भारत में जनसंख्या दबाव सार्वजनिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है

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भारत की जनसंख्या बहुत ज़्यादा है – अर्थात् 1.4 अरब से भी ज़्यादा लोग। ऐसे में लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सेवा देना एक चुनौती है। अस्पतालों में अक्सर भारी भीड़ होती है, डॉक्टर कम होते हैं और जरूरी संसाधन (जैसे दवाइयां, मशीनें आदि) भी नहीं होते हैं। जनसंख्या बढ़ने की वजह से सभी को बराबर और अच्छी इलाज सुविधा देना मुश्किल हो रहा है। इस लेख में हमने यह जानने का प्रयास किया है कि भारत में जनसंख्या दबाव सार्वजनिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है।

जनसंख्या बढ़ने का सबसे अधिक असर उन लोगों पर होता है जिनकी आमदनी कम है या जो गरीब हैं। उन्हें इलाज करवाने में समस्या आती है क्योंकि उनके पास ज़्यादा पैसे नहीं होते। ऐसे लोग सरकारी अस्पताल या सस्ता इलाज ढूंढते हैं। वहीं, जो लोग अमीर हैं या जिनकी आमदनी अच्छी है, उन्हें इलाज में उतनी परेशानी नहीं होती है।

वर्तमान स्थिति

भारत की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है, विशेषकर शहरों में। इससे अस्पतालों और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत दबाव पड़ रहा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में कुछ इलाकों में हर 1 वर्ग किलोमीटर में 20,000 से ज्यादा लोग रहते हैं। इतने लोगों के लिए अस्पतालों में इलाज देना बहुत मुश्किल हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या इतनी ज्यादा होती है कि कई बार एक ही बेड पर दो मरीजों को रहना पड़ता है। इलाज के लिए बहुत लंबा इंतजार करना पड़ता है और डॉक्टरों पर बहुत दबाव रहता है।

मुजफ्फरपुर के एक अस्पताल में भर्ती एक 70 साल के मरीज की पोती, फुल कुमारी बताती हैं –
“यहां बहुत भीड़ है, सारे बेड भरे रहते हैं। मरीजों को ज़मीन पर चादर बिछाकर लेटाना पड़ता है। अस्पताल में हर दिन 50 से ज़्यादा मरीज आते हैं, इसलिए सुविधाएं नहीं मिल पातीं। बेड की संख्या बढ़ानी चाहिए।”

एक सर्वे के मुताबिक, 2021 में भारत की 65% आबादी गांवों में रहती थी और करीब 47% लोग खेती पर निर्भर थे इसलिए सरकार के लिए ग्रामीण विकास पर ध्यान देना ज़रूरी है। सरकार का उद्देश्य गांवों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना है ताकि उनका विकास सही तरीके से हो सके। सरकार की कोशिश है कि ग्रामीण भारत को सामाजिक और आर्थिक रूप से मज़बूत बनाया जाए, ताकि वहां के लोगों की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव आ सके। इसके बावजूद, इस क्षेत्र में और मेहनत करने की आवश्यकता है।

बुनियादी ढांचे में असंतुलन

पिछले 20 सालों में भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था ने कई अहम उपलब्धियां हासिल की हैं। उदाहरण के लिए, शिशु मृत्यु दर का घटना, लोगों की औसत उम्र बढ़ना और टीकाकरण बेहतर होना। इसके बावजूद निम्नलिखित प्रकार की समस्याएं देखने को मिलती हैं:

  • बिस्तर और सुविधाएं: भारत स्वास्थ्य प्रणाली समीक्षा के अनुसार भारत में हर 1,000 लोगों पर सिर्फ 1.5 अस्पताल के बिस्तर हैं, जबकि दुनिया का औसत 3.2 है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ये संख्या और भी कम है। कोविड-19 महामारी के समय यह कमी साफ नजर आई थी। अस्पतालों में ऑक्सीजन, ICU बिस्तर और शवदाह गृह की भारी कमी हो गई थी।
  • स्वास्थ्य सेवा कार्यबल: भारत में डॉक्टर और मरीजों के साथ ही नर्सों और मरीजों का अनुपात अभी भी काफी कमजोर है। दूर-दराज और आदिवासी इलाकों में बड़ी आबादी अब भी ज़्यादातर आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम पर निर्भर है। ये महिलाएं ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ हैं लेकिन उन्हें बहुत कम वेतन मिलता है और ज़रूरी मदद भी नहीं मिलती है।
  • साफ-सफाई का अभावः गंदी बस्तियों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में साफ-सफाई की कमी की वजह से टीबी, डेंगू और दस्त जैसी बीमारियां आसानी से फैलती हैं। यहां साफ पानी की कमी और कचरा सही तरीके से ना निपटाने से स्थिति बिगड़ जाती है। जनसंख्या बढ़ने से ये समस्याएं और ज्यादा बढ़ जाती हैं। 

