“लाली मेरे लाल की जित देखू तित लाल लाली देखन मै गयी मैं भी हो गयी लाल” इस कहावत का अर्थ है कि “जब कोई चीज़ बहुत आम हो जाती है, तो हर जगह वही दिखाई देती है”। आजकल यही हाल नेत्र संबंधी रोगों का है – जहां देखो, वहां लोग नेत्र संबंधी रोगों से परेशान नजर आते हैं। ऐसे में यह प्रश्न करना स्वभाविक है कि आंखों की देखभाल न करने का परिणाम क्या हो सकता है। इस लेख में हमने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है।
सरकारी और निजी अस्पतालों में हर दिन नेत्र रोगों से ग्रस्ति लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा होती है — लगभग 50% मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें किसी न किसी तरह की नेत्र समस्या होती है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान (National Institute of Health) की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 49.5 लाख लोग पूरी तरह नेत्रहीन हैं, और करीब 7 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में दृष्टिबाधित हैं। इसमें करीब 2.4 लाख बच्चे भी शामिल हैं जो नेत्रहीन हैं।
हालाँकि “विजन 2020: दृष्टि का अधिकार” जैसी योजनाओं से अंधेपन को रोकने और नियंत्रित करने में कुछ हद तक सफलता मिली है, लेकिन आंखों की बीमारियाँ अब भी लगातार बढ़ रही हैं।
विभिन्न प्रकार के नेत्र रोग
पिछले कुछ सालों में दुनिया भर में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें ऐसी बीमारियाँ भी शामिल हैं जो एक व्यक्ति से दूसरे को नहीं फैलती (जैसे मधुमेह, रक्तचाप) और ऐसी भी जो फैल सकती हैं (जैसे फ्लू या टीबी)। इन बीमारियों का स्वास्थ्य व्यवस्था पर बहुत दबाव पड़ रहा है।
इनमें नेत्र रोग भी शामिल हैं, जो किसी भी उम्र में हो सकते हैं। आंखों की मुख्य समस्याओं में पास का साफ न दिखना (मायोपिया), दूर का साफ न दिखना (हाइपरोपिया), धुंधला या टेढ़ा दिखाई देना (एस्टिग्मैटिज्म) और मोतियाबिंद जैसी बीमारियाँ शामिल हैं।
अगर समय रहते जांच और इलाज हो जाए, तो इन बीमारियों से आंखों को नुकसान से बचाया जा सकता है। आंखों की बीमारियाँ विभिन्न कारणों से हो सकती हैं जैसे – परिवार में पहले से बीमारी होना, उम्र बढ़ना, आंख में चोट लगना, संक्रमण या प्रदूषण जैसे पर्यावरणीय कारण।
नेत्र रोग से ग्रस्ति लोगों की कहानियां

वैभव सेलालेख, नैनीताल उत्तराखण्ड बताते है कि “मुझे कई दिनों से आंखों में जलन और खुजली हो रही थी। जब तकलीफ बढ़ने लगी, तो मैं अपने पास के क्लिनिक में डॉक्टर से मिलने गया। डॉक्टर ने मुझसे मेरी समस्या के बारे में पूछा। मैंने उन्हें बताया कि पहले मेरी दाईं आंख में परेशानी हुई थी, लेकिन अगले ही दिन मेरी बाईं आंख भी इससे प्रभावित हो गई। दोनों आंखों से हल्का पीला तरल निकलता था और सुबह उठने पर आंखें खोलना बहुत मुश्किल हो जाता था। साथ ही आंखों में लालिमा भी बनी रहती थी।”
वैभव आगे बताते हैं कि “मैंने डॉक्टर को बताया कि मैं मोबाइल और टीवी बहुत ज्यादा देखता हूं। इसी कारण मुझे 18 साल की उम्र में चश्मा लग गया था। जब आंखों में जलन और परेशानी बढ़ी, तब मैंने डॉक्टर से सलाह ली। डॉक्टर ने मेरी परेशानी को समझते हुए तुरंत दवाइयाँ शुरू कर दीं। साथ ही उन्होंने ठंडे पानी से आंखों की सिकाई करने, आई ड्रॉप्स डालने और तेज रोशनी या धुएं जैसे उत्तेजक चीज़ों से बचने की सलाह दी। मैंने ये सारी बातें नियमित रूप से मानीं, और करीब 10–15 दिनों के अंदर मेरी आंखों की समस्या काफी हद तक ठीक हो गई।”

