राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के संगरिया क्षेत्र के 65 वर्षीय व्यक्ति को एक साल पहले सिरदर्द की शिकायत हुई। परिजन उन्हें नीम-हकीमों के पास ले जाते रहे, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बाद में श्रीगंगानगर के जनसेवा हॉस्पिटल में जांच कराने पर पता चला कि उन्हें ब्रेन ट्यूमर है, जो काफी बढ़ चुका है।
डॉ. धीरज गोदारा ,वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, जनसेवा हॉस्पिटल, बताते हैं कि “अगर समय पर जांच और छोटा ऑपरेशन करवा लिया जाता, तो इलाज संभव था, लेकिन देर होने से अब ऑपरेशन संभव नहीं है।”
ऐसे मामले सिर्फ गांवों में नहीं, शहरों में भी आम हैं, जहां न्यूरोलॉजिस्ट और एमआरआई-सीटी स्कैन जैसी सुविधाओं की कमी है। इसलिए लोग अक्सर समय पर सही इलाज नहीं पा पाते।
न्यूरोलॉजिकल विकारों का प्रकोप
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की ताजा रिपोर्ट से पता चलता है कि हर साल दुनिया में 1.1 करोड़ लोगों की मौत न्यूरोलॉजिकल विकारों से हो रही है। भारत में माइग्रेन, स्ट्रोक, अल्जाइमर, पार्किंसन, मिर्गी और मेनिनजाइटिस जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। ये तंत्रिका तंत्र संबंधी बीमारियां अब गांवों तक फैल चुकी हैं।
राजस्थान के कई जिलों में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन इलाज की सुविधाएं सीमित हैं। जिला मुख्यालयों पर कुछ न्यूरोलॉजिस्ट उपलब्ध हैं, लेकिन दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में न तो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और न ही जांच की आधुनिक सुविधाएं।
लोगों में इन बीमारियों को लेकर जागरूकता की कमी और अंधविश्वास भी मुख्य समस्या है। इसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों लोग स्ट्रोक, माइग्रेन, अल्जाइमर और मिर्गी जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल दुनियाभर में करीब 1.1 करोड़ लोगों की मौत न्यूरोलॉजिकल बीमारियों से होती है, जिनमें स्ट्रोक, माइग्रेन, अल्जाइमर, डिमेंशिया और मेनिनजाइटिस शामिल हैं।
भारत की वर्तमान स्थिति
भारत में न्यूरोलॉजिकल विकारों की स्थिति चिंताजनक है। एक अनुमान है कि देश में करीब 3 करोड़ लोग इन विकारों से प्रभावित हैं। हर 1 लाख लोगों में 15 से 43 लोग पार्किंसन रोग से पीड़ित हैं, और अब यह बीमारी युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है।
साल 2019 में चेन्नई में हुए इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरोलॉजी के सम्मेलन में बताया गया कि भारत में न्यूरोलॉजिस्टों की भारी कमी है। पूरे देश में केवल 2500 न्यूरोलॉजिस्ट हैं, अर्थात् हर 5 लाख लोगों पर सिर्फ एक डॉक्टर। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर 1 लाख लोगों पर एक न्यूरोलॉजिस्ट होना चाहिए।
डॉक्टर की राय

डॉ. धीरज गोदारा (वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, जन सेवा हॉस्पीटल श्रीगंगानगर) बताते हैं कि “न्यूरोलॉजिकल बीमारियां बढ़ रही हैं, लेकिन लोगों में इसके प्रति जागरूकता की कमी है। गांवों में आज भी मिर्गी को भूत-प्रेत का असर माना जाता है, और मानसिक रोगों को ‘पागलपन’ समझ लिया जाता है। इसी कारण कई मरीज डॉक्टर के पास पहुंच ही नहीं पाते। माइग्रेन, मिर्गी और अवसाद जैसी बीमारियां अक्सर सालों तक पहचानी नहीं जातीं, जिससे मरीज की सेहत और बिगड़ जाती है।”
डॉ. धीरज गोदारा आगे बताते हैं कि “न्यूरोलॉजिस्ट की कमी एक गंभीर समस्या है। उदाहरण के तौर पर, श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय पर कुछ न्यूरोलॉजिस्ट हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में 200 किलोमीटर तक कोई विशेषज्ञ नहीं मिलता है। इसके अलावा, लोग अक्सर नीम-हकीमों या धार्मिक स्थलों पर चमत्कार की उम्मीद में इलाज ढूंढते हैं। इससे बीमारियों की पहचान देर से होती है और मरीज में विकलांगता या जटिलताएं बढ़ जाती हैं।”

डॉ. अभिमन्यु कालड़ा (वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट, जन सेवा हॉस्पीटल श्रीगंगानगर) बताते हैं कि “अधिकांश लोग माइग्रेन, स्ट्रोक, अल्जाइमर, पार्किंसन, मिर्गी जैसी बीमारियों की गंभीरता नहीं समझते और साधारण डॉक्टरों से ही इलाज करवाते हैं। कई बार गलत इलाज या एक जैसी दवाएं देने से बीमारी बढ़ जाती है। न्यूरोलॉजिस्ट ही सही जांच और दवा तय कर सकते हैं, जबकि कुछ लोग माइग्रेन की दवाएं लंबे समय तक खाकर किडनी तक खराब कर लेते हैं।”
न्यूरोलॉजिकल विकारों का उपचार
WHO के अनुसार, दुनिया की 40% आबादी किसी न किसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी से प्रभावित है। इन बीमारियों में से कई का इलाज संभव है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं की कमी है।
भारत में स्ट्रोक और माइग्रेन के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं, पर इलाज पाने वालों की संख्या कम है। सरकार ने टेली-न्यूरोलॉजी सेवाएं और जागरूकता अभियान शुरू किए हैं, लेकिन इन्हें और बढ़ाने की आवश्यकता है।
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