64 वर्षीय राजेश्वरी मुकुंदन मेनन कई दशकों तक गठिया (आर्थराइटिस) और तेज़ एसिडिटी से परेशान रहीं। आखिरकार, साल 2019 में बेंगलुरु की रहने वाली राजेश्वरी को कुछ राहत मिली। उन्होंने सिद्ध चिकित्सा विशेषज्ञ पी. आर. असोकन से इलाज कराया और करीब 6 महीने में उनकी तबीयत में सुधार आने लगा। राजेश्वरी बताती हैं, “मैंने 25 साल तक पेट और घुटनों के असहनीय दर्द को सहा। आज मैं कह सकती हूँ कि मेरी सेहत 80% बेहतर है। एलोपैथी मुझे कभी सूट नहीं हुई। असोकन जी मुझे सिर्फ़ लगाने के लिए तेल देते हैं।”
पी. आर. असोकन पिछले 21 वर्षों से सिद्ध चिकित्सा और प्राणिक हीलिंग का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन वे बताते हैं कि पहले कभी उन्होंने इस पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के लिए इतनी ज़्यादा मांग और लोगों का भरोसा नहीं देखा। सिद्ध चिकित्सा को दुनिया की सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणालियों में से एक माना जाता है। इसमें बीमारियों के इलाज के लिए जीवनशैली और खानपान में बदलाव पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
आयुष को समझें
सिद्ध चिकित्सा, आयुर्वेद, यूनानी, योग और होम्योपैथी भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियाँ हैं, जिन्हें मिलाकर आयुष कहा जाता है। इन चिकित्सा पद्धतियों की शिक्षा और शोध को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने मार्च 1995 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होम्योपैथी विभाग (ISM&H) की स्थापना की। बाद में नवंबर 2003 में इसका नाम बदलकर आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी विभाग (AYUSH) कर दिया गया।
इसके बाद 2014 में आयुष मंत्रालय की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों के ज्ञान को संरक्षित करना और इन चिकित्सा प्रणालियों का विकास तथा प्रचार-प्रसार करना है।
सिद्ध चिकित्सा विशेषज्ञ पी. आर. असोकन का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर कोविड-19 महामारी के बाद, भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को लोगों ने पहले से अधिक अपनाना शुरू किया है। वे बताते हैं कि महामारी के बाद उनके बेंगलुरु स्थित केंद्र में आने वाले मरीजों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
समग्र स्वास्थ्य की ओर एक कदम
आयुर्वेद संतुलित खानपान, स्वस्थ जीवनशैली और जड़ी-बूटियों के माध्यम से अच्छे स्वास्थ्य पर ज़ोर देता है। वहीं, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा प्राकृतिक तत्वों और समग्र (होलिस्टिक) सिद्धांतों के आधार पर बीमारियों का इलाज करती हैं। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है। यह आसन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाने में मदद करता है। प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी) का मानना है कि शरीर में खुद को ठीक करने की क्षमता होती है। इसलिए इसमें प्राकृतिक उपचार और जीवनशैली में बदलाव पर ज़ोर दिया जाता है। वहीं, होम्योपैथी “जैसा रोग, वैसी दवा” के सिद्धांत पर आधारित है और कम दुष्प्रभाव वाले वैकल्पिक उपचार उपलब्ध कराने का दावा करती है।
आज भी ये सभी चिकित्सा प्रणालियाँ लोगों के बीच लोकप्रिय हैं। कई लोग पारंपरिक इलाज के साथ-साथ ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जो बीमारी की रोकथाम और संपूर्ण स्वास्थ्य पर ध्यान दें। दुनिया भर में बढ़ती जागरूकता के कारण भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को अपनाने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

डॉ. एस. मणिवन्नन, BNYS (बैचलर ऑफ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंसेज़), तमिलनाडु के चेंगलपट्टू स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योगा एंड नेचुरोपैथी मेडिकल साइंसेज़ में कार्यरत हैं। वे बताते हैं कि उनके संस्थान की ओपीडी में हर दिन करीब 250 मरीज इलाज के लिए आते हैं। डॉ. मणिवन्नन बताते हैं, “हम चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग नेचुरोपैथी अपनाएँ, क्योंकि इसमें लोगों की रुचि लगातार बढ़ रही है। नेचुरोपैथी में हम सही समय पर उठने, समय पर भोजन करने, संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने जैसी बातों पर ज़ोर देते हैं। हम सिर्फ बीमारी का नहीं, बल्कि पूरे व्यक्ति का इलाज करते हैं। हम खुद को सिर्फ डॉक्टर नहीं, बल्कि शिक्षक भी मानते हैं।”
उनके अनुसार, तमिलनाडु सरकार नेचुरोपैथी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। राज्य में 20 नेचुरोपैथी कॉलेज हैं। वे बताते हैं कि कोविड-19 महामारी के दौरान योग और नेचुरोपैथी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसी वजह से राज्य सरकार ने हर कोविड अस्पताल में एक नेचुरोपैथी डॉक्टर की नियुक्ति की थी।
सरकारी पहल
केंद्र सरकार विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से आयुष को मुख्यधारा की स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने का प्रयास कर रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) का उद्देश्य इसको स्वास्थ्य व्यवस्था का हिस्सा बनाना है, ताकि लोगों को गुणवत्तापूर्ण, किफायती और आसानी से उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाएँ मिल सकें।

