर शुरू से ही भय की स्थिति रहती है, क्योंकि टीबी के इलाज समेत रोगी के खान-पान में होने वाले खर्च को लेकर लोगों को सही जानकारी नहीं होती। इस कारण से उन्हें टीबी की बीमारी से ज़्यादा उसमें होने वाले खर्च की चिंता सताती है। 

बलगम और X-ray के ज़रिए होती है जांच

Kajal Jha

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मुजफ्फरपुर, मुश्हरी ब्लॉक में साल 2019 में बतौर STS -Senior treatment supervisor काम करने वाली काजल झा बताती हैं, “मेरे यहां DOTS के लिए मरीज़ आते हैं और टेस्टिंग लैब में होती है। देखा जाए तो हर महीने करीब 25-30 लोगों को टीबी की दवाई दी जाती है। अगर किसी महीने में छुट्टी ज़्यादा हो या कोई हड़ताल हो जाए तो टीबी की जांच कम हो जाती है। ऐसे में केस कम आते हैं।” 

उन्होंने आगे बताया, “सारी चीजें टीबी की जांच पर निर्भर करती हैं। कोरोना के समय टीबी के केस घटे नहीं थे बल्कि टेस्टिंग कम हो रही थी। अस्पतालों में मौजूद लैब टेक्नीशियन पूरी तरह से कोरोना की जांच में लगे थे। इसलिए टीबी की जांच नहीं हो पा रही थी। हालांकि तब भी बेसलाइन टेस्टिंग का काम जारी था, जिसमें बलगम की जांच और एक छाती का एक्स-रे होता है। उस वक्त जो लोग X-ray के लिए आ रहे थे, उनका X-ray किया जा रहा था लेकिन लैब बंद था। इसलिए बलगम की जांच प्रभावित हुई थी। इन सब के बीच हमने घर-घर जाकर मरीज़ों को दवाईयां दी। लॉकडाउन के बाद केस आने बढ़ गए और जांच की प्रक्रिया भी तेज की गई। इसके बावजूद अभी भी टीबी को लेकर लोगों में जागरूकता की कमी है क्योंकि लोगों को मालूम ही नहीं है कि टीबी से मौत भी हो सकती है। अधिकांश लोगों को टीबी के बारे में कम ही मालूम होता है। जैसे कि टीबी कैसे फैलता है, क्यों होता है, कैसे ठीक होता है, इत्यादि।”

उन्होंने आगे बताया, “अधिकांश टीबी के मरीज ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं, जैसे- मजदूर, बीपीएल श्रेणी के लोग जो कुपोषण से ग्रसित हैं, उनमे टीबी की संभावना भी ज़्यादा होती है।” DOTS का मतलब Directly Observed Therapy Short course है। WHO के अनुसार, “जिन समुदायों में टीबी के केस अधिक हैं, उनमे टीबी के प्रसार को रोकने का सबसे किफायती तरीका इसका इलाज करना है।”

TB food distribution

नैदानिक परीक्षण के रूप में शामिल

जिला यक्ष्मा केंद्र में कार्यरत एक स्टॉफ ने बताया कि रोज़ाना औसतन 30-40 मरीज़ टीबी जांच के लिए आते हैं, जिसमें से 4-5 मरीजों में ही टीबी का बैक्टीरिया मिलता है। टीबी के लिए CB-NAAT जांच की जाती है, जिसकी रिपोर्ट आने में एक सप्ताह का समय लग जाता है। CB-NAAT जांच में दो घंटे के अंदर Mycobacterium Tuberculosis के साथ-साथ Rifampicin प्रतिरोध का भी पता लग जाता है। इस जांच को डब्ल्यूएचओ द्वारा प्रारंभिक नैदानिक परीक्षण के रूप में शामिल किया गया है।

साल 2022 में सार्वजनिक क्षेत्र में अधिसूचित टीबी रोगियों के बीच जीवाणुविज्ञानी (bacteriologically) रूप से केवल 59% (1.07 मिलियन) मामलों की पुष्टि की गई। इनमें से Rifampicin प्रतिरोध का परीक्षण केवल 77% (0.82 मिलियन) में ही किया गया था।

जांच में तेज़ी की आवश्यकता 

देखा जाए, तो टीबी की जांच प्रक्रिया काफी धीमी स्तर की है। इस वजह से समय पर संक्रमण का पता नहीं चल पाता है। ऐसे में टीबी को साल 2025 तक ख़त्म करने का संकल्प पूरा होता नहीं दिखाई दे रहा है। वैश्विक स्तर पर साल 2030 तक टीबी को खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है लेकिन भारत में कहीं ना कहीं जांच प्रक्रिया में देरी एवं जागरुकता में अभाव के साथ-साथ, कुपोषण और समाजिक कारणों के कारण भी इस लक्ष्य को प्राप्त करने में देरी हो सकती है। 

आवश्कता है नये शोध की 

Dr Saket Sharma

टीबी रोग विशेषज्ञ डॉ. साकेत शर्मा (एमडी, डीएम सीनियर कंसलटेंट पलमोनरी मेडिसिन, जयप्रभा मेदांता हॉस्पिटल, पटना) बताते हैं, “टीबी एक संक्रामक रोग है, जो Mycobacterium tuberculosis नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। टीबी का संक्रमण शरीर के अन्य अंगों में भी हो सकता है लेकिन ज्यादातर संक्रमण फेफड़ों में होता है। 97 प्रतिशत लोगों में Drug Sensitive टीबी के मामले पाए जाते हैं। इसे मेडिकल भाषा में 1st line ATT (Anti Tubercular treatment) कहा जाता है. इसमें चार तरह के ड्रग्स पाए जाते हैं – HRZE isoniazid, rifampicin, ethambutol, pyrazinamide.

भारत सरकार National Tuberculosis Elimination Programme के तहत लोगों को मुफ्त में टीबी का इलाज उपलब्ध कराती है। टीबी के मामलों में डॉक्टर के साथ-साथ मरीज़ों को भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि दवाओं का कोर्स सही तरीके से पूरा हो। अधिकांश लोग टीबी के इलाज को गंभीरता से नहीं लेते, और अपनी दवा का कोर्स पूरा नहीं करते जिस कारण MDR/XDR टीबी होने की संभावना बढ़ जाती है। इतने प्रचार-प्रसार और हर एक सेंटर पर DOTS-Directly Observed Treatment की व्यवस्था होने के बावजूद जागरूकता की कमी दिखाई देती है। लोग जागरूक हो सके, इसके लिए समय-समय पर मीडिया, अस्पतालों आदि द्वारा जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए। इसके अलावा जांच प्रक्रिया में आधुनिकीकरण को शामिल किया जाना चाहिए, जैसे कि नये शोध के ज़रिए नये तरीकों की खोज करना जो टीबी के जांच में और कारगर साबित हो सके।”

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Saumya Jyotsna
An award-winning journalist, Saumya brings out stories about grassroot level developments in the public health sector.
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