शहरी-ग्रामीण विभाजन और प्रवासन दबाव (migration pressure)

गांवों में इलाज की सुविधा कम होने की वजह से लाखों लोग इलाज के लिए शहरों का रुख कर रहे हैं। इससे शहरों के अस्पतालों पर बहुत ज़्यादा बोझ पड़ रहा है। शहरों की आबादी तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अच्छे प्लान की कमी के कारण वहां भीड़, गंदगी और बीमारियां बढ़ रही हैं।

प्रवासी मजदूरों को अक्सर अस्थायी काम ही मिलता है और उनके पास कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं होता है। इसलिए वे सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का फायदा भी नहीं उठा पाते हैं। शहरों के अस्पतालों को अब दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है।

दिव्यांगों पर जनसंख्या का असर

जब आबादी बढ़ती है, तब दिव्यांग लोगों को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। भीड़ बढ़ने की वजह से अस्पताल, डॉक्टर, दवाइयाँ और ज़रूरी चीज़ों की माँग बहुत बढ़ जाती है, जिससे दिव्यांग लोगों को सही इलाज और मदद नहीं मिल पाती है। ज़्यादातर सेवाएँ आम लोगों को दी जाती हैं और दिव्यांग लोगों की ज़रूरतें नज़रअंदाज़ हो जाती हैं। इसके अलावा, बस, ट्रेन और सार्वजनिक जगहों पर भीड़ बढ़ने से उनका आना-जाना भी बहुत मुश्किल हो जाता है। इस तरह, जनसंख्या वृद्धि की वजह से दिव्यांग लोग समाज से पीछे छूट जाते हैं।

Puneet Singh

पुनीत सिंह सिंघल, संस्थापक, ग्रीन डिसेबिलिटी, बताते हैं, “जब आबादी बहुत तेजी से बढ़ती है, तब अस्पताल, डॉक्टर और दवाओं पर बहुत ज़्यादा दबाव पड़ता है। इसका सबसे ज़्यादा नुकसान उन लोगों को होता है जो पहले से ही कमजोर होते हैं। उदाहरण के लिए, दिव्यांग लोग। जब ज़रूरत से कम संसाधन होते हैं, तो दिव्यांग लोगों की मदद करने की बजाय उन्हें अनदेखा कर दिया जाता है। इसके अलावा, कई देशों में दिव्यांग लोगों की सही संख्या पता नहीं चलती क्योंकि या तो अच्छे सर्वे नहीं होते या फिर लोग सामाजिक डर की वजह से जानकारी छुपा लेते हैं। जब सरकार के पास सही आंकड़े ही नहीं होते, तो वह उनके लिए अच्छी योजना नहीं बना पाती। इस समस्या को ठीक करने के लिए दो बातें ज़रूरी हैं—एक, सभी के लिए स्वास्थ्य सेवाएं आसान और सुलभ हों; और दूसरी, दिव्यांग लोगों की सही जानकारी जुटाई जाए। तभी हम एक ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं जो सबकी ज़रूरतों का ध्यान रखे, विशेषकर उन लोगों का जो अक्सर पीछे रह जाते हैं।”

मानसिक स्वास्थ्य और भीड़भाड़

जनसंख्या दबाव का मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है। भीड़भाड़ वाली जीवन-स्थितियां, संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा, बेरोज़गारी और गरीबी तनाव, चिंता, अवसाद और आत्महत्या के विचारों को भी बढ़ावा देता है।

भारत की लगभग 10.6% आबादी मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रही है, लेकिन जिन लोगों को इलाज या सहायता की जरूरत होती है, उनमें से 76-85% को कोई सेवा नहीं मिल पाती। हालांकि सरकार ने 2014 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति और 2017 में मानसिक स्वास्थ्य सेवा अधिनियम के तहत मानसिक स्वास्थ्य के लिए अधिक धन आवंटित करने के प्रावधान किए हैं, फिर भी इस क्षेत्र में सुधार की संभावना है। पूरे देश के स्वास्थ्य बजट का 1% से भी कम हिस्सा ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए खर्च किया जाता है, जिससे यह साफ होता है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को बेहतर बनाने के लिए प्रयास और संसाधनों की आवश्यकता है।

Dr Binda Singh

डॉ. बिंदा सिंह, मनोचिकित्सक बताती हैं, “जनसंख्या के बढ़ने से मानसिक समस्याएँ भी बढ़ जाती हैं। जब किसी जगह पर बहुत भीड़ होती है, तब वहाँ जरूरी चीजें कम पड़ जाती हैं। इससे लोग तनाव में आ जाते हैं और दुखी महसूस करते हैं। भीड़ वाले इलाकों में लोग एक-दूसरे से दूर रहते हैं, एक-दूसरे को पहचानते नहीं हैं और दोस्ती-मिलन कम हो जाता है। ऐसे माहौल में लोग जल्दी चिड़चिड़ा हो जाते हैं, गुस्सा करते हैं और मानसिक थकान महसूस करते हैं।”

