रक्षा बंधन से जीवन रक्षा तक का सफर

रक्षा बंधन भाई-बहन का त्यौहार है, जिसे कई सालों से मनाया जा रहा है लेकिन अब उसमें भी कई बदलाव हुए हैं। जानें क्या है, रक्षा बंधन के नए और विकसित मायने…

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Last Updated on अगस्त 30, 2023 by Neelam Singh

रक्षा बंधन का त्यौहार अब कई मायनों में बदलाव के पथ पर अग्रसर हो रहा है। जैसे – अब केवल बहने भाइयों को राखी नहीं बांध रहीं बल्कि भाई भी अपनी बहनों को राखी बांध रहे हैं क्योंकि रक्षा बंधन का अर्थ ही है, रक्षा करने वाला अर्थात् जो कोई भी आपकी रक्षा करे। देखा जाए, तो किसी के जीवन की रक्षा करना सबसे बड़ी बात होती है। शायद इसलिए ही डॉक्टर को भगवान का रुप कहा जाता है। हालांकि यह केवल एक अतिशियोक्ति है, जो लोग भावनाओं के वश में आकर बोल देते हैं। 

वहीं दूसरी ओर समाज में ऐसे कई उदाहरण हैं, जो हमें बताते हैं कि रक्षा बंधन को केवल विलासिता या दिखावे की पर्दे में ना ढंकते हुए एक प्रेरणात्मक कार्य के रूप में सबके सामने रखना है, जिससे अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिल सके। 

बौन मैरो देकर की जीवन रक्षा

इस रक्षा बंधन पर ढकनिया, चंडी, नालन्दा, बिहार के रहने वाले 12 साल के कार्तिक सिंह ने अपनी 8 साल की नन्हीं थैलिसिमिया पीड़ित बहन सानवी सिंह को बोन मैरो डोनेट कर जिंदगी का उपहार दिया है। यह बोन मैरो ट्रांसप्लांट नारायणा हेल्थ, बंगलौर में होने वाला है। इन बच्चों के पिता का नाम रवीश कुमार और माता का नाम स्वीटी सिंह है। 

बच्चों की माता स्वीटी सिंह बताती हैं, “जब कार्तिक को डॉक्टर की बातें सुनकर समझ में आया कि उसकी बहन को थैलिसिमिया है, तो उसने इंटरनेट पर सर्च करके इससे संबंधित सारी जानकारी निकाली। पहले हम भी थोड़े डरे हुए थे लेकिन डॉक्टर ने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट सुरक्षित होता है इसलिए हम राजी हुए।”

थैलिसिमिया एक अनुवांशिक रोग है, जो माता-पिता से बच्चों में हस्तांतरित होता है। यह रक्त संबंधित विकार है। इस रोग के होने पर हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है, जिस कारण रक्त की कमी होने लगती है, जिस कारण उसे बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। 

किडनी डायलिसिस से मिली मुक्ति

विशाखापट्टनम, आंध्र प्रदेश के रहने वाले 35 साल के गणेश किडनी की परेशानी से जूझ रहे थे और उन्हें लगातार डायलिसिस की जरूरत पड़ रही थी। उनकी 43 साल की बड़ी बहन चंद्रावती ने अपने भाई को किडनी दान करके अपने भाई की जीवन रक्षा की है। यह ऑपरेशन केआईएमएस-आइकन अस्पताल, विशाखापट्टनम में किया गया है। चंद्रावती बताती हैं, “मुझे पता था कि मेरे भाई को लगातार डायलिसिस की प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। ऐसे में मैंने निर्णय लिया कि मैं अपने भाई को किडनी दान करुंगी क्योंकि रक्षा बंधन एक दूसरे की रक्षा करना का त्यौहार है।” वहीं गणेश बताते हैं, “बचपन में हम भाई बहन एक दूसरे को उपहार दिया करते थे लेकिन आज मेरी बहन में मुझे जीवन का उपहार दिया है।”

देश में तीन लाख मरीज अंगदान का इंतज़ार कर रहे हैं। देश में दाताओं की संख्या में वृद्धि मांग के अनुरूप नहीं है, मतलब अंगों की जरूरत ज्यादा है लेकिन दाता नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि देश को तत्काल दान की दर बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए डॉक्टरों और परिवारों के बीच इस बारे में अधिक जागरूकता होनी चाहिए कि कैसे एक मृतक दानकर्ता कई जिंदगियां बचा सकता है। 

सरकार ने बढ़ाएं हैं कदम

अंग के इंतजार में हर दिन कम से कम 20 लोग मर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अपने आंकड़ों के अनुसार दान दाताओं की संख्या (मृतकों सहित) साल 2014 में 6,916 से बढ़कर साल 2022 में लगभग 16,041 हो गई है। देश में हर 10 मिनट में एक व्यक्ति प्रतीक्षा सूची में जुड़ जाता है। मंत्रालय ने अंग दान को बढ़ावा देने के लिए कई कदमों की घोषणा की है, जिसमें अधिवास नियम (domicile rule) को खत्म करना भी शामिल है, प्राप्तकर्ताओं के पंजीकरण के लिए आयु सीमा को हटाना, प्रत्यारोपण के लिए पंजीकरण हेतु शुल्क हटाना, निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर नियमों को आसान बनाना, देश भर में अंग परिवहन की सुविधा, अंग दाताओं आदि के लिए विशेष आकस्मिक अवकाश। 

एक मृत अंग दाता आठ लोगों की जान बचा सकता है। दान की गई दो किडनी दो रोगियों को डायलिसिस उपचार से मुक्त कर सकती है। दान किए गए एक लीवर दो रोगियों के बीच बांटा जा सकता है। दान किए गए दो फेफड़ों का मतलब है कि दो अन्य रोगियों को जीवन जीने का दूसरा मौका और दान किए गए अग्न्याशय (Pancreas)और दान किए गए हृदय का मतलब है कि दो और रोगियों को जीवन का उपहार देना। 

कुल मिलाकर देखा जाए, तो ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं, जो हमें बताते हैं कि भाई बहन एक दूसरे की जीवन रक्षा करने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। हालांकि यहां एक बात का ध्यान रखना बेहद आवश्यक है कि अंगदान करने के लिए किसी भी भाई या बहन को बाधित ना किया जाए। कई बार देखा गया है कि माता-पिता बहनों की जिंदगी दांव पर लगाकर बेटे को बचाने का प्रयास करते हैं क्योंकि आज भी समाज में ऐसे कई परिवार हैं, जिनके लिए बेटी का होना किसी भार से कम नहीं है। 

रक्षा बंधन से जीवन रक्षा तक का सफर करने वाले भाई बहनों का प्यार वाकई बेमिसाल है, जो अपने जीवन की परवाह ना करते हुए अंग दान करने के लिए तैयार हो जाते हैं। 

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Saumya Jyotsna
Saumya Jyotsna
An award-winning journalist, Saumya brings out stories about grassroot level developments in the public health sector.
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