शांति देवी (बदला हुआ नाम) दिल्ली-एनसीआर की एक झुग्गी बस्ती में रहती थीं। उनकी तबीयत बहुत खराब थी, इसलिए वे बिस्तर से उठ नहीं पाती थीं। उन्हें पेशाब पर काबू नहीं था और उनके पास एडल्ट डायपर जैसी चीज़ें भी नहीं थीं। इस वजह से वे गंदगी और अस्वस्थ परिस्थितियों में रहती थीं। उनके परिवार या पास कोई मदद नहीं थी और उनके पास पैसे या साधन भी बहुत कम थे। इससे उनकी सेहत और आत्म-सम्मान दोनों पर असर पड़ा। यह स्थिति अधिकांश वरिष्ठ महिलाओं में देखने को मिलती है।

शिवपतिया देवी बिहार के छपरा ज़िले में रहती थीं। वह एक घर संभालने वाली महिला थीं और अपने पति और बेटे के साथ सादा और खुशहाल जीवन जी रही थीं। उनकी ज़िंदगी को पहला झटका तब लगा, जब एक एक्सीडेंट में उनके दाहिने पैर में गंभीर चोट लगी। हालांकि, लंबे इलाज के बाद वे फिर चलने लगीं, लेकिन पैर पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। उन्होंने धीरे-धीरे कम चल-फिरकर जीना सीख लिया।
अगला झटका उनके बेटे से आया। पांच साल पहले पिता की मौत के बाद उनके बेटे ने उनकी देखभाल करने से मना कर दिया। उसने बहाने बनाकर शिवपतिया देवी को घर से बाहर निकाल दिया और पटना रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया।
इन दोनों कहानियों से पता चलता है कि महिलाओं को अक्सर अकेलापन और तिरस्कार झेलना पड़ता है। एजवेल नामक गैर-लाभकारी संगठन के शोध से भी पता चलता है कि “सोलो एजिंग” अर्थात् बुढ़ापे में अकेले रह जाना अब एक समाजिक मुद्दा बन गया है।
भारत में अकेले रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों की संख्या बढ़ रही है। लगभग 10–12% वरिष्ठ नागरिक अकेले रहते हैं। यह समस्या विशेषकर गांवों में अधिक है क्योंकि परिवार के छोटे लोग बेहतर काम या पढ़ाई के लिए शहर या विदेश चले जाते हैं। वरिष्ठ महिलाओं के अकेले रहने की संभावना पुरुषों से अधिक होती है क्योंकि महिलाएं अक्सर अपने पतियों से लंबा जीवित रहती हैं। भारत में महिलाओं की औसत उम्र लगभग 73 साल है, जबकि पुरुषों की लगभग 70 साल। इसलिए कई वरिष्ठ महिलाएं अपने बुढ़ापे में अकेलापन महसूस करती हैं।
साल 2024 में भारत के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 480 वॉलंटियर्स ने 10,000 लोगों पर शोध किया। इसके अनुसार, अकेले रहने वाली वरिष्ठ महिलाओं में से 46.5% बताती हैं कि वे पांच साल से अधिक समय से अकेली हैं। पुरुषों में यह संख्या कम है, केवल 37.1% पुरुष पांच साल से अधिक समय से अकेले हैं।

हिमांशु रथ, संस्थापक, एजवेल फाउंडेशन बताते हैं, “Agewell Foundation विशेष तौर पर 60 साल से अधिक के वरिष्ठ नागरिकों की सहायता और सशक्तिकरण पर काम करता है। उनके सभी लाभार्थी वरिष्ठ नागरिक ही हैं। यह संगठन विशेषकर गरीब वरिष्ठ नागरिकों पर ध्यान देता है, जैसे झुग्गी-झोपड़ियों, गांवों और शहरी गरीब बस्तियों में रहने वाले लोग। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके पास परिवार का सहारा नहीं है, बिस्तर पर निर्भर हैं, या बहुत ज्यादा गरीब हैं।”
हिमांशु रथ आगे बताते हैं कि “महिलाओं की हिस्सेदारी इसमें खास तौर पर ज्यादा है। इसके विभिन्न कारण हैं, विधवापन, कम पढ़ाई-लिखाई, आर्थिक निर्भरता और बुढ़ापे में जेंडर भेदभाव। इसलिए महिलाएं ज्यादा असुरक्षित होती हैं। Agewell foundation की विभिन्न पहलों में महिलाओं की हिस्सेदारी 50–70% या उससे ज्यादा रहती है। इनमें शामिल हैं: हेल्थकेयर उपकरण वितरण, सर्दी राहत अभियान और डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम। यह राष्ट्रीय स्तर के रुझानों के अनुरूप है, जहाँ वरिष्ठ महिलाओं को विभिन्न प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।”
विधवा महिलाओं की संख्या
शोध से पता चलता है कि भारत में दुनिया की सबसे बड़ी विधवा आबादी रहती है। करीब 3.3 करोड़ महिलाएं, जो कुल महिला आबादी का लगभग 10% हैं। इसकी तुलना में पुरुषों में यह आंकड़ा सिर्फ 3% है। साथ ही एचआईवी/एड्स और विभिन्न सामाजिक संघर्षों के कारण यह संख्या बढ़ती जा रही है।
60 साल और उससे अधिक उम्र की महिलाओं में लगभग 54% महिलाएं विधवा हैं। वहीं 35–39 साल की उम्र में भी लगभग 12% महिलाएं विधवा हो चुकी हैं। केवल लगभग 10% विधवाएं ही फिर से शादी करती हैं।