डॉ. पूर्णिमा सिद्धांत, आयुर्वेद विशेषज्ञ, जो राउंडग्लास लिविंग से जुड़ी हैं, बताती हैं, “आयुष मंत्रालय लगातार आयुर्वेद को बढ़ावा देने और इस क्षेत्र में शोध को प्रोत्साहित करने के लिए काम कर रहा है। आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण और लाइसेंस की प्रक्रिया पहले की तुलना में आसान हो गई है। पैकेजिंग और निर्यात के नियमों में भी सुधार हुआ है। नई दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA) की स्थापना इस प्राचीन चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे और संस्थानों की ज़रूरत है, ताकि आयुर्वेद की शिक्षा अधिक व्यवस्थित हो और फर्जी चिकित्सकों पर रोक लगाई जा सके। इसी तरह, सभी MBBS छात्रों के लिए एक सप्ताह का यह प्रशिक्षण भी आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को उचित पहचान दिलाने की दिशा में अहम कदम है।” आज मरीजों को एक ही जगह पर अलग-अलग चिकित्सा पद्धतियों की सेवाएँ मिल रही हैं। इसके लिए सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) और जिला अस्पतालों (DH) में इसकी सेवाओं की व्यवस्था की है। यह मंत्रालय इन केंद्रों को आवश्यक बुनियादी ढाँचा, उपकरण, फर्नीचर और दवाओं के लिए सहायता प्रदान करता है। वहीं, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग आयुष डॉक्टरों और पैरामेडिकल कर्मचारियों की भर्ती और प्रशिक्षण का काम देखता है। सरकार ने आयुर्ग्यान, आयुरस्वस्थ और राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड जैसी कई योजनाएँ भी शुरू की हैं। इनका उद्देश्य औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देना और AYUSH चिकित्सा प्रणालियों के विकास के लिए अनुकूल माहौल तैयार करना है।
ग्लोबल वेलनेस इंस्टीट्यूट (GWI) की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक वेलनेस अर्थव्यवस्था हर साल 9.9% की दर से बढ़ने की उम्मीद है। अनुमान है कि 2025 तक AYUSH आधारित स्वास्थ्य और वेलनेस उद्योग 70 अरब डॉलर का कारोबार कर सकता है।
पिछले वर्ष इसको एक और बड़ी बढ़ावा मिला, जब भारत सरकार ने इलाज के लिए भारत आने वाले विदेशी नागरिकों के लिए AYUSH वीज़ा की नई श्रेणी शुरू की। इससे भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैश्विक स्तर पर और अधिक पहचान मिलने की उम्मीद है।

बेंगलुरु की योग प्रशिक्षक और पोषण विशेषज्ञ शालिनी सुधाकर का मानना है कि आज योग पहले से कहीं अधिक लोकप्रिय हो चुका है। वह बताती हैं, “पिछले 3–4 वर्षों में मेरी योग कक्षाओं में छात्रों की संख्या 70–80% बढ़ी है। मेरे पास ऐसे कई लोग आते हैं जिन्हें डॉक्टरों ने योग करने की सलाह दी है। इससे पता चलता है कि लोगों का योग पर कितना भरोसा बढ़ा है। फाइब्रोमायल्जिया, कमर दर्द और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं में डॉक्टर अक्सर मरीजों को योग करने की सलाह देते हैं। कोई यह नहीं कहता कि ब्लड प्रेशर ठीक करने के लिए पिलाटीज़ करें या जिम जाएँ। डॉक्टर योग की सलाह इसलिए देते हैं क्योंकि इसके फायदे वैज्ञानिक रूप से भी साबित हो चुके हैं।”
हालाँकि, केंद्र और राज्य सरकारें आयुष से संबंधित चिकित्सा प्रणालियों के शोध और विकास के लिए लगातार कदम उठा रही हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इससे संबंधित विश्वविद्यालयों और संस्थानों के लिए सख्त नियम और बेहतर निगरानी की ज़रूरत है। इससे योग्य और प्रशिक्षित चिकित्सक तैयार होंगे और लोगों को सही उपचार मिल सकेगा।
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