कहते हैं, जब एक बच्चे का जन्म होता है, तब उसके साथ एक मां भी जन्म लेती है और एक मां के साथ जन्म लेती है कई चुनौतियां क्योंकि एक नन्ही सी जान को दुनिया से रुबरु करवाना होता है। पिछले कुछ दिनों से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर प्रेगा किट का एक विज्ञापन सोशल मीडिया पर काफी ट्रेंड कर रहा है, जहां एक महिला बच्चे को अबो्र्ट कराने के लिए अस्पताल तो पहुंचती है लेकिन वहां कुछ ऐसा घटित होता है, जिसके बाद वो महिला अपना निर्णय बदल देती है। उस प्रचार के अंत में एक टैगलाइन आती है, जिसमें लिखा होता है “She can carry both”. मतलब एक महिला अपने बच्चे के साथ-साथ अपनी पहचान बनाने की उड़ान को भी जारी रख सकती है। हमारे आसपास भी ऐसी कई महिलाएं हैं, जो अपने बच्चों की जिम्मेदारियों के साथ-साथ अपनी पहचान भी बना रही हैं।
बच्ची के साथ जारी रही पढ़ाई

मुजफ्फरपुर बिहार स्थित खबरा की रहने वाली 25 वर्षीय संघमित्रा बताती हैं कि साल 2017 में ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद शादी हुई और करीब दो साल बाद साल 2019 में बच्ची हुई। वे बताती हैं कि डिलीवरी के समय काफी गंभीर स्थिति हो गई थी मगर बाद में सारी चीजें सामान्य हो गई लेकिन तकलीफ बढ़ गई। संघमित्रा बताती हैं कि बच्ची के होने से पहले वे बिहार शिक्षक भर्ती के लिए सी.टेट की तैयारी कर रही थीं, जिसे उन्होंने बच्ची ‘कौशोकी’ के होने के बाद भी जारी रखा। इसके साथ वे अपनी बीएड की पढ़ाई भी करती रहीं और “मम्मा-जुगनू स्टाइल” नाम से नवंबर 2020 में अपना एक यूट्यूब चैनल भी बनाया, जहां वे व्लॉग बनाकर डालती हैं, जिससे अब आमदनी भी हो रही है। साथ ही उन्होंने बताया कि अभी बिहार में चल रहे शिक्षक बहाली के 7वें चरण में उनकी नियुक्ति भी हो जाएगी और वे एक शिक्षिका बन जाएंगी।
मां के साथ हैं कंटेंट क्रिएटर

मुजफ्फरपुर बिहार स्थित छाता चौक की रहने वाली नेहा केशरी मानती हैं कि बच्चे के आने के बाद लाइफ पूरी बदल जाती है। भले सारी चीजें आसान नहीं होती लेकिन कुछ मुश्किल भी नहीं लगता है। साल 2016 की जनवरी में शादी के दो सालों के बाद साल 2018 की फरवरी में उन्हें मातृत्व का सुख मिला और ‘अर्थव’ उनकी जिंदगी में आया। वे आगे बताती हैं कि उनके पति को वीडियो बनाना और फोटोग्राफी करना काफी पसंद था, जिस कारण वे युट्युब पर अपने कुछ वीडियो बनाकर डाला करते थे। उन्हें देखकर नेहा ने भी साल 2020 में अपना एक यूट्यूब चैनल “यम्मी कैफे विथ नेहा” बनाया और फूड व्लॉगिंग करने लगी और अपने बनाए हुए खानों की रेसिपी को पोस्ट करना शुरू किया। वे बताती हैं कि बच्चे की देखभाल करते हुए सारे कामों को करना मुश्किल होता है इसलिए रात को उसके सोने के बाद ही वे वीडियो एडिटिंग किया करती हैं। आज नेहा की पहचान एक मां होने के साथ-साथ एक सफल युटयुबर और कंटेंट क्रिएटर की भी है।
प्रेगनेंसी में रखें अपना खास ख्याल

डाइटिशियन सुमिता कुमारी बताती हैं कि हर महिला को प्रेगनेंसी के दौरान परेशानियां हो ऐसा जरूरी नहीं है क्योंकि प्रेगनेंसी के दौरान आसपास का वातावरण बहुत ज्यादा प्रभावित करता है। इसके साथ महिलाएं अपने डाइट का भी पूरा ध्यान रखें। अपने खाने में पौष्टिक चीजों को शामिल करें। जैसे – सीजनल फल, सब्जियां, आयरन की मात्रा से भरपूर भोजन करें, दूध पीएं या दूध से बने उत्पादों का सेवन करें, दाल, चावल और घर का बना खाना खाने का ही प्रयास करें लेकिन अगर किसी खाद्य पदार्थ से एलर्जी है, तब किसी डाइटिशियन की सलाह पर ही अपना डाइट चार्ट बनवा कर प्रयोग करें। इस समय बेहतर यही होता है कि हर एक चीज नियमित मात्रा में और सही समय से खाई जाए क्योंकि जो भोजन मां खाती है, वही बच्चे के विकास में सहायक बनता है।
आमतौर पर प्रेगनेंसी के समय महिलाओं की भूख बढ़ जाती है, जो बिल्कुल सामान्य बात होती है। कई बार कुछ विशेष खाने की इच्छा (food craving) की समस्या को ज्यादा देखा जाता है, जहां महिलाएं पौष्टिक भोजन न खाकर स्वादिष्ट चीजों को खाने लगती हैं। हालांकि इसे सामान्य माना जाता है क्योंकि ये हार्मोनल बदलाव के संकेत माने जाते हैं। इस समय प्रोटीन और फाइबर ज्यादा मात्रा में लेना और समय-समय पर पानी पीना और भोजन को चबाकर खाने से यह समस्या कम हो जाती है।
आजीविका को लेकर बढ़ रहा जुनून

महिला रोग-विशेषज्ञ डॉक्टर कल्पना सिंह बताती हैं कि “आजकल लड़कियों में करियर को लेकर काफी गंभीरता देखी जा रही है, जिस कारण वे बच्चा लाने में देरी करती हैं, जिससे ज्यादा उम्र होने पर प्रेगनेंट होने, प्रेगनेंसी के दौरान या डिलीवरी के समय कॉम्प्लिकेशन बढ़ जाते हैं। अब नई तकनीक एग फ्रीजिंग (Egg Freezing) के आने के बाद लड़कियां अपने एग फ्रीज करवा देती हैं ताकि ज्यादा उम्र में मां बनने पर कोई समस्या ना हो। हालांकि अभी इसे लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं है।”
मां बनना और उसके साथ दोहरी जिम्मेदारी संभालना ये एक लड़की की इच्छा पर निर्भर करता है। सामाजिक नियमों या परिवार के दबाव में आकर दोहरी जिम्मेदारी उठा लेना सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि हर एक महिला की मानसिक और शारीरिक स्थिति समान नहीं होती है। साथ ही ऐसा भी हरगिज नहीं है कि जो महिलाएं अपने करियर पर ध्यान देना चाहती है, वे स्वार्थी होती हैं बल्कि ये उनकी अपनी पसंद होती है। हर एक महिला को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने का पूरा हक है। जब मां बनने की उम्र एक महिला स्वयं चुनती है, तब वो उस अहसास को पूरी तरह से जीती है क्योंकि मातृत्व एक लड़की के जीवन की बेहद सुंदर प्रक्रिया होती है।
आइये इस अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस पर नारी की वैचारिक, शारीरिक और मानसिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करते हैं और एक सुरक्षित व शिक्षित कल की कामना करते हैं ।
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