भारत में अक्सर महिला की पहचान उसके पति से जोड़कर देखी जाती है। इसलिए जब पति नहीं होता है, तब कई बार महिला की सामाजिक स्थिति कमजोर हो जाती है और वह समाज में हाशिए पर चली जाती है। कुछ धार्मिक शहरों जैसे मथुरा, वाराणसी और तिरुपति में छोड़ी गई विधवाओं की स्थिति पर मीडिया रिपोर्टें भी सामने आती रही हैं। इनमें उनके आर्थिक और यौन शोषण जैसी घटनाओं की जानकारी दी गई है।
कम साक्षरता, सीमित पहुंच
पुरानी पीढ़ी की महिलाओं में पढ़ाई-लिखाई का स्तर बहुत कम होता है। गांवों में यह स्थिति और भी ज्यादा मुश्किल होती है। कम पढ़ाई-लिखाई सिर्फ पढ़ने-लिखने तक ही नहीं, बल्कि उनके जीवन के कई पहलुओं को प्रभावित करती है।
कई विधवाओं को जमीन या विरासत के झगड़ों की वजह से परिवार से अलग कर दिया जाता है या घर से निकाल दिया जाता है। पढ़ाई और कौशल की कमी के कारण उनके पास नौकरी के बहुत कम विकल्प होते हैं। कई महिलाओं को कम वेतन पर असंगठित क्षेत्र में काम करना पड़ता है। कुछ घरेलू कामगार के रूप में शोषण झेलती हैं। कभी-कभी उनकी स्थिति इतनी बदतर हो जाती है कि उन्हें भीख मांगनी पड़ती है या यौन शोषण का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, उन्हें बैंकिंग सेवाओं या सरकारी योजनाओं की जानकारी भी नहीं होती, जिससे उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।
स्वास्थ्य और गरिमा का प्रश्न
अकेली रहने वाली कई वरिष्ठ महिलाएं बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से भी वंचित रहती हैं। उन्हें पेशाब पर काबू न होने, गठिया, आँखों या कानों की समस्या जैसी समस्याएं होती हैं, लेकिन इन पर खुलकर बात नहीं होती है। पोषण की कमी, सुरक्षित घर का अभाव, डॉक्टर तक पहुंच न होना और हिंसा का खतरा उनके जीवन को और मुश्किल बना देता है। इससे वे शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ तनाव और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं से भी जूझती हैं।
ऐसे में कुछ संगठन मदद कर रहे हैं। उदाहरण के लिए Agewell Foundation गरीब वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य उपकरण, परामर्श और आपात सहायता देती है। कई परियोजनाओं में महिलाओं की संख्या 50–70% तक रहती है, जो दिखाता है कि महिलाएं ज्यादा असुरक्षित हैं। छोटे-छोटे सहयोग जैसे नियमित स्वास्थ्य जांच, वॉकर या व्हीलचेयर देना, या स्वच्छता की सामग्री देना, वरिष्ठ महिलाओं के जीवन में सम्मान और आराम ला सकता है।
बदलता पारिवारिक ढांचा
पहले भारत में वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल मुख्य रूप से संयुक्त परिवार में होती थी। लेकिन अब परिवार छोटे हो रहे हैं (न्यूक्लियर परिवार) और यह व्यवस्था कमजोर पड़ रही है। हिमांशु रथ बताते हैं कि “शहरीकरण, युवाओं का दूसरे शहरों में काम करने जाना, छोटे परिवारों का बढ़ना और महिलाओं की बढ़ती नौकरी, इन सभी कारणों से वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल करने वाले लोग कम हो गए हैं। पहले घर की बहुएं या बड़े बच्चे इनकी देखभाल करते थे, लेकिन अब यह कम हो गया है।”
हिमांशु आगे बताते हैं कि “हालांकि, अभी भी अधिकांश वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल परिवार ही करता है, लेकिन अब यह जिम्मेदारी कम लोगों पर आ गई है। इससे देखभाल करने वालों पर तनाव बढ़ता है और कभी-कभी बुज़ुर्गों की सही देखभाल नहीं हो पाती है। कई लोगों को बाहरी मदद पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए Agewell Foundation और जैसे अन्य कार्यक्रम सामुदायिक नेटवर्क बनाकर उन लोगों की सहायता करते हैं, जिन्हें परिवार से सहारा नहीं मिलता। वे सीधे सहायता, स्वास्थ्य सुविधा और देखभाल प्रदान करते हैं।”
निष्कर्ष
बुढ़ापा हर किसी के लिए एक चुनौती है। कोई कितना भी भागे, यह अवश्य आता है। लेकिन जब बुढ़ापा किसी महिला का होता है, तब इसमें और भी मुश्किलें जुड़ जाती हैं—जैसे आर्थिक निर्भरता, समाज में नजरअंदाज़ होना और लंबे समय तक अकेलापन।
प्रश्न यह नहीं है कि कितनी वरिष्ठ महिलाएं अकेली हैं या कितनी विधवा हैं, या उन्हें मदद मिल रही है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या लोग उनके अकेलेपन को सिर्फ उनकी निजी समस्या समझकर नजरअंदाज कर देंगे, या इसे समाज की जिम्मेदारी मानेंगे।
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