नीरज नेगी, लेब तकनीशियन, आरोही आरोग्य केन्द्र सतोली, नैनीताल बताते हैं कि “आजकल ज़्यादातर काम मोबाइल, कंप्यूटर या लैपटॉप पर किए जाते हैं, जिससे आंखों पर ज़्यादा दबाव पड़ता है और तनाव बढ़ता है। यह लगातार स्क्रीन देखने की आदत आंखों की सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है। मेडिकल साइंस आज सैकड़ों तरह की नेत्र समस्याओं के बारे में जानता है, और इनमें से कई बीमारियों का इलाज संभव है, अगर समय पर जांच कर ली जाए और सही इलाज शुरू किया जाए।”
आंखों की बीमारियाँ अक्सर पुतली को प्रभावित करती हैं, और इन्हें नजरअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है। सही खानपान, पर्याप्त नींद और समय पर इलाज से आंखों की कई समस्याओं से बचा जा सकता है। आजकल बच्चों में मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल आंखों की सेहत को बिगाड़ रहा है, और इसमें माता-पिता की भूमिका भी होती है। छोटी उम्र में मोबाइल की आदत आगे चलकर चश्मा लगाने की वजह बन जाती है, इसलिए समय रहते सावधानी बरतना जरूरी है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ

डाॅ विशाल श्रीवास्तव, नेत्र रोग विशेषज्ञ, दृष्टि सेन्टर फाॅर एडवान्स आई केयर, हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखण्ड बताते हैं “आंखों की कई बीमारियाँ होती हैं, जिनमें सबसे खतरनाक ग्लूकोमा है। इसमें आंख के अंदर दबाव बढ़ जाता है, जिससे आंख की नसें (ऑप्टिक नर्व) खराब हो सकती हैं। अगर समय पर इलाज न किया जाए तो यह अंधेपन का कारण बन सकता है। उम्र बढ़ने के साथ मोतियाबिंद आम हो जाता है, लेकिन अब बच्चों में भी इसे देखने को मिल रहा है।”
पर्वतीय क्षेत्रों में मोतियाबिंद के मामले बढ़ने के कारण
पर्वतीय क्षेत्रों में अस्पताल और जागरूकता की कमी की वजह से मोतियाबिंद के मामले बढ़ रहे हैं। मौसम बदलने पर कई बीमारियाँ होती हैं, विशेषकर आई फ्लू (कंजेक्टिवाइटिस)। इसके लक्षण हैं—आंखों का लाल होना, खुजली, जलन, धुंधला दिखना, रोशनी से चुभन और सूजी पलकें। अगर हम जागरूक रहें तो अपनी और दूसरों की आंखों की रक्षा कर सकते हैं।
आंखों की कई बीमारियाँ संक्रमित व्यक्ति की आंखों से निकलने वाले तरल पदार्थ, गंदे तौलिये या आंखों के मेकअप के कारण फैलती हैं। हालांकि, ये बीमारियाँ आमतौर पर 10-15 दिन में ठीक हो जाती हैं, लेकिन कई बार लोग पूरा इलाज नहीं करते जिससे समस्या बढ़ जाती है और ऑपरेशन करने की आवश्यकता पड़ सकता है।
आंखों की देखभाल न करने का हमारे जीवन पर गंभीर असर डाल सकती है। छोटी-छोटी समस्याओं को नजरअंदाज करने से गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं, जो दृष्टि खराब कर सकती हैं या अंधापन का कारण बन सकती हैं। अत: अपनी आंखों का सही समय पर जांच कराना, सही देखभाल करना और आवश्यक इलाज करवाना बहुत जरूरी है। याद रखें कि जागरूकता और सावधानी से हम अपनी और अपने परिवार की आंखों की सेहत को बचा सकते हैं और एक खुशहाल जीवन जी सकते हैं।
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