अक्सर लोग सफर के दौरान या भीड़-भाड़ वाले इलाकों में हेडफोन और ईयरबड्स का प्रयोग करते हैं। हालांकि, यह सुनने में अच्छा लगता है और देखने में भी सुंदर लगता है, लेकिन लंबे समय तक या तेज आवाज में प्रयोग से कान की सुनने की क्षमता कम हो सकती है, कान और सिर में दर्द हो सकता है, संक्रमण और हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वर्ष 2024-2025 में भारत में लगभग 6.3 करोड़ लोग सुनने की क्षमता में गंभीर कमी या बहरेपन की समस्या से प्रभावित हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है, जिसमें विशेष रूप से युवा शामिल हैं जो ईयरफोन या हेडफोन के अत्यधिक प्रयोग के कारण इस समस्या का सामना कर रहे हैं। यह एक गंभीर समस्या है, जिसे कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है।
हेडफोन का लगातार प्रयोग करने पर कान की सुनने वाली कोशिकाएं नुकसान पहुंच सकती हैं, जिससे बहरापन भी हो सकता है। इसके अलावा, दूसरों के हेडफोन या ईयरबड्स शेयर करने से बैक्टीरिया और फंगस फैल सकते हैं। इसलिए अपने कानों की सुरक्षा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है।
ईयरबड्स का प्रभाव
वर्तमान में हाई-टेक फोन और ईयरबड्स का प्रयोग आम हो गया है, विशेषकर युवाओं में। इसका अत्यधिक प्रयोग मानसिक समस्याओं को बढ़ा सकता है। इसलिए यह जानना आवश्यक है कि कानों के संक्रमण के लक्षण और उनका उचित उपचार क्या है। कान में दर्द, दबाव या सुनने में परेशानी कान के संक्रमण के सामान्य लक्षण हैं। कुछ संक्रमण अपने आप ठीक हो जाते हैं, जबकि कुछ में डॉक्टर की मदद जरूरी होती है।
कानों का संक्रमण: मुख्य लक्षण
कान के संक्रमण के लक्षणों में शामिल हैं:
- कान में दर्द (हल्का या तेज, कभी-कभी सोते समय अधिक महसूस होना)
- सुनने की क्षमता में कमी (तरल पदार्थ जमा होने पर ध्वनि ठीक से नहीं पहुँचती, कान में भरा हुआ महसूस होना)
- तरल पदार्थ का रिसाव (संक्रमण गंभीर होने पर कान से तरल बहना)
- बुखार (अक्सर बच्चों में)
- संतुलन की समस्या (तरल जमा होने पर चक्कर आना और स्थिरता में कठिनाई)
कानों का संक्रमण: मुख्य कारण
कानों का संक्रमण मुख्य रूप से तब होता है जब वायरस या बैक्टीरिया मध्य कान को प्रभावित करते हैं। सूजी हुई यूस्टेशियन नलिकाएं तरल पदार्थ को बाहर नहीं निकाल पाती हैं, जिससे तरल जमा होकर संक्रमण कर सकता है। एलर्जी, बलगम या नाक की सूजन के कारण भी कान में तरल जमा हो सकता है। धुआँ, प्रदूषण और वायुदाब में बदलाव यूस्टेशियन नलिका को प्रभावित कर संक्रमण का खतरा बढ़ाते हैं।
कानों का संक्रमण: निदान
कानों के संक्रमण का निदान करने के लिए गहन जांच की आवश्यकता होती है। डॉक्टर सबसे पहले मरीज का इतिहास लेते हैं ताकि संक्रमण के कारण और ट्रिगर्स समझ में आएँ। इसके बाद ओटोस्कोप नामक उपकरण से कान की नली और पर्दे की जांच की जाती है, जिससे लालिमा, सूजन, तरल पदार्थ या पर्दे में छेद जैसी समस्याओं का पता चलता है। साथ ही कुछ अन्य परीक्षणों से भी संक्रमण की पुष्टि की जा सकती है।

