आशा को आज भी वो डरावनी रात याद है, जब वो अस्पताल के बाहर बैठी थी और अपने पति की जान बचाने की दुआ कर रही थी। उनके पास स्वास्थ्य बीमा नहीं था। हर घंटे अस्पताल का बिल बढ़ रहा था। इलाज जारी रखने के लिए उन्हें अपनी ज़मीन गिरवी रखनी पड़ी। यह कोई अनोखी या एकमात्र कहानी नहीं है बल्कि भारत में अनगित लोगों को कभी-न-कभी ऐसी स्थिति से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद, वे स्वास्थ्य बीमा के महत्व को समझ नहीं पाते हैं।
जब किसी के घर में अचानक मेडिकल इमरजेंसी आती है – जैसे कोई हादसा, गंभीर बीमारी या अचानक अस्पताल में भर्ती होना – तब परिवार इलाज से ज़्यादा खर्च की चिंता करता है। अगर उनके पास स्वास्थ्य बीमा नहीं है तो उनके लिए इलाज बहुत महंगा हो सकता है। नीति आयोग की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 63% से ज़्यादा स्वास्थ्य खर्च जेब से वहन किया जाता है, जिससे हर साल लगभग 5 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। स्वास्थ्य बीमा ऐसी वित्तीय बर्बादी को रोकता है।
फिर भी, भारत और ऐसे कई देशों में लोग स्वास्थ्य बीमा को या तो समझते नहीं हैं या फिर इसका इस्तेमाल नहीं करते हैं। हालांकि, इसके प्रति जागरूकता थोड़ी बढ़ी है, लेकिन अब भी कुछ लोग इसे नहीं अपनाते हैं।
स्वास्थ्य बीमा के लाभ
स्वास्थ्य बीमा सिर्फ आर्थिक सुरक्षा ही नहीं देता है बल्कि इसके निम्नलिखित लाभ भी होते हैं:
- बेहतर इलाज की पहुंच: बीमा होने पर लोग अच्छे, मान्यता प्राप्त अस्पतालों में इलाज करवा पाते हैं, जिससे बेहतर तरीके से इलाज होता है।
- खर्च में बचत: यह मेडिकल खर्चों से बचाता है। अगर बीमा ना हो, तो परिवार की बचत खत्म हो सकती है, कर्ज बढ़ सकता है या इलाज टालने की नौबत आ सकती है।
- निरंतर इलाज: बीमा की वार्षिक सीमा और नियमित जांच सेवाओं की मदद से मरीज बिना रुकावट पूरा इलाज करवा सकते हैं।
- मानसिक राहत: यह जानकर कि इमरजेंसी में आर्थिक मदद मिलेगी, तनाव कम होता है और स्वास्थ्य पर भी अच्छा असर पड़ता है।
लोग इसे खरीदने में देरी क्यों करते हैं?
इन लाभों के बावजूद ऐसे कई कारण हैं, जिनकी वजह से लोग स्वास्थ्य बीमा खरीदने में देरी करते हैं या उसे खरीदने से बचते हैं। ये कारण अक्सर धारणा, सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं और व्यवस्थागत कमियों में निहित होते हैं:
- कम जोखिम का भ्रम
कई युवा सोचते हैं कि वे अभी स्वस्थ हैं, इसलिए उन्हें स्वास्थ्य बीमा की जरूरत नहीं है, लेकिन जब कोई बीमारी या हादसा होता है, तब उन्हें पता चलता है कि बीमा तुरंत मदद नहीं करता, विशेषकर जब पहले से कोई बीमारी हो या स्वास्थ्य बीमा में waiting period हो। ऐसे मामलों में इलाज का खर्च खुद उठाना पड़ता है। अगर आप समय रहते, यानी जब आप पूरी तरह स्वस्थ हों, तब स्वास्थ्य बीमा लेते हैं, तो न सिर्फ प्रीमियम कम होता है, बल्कि आपको पूरा कवरेज भी मिलता है। इसलिए यह समझदारी है कि बीमा बीमारी के बाद नहीं, उससे पहले लिया जाए। - बीमा की जटिल भाषा
स्वास्थ्य बीमा के कागज़ों में अक्सर ऐसे मुश्किल शब्द होते हैं जिन्हें समझना आसान नहीं होता, जैसे – को-पेमेंट, एक्सक्लूज़न, डिडक्टिबल इत्यादि। जो लोग पहली बार बीमा ले रहे होते हैं, उन्हें यह सब समझने में परेशानी होती है। इसी वजह से कई लोग बीमा लेने में देर कर देते हैं या फिर ऐसा प्लान चुन लेते हैं जो उनकी जरूरत के हिसाब से सही नहीं होता है। - प्राथमिकताओं में काफी अंतर
