आधुनिक युग में विभिन्न प्रकार की बीमारियां फैल रही हैं, जिनमें किडनी रोग भी शामिल है। इससे दुनिया भर के लाखों लोग प्रभावित हैं। किडनी रोग का अत्यधिक प्रभाव ग्रामीण क्षेत्र में देखने को मिल रहा है क्योंकि वहां पर जागरूकता, स्वास्थ्य सेवाओं और सही इलाज की कमी होती है। किडनी रोग विभिन्न कारकों से हो सकता है। उदाहरण के लिए जलवायु परिवर्तन। इस लेख में हमने जलवायु परिवर्तन और किडनी रोग के संबंध पर चर्चा है।
किसानों की मुख्य समस्या
क्रोनिक किडनी रोग (CKD) और acute kidney injury (AKI) होने की संभावना किसानों में सबसे अधिक होती है क्योंकि उन्हें लंबे समय तक धूप में रहना पड़ता है। इसके अलावा कम पानी और उसमें मौजूद रसायन खेतों में काम करने वाले किसानों की किडनी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। डॉक्टरों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) के मामले बढ़ रहे हैं। लंबे समय तक धूप में काम करने से शरीर में पानी की कमी (dehydration) और गर्मी इस बीमारी की मुख्य वजह हो सकती है।

डॉ. नटराजन गोपालकृष्णन, प्रमुख, वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट और स्टेट ट्रांसप्लांट रजिस्ट्री बताते हैं, “अगर कोई व्यक्ति एक दिन में पांच घंटे से अधिक समय तक धूप में रहता है, तो उसकी किडनी को नुकसान पहुंच सकता है। जलवायु परिवर्तन से ग्रामीण जीवन बदल रहा है जिनमे किसान भी शामिल हैं क्योंकि उन्हें तेज़ धूप में काम करना होता है। चूंकि, इसका उनकी किडनी पर गहरा असर पड़ता है इसलिए यह जरूरी है कि वे बीच-बीच में ठंडी जगह पर जाएं और हर घंटे पानी पीते रहें। शरीर में पानी की कमी होने की वजह से किडनी में विषाक्त तत्व जमा हो सकते हैं। इससे संक्रमण हो सकता है।”
उन्होंने आगे बताया, “ग्रामीण इलाकों में लोग ज्यादातर भूजल पर निर्भर होते हैं। इसमें मैग्नीशियम और कैल्शियम की मात्रा ज्यादा होती है। खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक बारिश या सिंचाई के पानी के साथ बहकर कुओं को दूषित कर देते हैं।”
ग्रामीण क्षेत्रों में किडनी रोग के निदान और उपचार में चुनौतियां
- ग्रामीण क्षेत्रों में किडनी रोग की पहचान और रोकथाम में सबसे बड़ी चुनौती जानकारी की कमी है। अधिकांश लोगों को यह जानकारी नहीं होती है कि मधुमेह और उच्च रक्तचाप किडनी रोग के प्रमुख कारण बन सकते हैं। चूंकि, इस बीमारी के लक्षण नज़र नहीं आते हैं इसलिए लोग सही समय पर डॉक्टर के पास नहीं जा पाते हैं। इसके परिणामस्वरूप उनकी सेहत काफी बिगड़ जाती है।
- इसके अलावा, किडनी संबंधी मिथक भी लोगों को गुमराह कर रहे हैं और इलाज में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। अत: इन मिथकों की वास्तविकता जानना आवश्यक है।
- ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं में कमी देखने को मिलती हैं। इसकी वजह से, ग्रामीण मरीजों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
- ग्रामीण अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में जरूरी जांच और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी होने की वजह से किडनी रोग के शुरूआती संकेतों का पता नहीं चलता है। इसके अलावा किडनी की पहचान में आवश्यक टेस्ट उदाहरण के लिए, सीरम क्रिएटिनिन टेस्ट, मूत्र जांच और ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग, ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध ही नहीं होते है।
- किसानों के लिए दिनभर धूप में काम करना किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है।
काम करना नहीं छोड़ सकते हैं किसान

नितेश, पूर्वी चंपारण, मोतिहारी बताते हैं कि “हम किसानों को धूप में काम करना पड़ता है क्योंकि फसल को पानी देना होता है, उस पर कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता है। घंटों धूप में काम करना थका देने वाला होता है इसलिए हमें बीच-बीच में आराम करना पड़ता है। जलवायु परिवर्तन का असर ना केवल फसलों पर पड़ता है बल्कि हम किसानों के जीवनचर्या पर भी पड़ता है। साथ ही प्राथमिक उपचार केंद्र उतने विकसित नहीं हैं, जहां लोग जाकर अपने किडनी का रुटीन चेकअप करवा सकें।”

40 वर्षों के अनुभव से उमेंद्र दत्त (संस्थापक सदस्य और कार्यकारी निदेशक, खेती विरासत मिशन, पंजाब; राष्ट्रीय जैविक खेती टास्क फोर्स के सदस्य, भारत सरकार; कार्यकारी परिषद, राष्ट्रीय वनस्पति स्वास्थ्य प्रबंधन संस्थान, हैदराबाद एवं भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद, देहरादून के सदस्य) बताते हैं कि, “किसानों का जीवन अनेक समस्याओं से भरा होता है। कभी कीटनाशकों के दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है तो कभी जलवायु परिवर्तन का बोझ। लंबे समय तक खेत में बिना पानी के काम करने से कई किसानों का शारीरिक स्वास्थ्य भी प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, किडनी की समस्या और त्वचा संबंधी समस्याएं आदि। अत: यह आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से होने वाली बीमारियों से निपटने के लिए मज़बूत स्वास्थ्य नीतियों और रणनीतियां अपनाई जाएं।”
पानी की कमी के कारण किसानों की समस्या

डॉ. गणेश श्रीनिवास प्रसाद पी, कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट, नारायण हेल्थ सिटी, बेंगलुरु बताते हैं, “खेत में लंबे समय तक काम करने (तेज़ धूप या गर्मी में) से उनके शरीर में पानी की कमी हो सकती है। इसकी वजह से किडनी रोग हो सकता है। अत: किडनी के लिए अच्छे खाद्य पदार्थों का सेवन करना लाभकारी हो सकता है।”
शोध से पता चलता है कि पहले ग्रामीण इलाकों में किसान झीलों, तालाबों और उथले कुओं (shallow wells) से पानी पीते थे लेकिन अब वे भूजल पर निर्भर हो गए हैं। आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भूजल की गुणवत्ता खराब होती जा रही है। इसके अलावा, आंध्र प्रदेश में गर्मी का समय बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, वसंत ऋतु में लू (Heat wave) का असर अब 35 दिनों तक बना रहता है, जिससे हीट स्ट्रोक और मौतों का खतरा भी बढ़ गया है।
निष्कर्ष
जलवायु परिवर्तन का किसानों के समग्र स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। जिनमें किडनी भी शामिल है। उदाहरण के लिए, बढ़ते तापमान से शरीर में पानी की कमी होना। अत: किसानों की सुरक्षा के लिए बेहतर पानी की उपलब्धता, बेहतर काम करने की स्थिति, जलवायु-अनुकूल खेती के तरीके और स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच प्रदान करने जैसे कदम उठाने की आवश्यकता है।
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