कुन्दन सिंह बिष्ट, ग्राम प्यूड़ा विकासखण्ड रामगढ़, नैनीताल बताते हैं कि ” लोग अक्सर ईयरबड्स का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, कभी-कभी दिन में 12 घंटे तक। लंबे समय तक प्रयोग करने पर कानों में चक्कर या असामान्य महसूस होना, आवाजें हल्की सुनाई देना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कई लोगों ने इसे अनुभव करने के बाद ईयरबड्स का प्रयोग बहुत कम कर दिया। इससे पता चलता है कि यह शौक कितना नुकसानदायक हो सकता है।”

डॉ. देवेन्द्र सिंह, जिला हाॅस्पिटल, पिथौरागढ़, उत्तराखण्ड बताते हैं कि ” कानों में किसी भी प्रकार की समस्या को देर नहीं करनी चाहिए क्योंकि कान मानव शरीर का महत्वपूर्ण अंग है। यदि गंभीर या लगातार दर्द, कान से तरल, खून या मवाद का रिसाव, सुनने में कमी, तेज़ बुखार, चक्कर आना, अत्यधिक चिड़चिड़ापन या सोने में परेशानी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर को तुरंत दिखाना चाहिए और समय रहते सही इलाज लेना चाहिए।”
हालांकि, कानों के संक्रमण को पूरी तरह से रोकना मुश्किल हो सकता है, लेकिन कुछ सतर्क कदम से जोखिम कम किया जा सकता है। फ्लू (influenza) और न्यूमोकोकल (pneumococcal) जैसे टीके संक्रमण का कारण बनने वाले कुछ बैक्टीरिया और वायरस से सुरक्षा प्रदान करते हैं, जिससे कानों के संक्रमण का खतरा भी कम हो सकता है।
कानों का संक्रमण: उपचार
कानों के संक्रमण का उपचार इस बात पर निर्भर करता है कि संक्रमण किस कारण से हुआ है, कितना गंभीर है और कौन सा बैक्टीरिया है। हल्के संक्रमण में केवल दर्द कम करने वाली दवाइयाँ दी जा सकती हैं, जबकि बैक्टीरियल संक्रमण में गंभीर मामलों में एंटीबायोटिक्स की आवश्यकता होती है। अगर संक्रमण साइनस से संबंधित हो और कान में द्रव जमा हो रहा हो तो सूजन कम करने और द्रव निकलने में मदद के लिए डिकंजेस्टेंट्स दी जा सकती हैं। बहुत गंभीर या लंबे समय तक रहने वाले संक्रमण में सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है, जैसे मायरिगोटॉमी, जिसमें कान के परदे में छोटा चीरा लगाकर जमा हुआ तरल बाहर निकाला जाता है और दबाव कम किया जाता है। इसके अलावा, जन्म के समय कुछ बच्चों (लगभग 1000 में 3–4) को सुनने में समस्या हो सकती है, इसलिए नवजात बच्चों की सुनने की जांच की जाती है, जिसे नवजात श्रवण स्क्रीन (Newborn Hearing Screening) कहा जाता है।
बचाव के तरीके
अच्छी स्वच्छता संबंधी आदतें अपनाना महत्वपूर्ण है, जैसे गंदे हाथों से चेहरे, आँख, नाक और कान को न छूना। धुएँ के संपर्क में आने से बचना चाहिए क्योंकि यह श्वसन तंत्र में जलन पैदा कर सकता है और कान के संक्रमण का खतरा बढ़ा सकता है, इसलिए धूम्रपान मुक्त वातावरण बनाए रखना सुरक्षित रहता है। संक्रमण से बचाव के लिए ठंडी हवा और पानी के सीधे संपर्क से भी बचना चाहिए। शिशुओं के लिए पैसिफायर का प्रयोग सीमित करना चाहिए क्योंकि इसका अत्यधिक प्रयोग कान के संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकता है, जबकि 6 माह की उम्र के बाद पैसिफायर का सीमित प्रयोग जोखिम को कम करने में मदद करता है।
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