कम आमदनी वाले लोग सबसे पहले खाना, किराया और बच्चों की पढ़ाई जैसी जरूरी चीज़ों पर खर्च करते हैं। उन्हें स्वास्थ्य बीमा ऐसा खर्च लगता है जिसका तुरंत कोई फायदा नहीं दिखता है। लेकिन जब कोई मेडिकल इमरजेंसी आती है, तब बिना बीमा के इलाज का खर्च बहुत भारी पड़ सकता है। - अविश्वास और खराब अनुभव
अगर किसी का क्लेम रिजेक्ट हो गया हो या देर से मिलता है, तो वे अन्य लोगों को भी बीमा से दूर रहने की सलाह देने लगते हैं। ये एक तरह का नकारात्मक फिडबैक है, जिससे लोगों का भरोसा टूटता है और उन्हें लगता है कि बीमा कोई गारंटी नहीं है। - नियोक्ता बीमा (employer insurance) या सरकारी अस्पताल पर भरोसा
बहुत से नौकरीपेशा लोग अपने ऑफिस के बीमा पर ही निर्भर रहते हैं, जो अक्सर सीमित होता है और नौकरी छूटने पर समाप्त हो जाता है। वहीं, ग्रामीण और गरीब इलाकों में रहने वाले लोग सरकारी अस्पतालों को ही पर्याप्त मानते हैं लेकिन वहां सुविधाएं कम और भीड़ ज़्यादा होती है, जिससे इलाज में देरी या परेशानी हो सकती है।
देरी की भारी कीमत
अधिकांश लोग यह नहीं जानते हैं कि स्वास्थ्य बीमा लेने में देरी करना आगे चलकर उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है क्योंकि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे बीमा का प्रीमियम महंगा हो जाता है। अगर पहले से कोई बीमारी है, तो उसका कवरेज तुरंत नहीं मिलता है। इसके लिए सालों इंतजार करना पड़ता है। अत: अचानक बीमारी या हादसे के बाद बीमा लेना मुश्किल या महंगा हो सकता है।
साथ ही ऐसी कई बीमारियां हैं, जो उम्र के 20वें या 30वें पड़ाव पर हो सकती हैं, जो असंतुलित जीवनशैली की वजह से होती हैं। उदाहरण के लिए, PCOS, PCOD, हाइपरटेंशन, उच्च रक्तचाप। इसके अलावा, रात को नींद ना आने की वजह से भी बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।
अगर किसी को पहले ही कोई गंभीर बीमारी हो चुकी हो, तो बीमा कंपनियां या तो बहुत ज़्यादा प्रीमियम लेती हैं या बीमा देने से मना कर देती है। ऐसे में समय पर बीमा लेना ना सिर्फ सस्ता पड़ता है बल्कि ज़रूरत के समय मददगार भी साबित हो सकता है।
लोगों को स्वास्थ्य बीमा लेने से रोकने वाले मुख्य कारक
भले ही भारत में स्वास्थ्य बीमा सिस्टम धीरे-धीरे बेहतर हो रहा है और आरोग्य संजीवनी पॉलिसी और आयुष्मान भारत जैसी मुख्य सरकारी योजनाएं आई हैं लेकिन फिर भी कई समस्याएं बनी हुई हैं। जैसे-
- बीमा की जानकारी अब भी क्षेत्रीय भाषाओं में कम है।
- गांवों में बीमा की पहुंच अब भी बहुत कम है।
- ज़्यादातर एजेंट सिर्फ पॉलिसी बेचते हैं लेकिन लोगों को सही जानकारी नहीं देते हैं।
- प्राइवेट और सरकारी बीमा के बीच नियम अलग-अलग हैं, जिससे भ्रम बढ़ता है।
कई लोगों को पता ही नहीं होता कि उन्हें किस तरह की पॉलिसी लेनी चाहिए या क्या वे किसी सरकारी योजना (जैसे PMJAY) के लिए योग्य हैं या नहीं। यहां तक कि जो लोग मुफ्त बीमा पाने के हकदार हैं, वे भी जानकारी की कमी या जटिल प्रक्रिया की वजह से पंजीकरण नहीं करवा पाते हैं।
ज़रूरत पड़ने से पहले कदम उठाएं
स्वास्थ्य कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जिसे मुसीबत आने पर लिया जाए। यह हेलमेट या सीटबेल्ट की तरह है – इसका फायदा तभी होता है जब पहले से तैयार रहें। अगर बीमा नहीं है, तो बीमारी या हादसे के समय इलाज का खर्च बहुत बड़ा बोझ बन सकता है। इससे इलाज में देरी, पैसों की तंगी या सेहत का नुकसान हो सकता है। ये सभी तत्व मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डालते हैं। अत: स्वास्थ्य बीमा लेना डर नहीं, बल्कि समझदारी और एक सुरक्षित, सम्मानजनक ज़िंदगी की ओर उठाया गया सही कदम है।
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