डॉ. बिंदा सिंह आगे बताती हैं, “भारत की बढ़ती जनसंख्या से स्वास्थ्य सेवाओं, शहरों की व्यवस्था और लोगों की मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। गांवों में इलाज की सुविधाएं कम होने की वजह से लोग शहरों की तरफ जाते हैं, जिससे अस्पतालों पर भारी दबाव पड़ता है। प्रवासी मजदूरों को बीमा नहीं मिलता और शहरों में भीड़, गंदगी और तनाव बढ़ते जा रहे हैं। हरियाली और खुली जगह कम होने की वजह से लोग मानसिक रूप से थकान महसूस करते हैं। सच तो यह है कि जहां जनसंख्या कम होती है, वहां लोग ज्यादा शांत और संतुलित जिंदगी जीते हैं।”

सरकारी प्रयास और चुनौतियां 

सरकार ने आयुष्मान भारत और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी योजनाएं शुरू की हैं ताकि लोगों को बेहतर इलाज की सुविधा मिल सके, लेकिन ये योजनाएं हर राज्य में एक जैसी तरह से लागू नहीं हुई हैं। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या और सुविधाएं आज की बढ़ती ज़रूरतों के हिसाब से नहीं बढ़ी हैं। डिजिटल इलाज जैसी नई तकनीकें मदद तो करती हैं, लेकिन ये अस्पताल, मशीनों और डॉक्टरों का पूरी तरह से विकल्प नहीं बन सकतीं।

भारत ने 2000 में एक जनसंख्या नीति बनाई थी, जिसका उद्देश्य था जनसंख्या को नियंत्रित करना और लोगों की सेहत सुधारना, लेकिन इसे ठीक से लागू नहीं किया गया। आज भी जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुद्दों पर बात करना राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील माना जाता है, इसलिए इस पर सख्त कदम उठाना मुश्किल हो जाता है।

जनसंख्या के दबाव को कम करने के तरीके

जनसंख्या के बढ़ते दबाव से स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ रहे बोझ को कम करने के लिए कई बिंदुओं पर एक साथ काम करने की ज़रूरत है। जैसे-

  1. अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्र की संख्या बढ़ाना: ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में ज़्यादा अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और क्लीनिक बनाए जाएं ताकि लोगों को इलाज के लिए दूर ना जाना पड़े।
  2. डॉक्टर और स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या बढ़ाना: डॉक्टरों, नर्सों और आशा कार्यकर्ताओं को अच्छी ट्रेनिंग दी जाए। साथ ही उन्हें समय पर भर्ती किया जाए और सही मेहनताना दिया जाए।
  3. परिवार नियोजन और जागरूकता: जनसंख्या को धीरे-धीरे नियंत्रित करने के लिए गर्भनिरोधक साधनों, प्रजनन स्वास्थ्य शिक्षा और महिलाओं को फैसले लेने की आज़ादी मिलनी चाहिए।
  4. स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं: हर इलाज के लिए बड़े शहर ना भागना पड़े इसलिए गांवों और छोटे शहरों में समुदाय आधारित स्वास्थ्य मॉडल अपनाए जा सकते हैं। इससे गांवों एवं शहरों के बीच पलायन का स्तर भी कम हो सकेगा।
  5. शहरों की साफ-सफाई और योजना: झुग्गी बस्तियों में साफ पानी, पक्के घर, शौचालय और कचरा निपटाने की अच्छी व्यवस्था हो ताकि बीमारियां ना फैलें।
  6. सरकारी बजट बढ़ाना: सरकार को अपनी राष्ट्रीय नीति के मुताबिक स्वास्थ्य पर बजट बढ़ाकर जीडीपी का कम से कम एक सुरक्षित स्तर करना चाहिए ताकि सबको बेहतर इलाज मिल सके।

भारत की बढ़ती जनसंख्या एक ओर उसकी ताकत है, तो दूसरी ओर एक बड़ी चुनौती भी। अगर स्वास्थ्य सेवाएं जनसंख्या के अनुसार नहीं बढ़ीं, तो विशेषकर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए इलाज पाना मुश्किल हो जाएगा। अस्पतालों में भीड़, डॉक्टरों की कमी और सीमित सुविधाएं इसका सीधा असर हैं। सरकार की योजनाएं जैसे आयुष्मान भारत मददगार हैं, लेकिन सभी जगह ठीक से लागू नहीं हो पाई हैं। जनसंख्या नियंत्रण पर बात करना अब भी संवेदनशील माना जाता है, जिससे इस पर सख्त कदम उठाना मुश्किल होता है। इसलिए अब समय है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से काम किया जाए और लोगों को जागरूक किया जाए।

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Saumya Jyotsna
An award-winning journalist, Saumya brings out stories about grassroot level developments in the public health sector.
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