भारत में किशोरियों का यौन और प्रजनन स्वास्थ्य (reproductive health) एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती है। कम उम्र में शादी, गर्भनिरोधक के बारे में सीमित जानकारी, सामाजिक वर्जनाएं और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच किशोरियों को अनचाही गर्भावस्था और असुरक्षित गर्भपात के जोखिम में डालते हैं। हालांकि, किशोरावस्था शरीर और मानसिक विकास का अहम समय है, लेकिन कई जगहों पर लड़कियां अपनी फर्टिलिटी संबंधी निर्णयों पर नियंत्रण नहीं रख पाती हैं, जिससे स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है।
भारत में किशोर गर्भधारण की स्थिति
शोध से पता चलता है कि भारत में किशोर गर्भधारण अभी भी एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के अनुसार 15–19 वर्ष की लगभग 7% भारतीय लड़कियां या तो मां बन चुकी हैं या गर्भवती हैं। कुछ राज्यों में यह स्थिति और गंभीर है। उदाहरण के लिए, बिहार में लगभग 11% किशोरियां 15–19 वर्ष की उम्र में ही गर्भवती या मां बन जाती हैं, जिससे मातृ और शिशु स्वास्थ्य दोनों पर जोखिम बढ़ जाता है।
शोध से यह भी पता चलता है कि किशोर माताओं में अधिकांश लड़कियां आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की होती हैं और उनकी शिक्षा का स्तर कम होता है। साथ ही, उन्हें गर्भनिरोधक के बारे में सीमित जानकारी होती है, साधनों तक पहुंच कम होती है और अपने शरीर से संबंधित निर्णयों पर उनका नियंत्रण सीमित होता है।
अनचाही गर्भावस्था (Unwanted Pregnancy): एक संकट
किशोरियों में अनचाही गर्भावस्था की समस्या आमतौर पर होती है। इसके विभिन्न कारण होते हैं। जैसे- गर्भनिरोधक के बारे में सीमित जानकारी, परिवार का दबाव और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच। शोध से पता चलता है कि कम शिक्षा, आर्थिक असमानता और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी किशोर गर्भधारण के जोखिम को और बढ़ा देती है।
हालांकि, भारत में गर्भपात Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 के तहत प्रावधान है, फिर भी सुरक्षित गर्भपात सेवाओं तक पहुंच अभी भी सीमित है। ऐसा विशेषकर सामाजिक-आर्थिक रूप से वंचित समुदायों में होता है। यही वजह है कि देश में असुरक्षित गर्भपात की समस्या अभी भी देखने को मिलती है।
असुरक्षित गर्भपात का जोखिम
जब गर्भधारण अनचाहा होता है, तब अधिकांश किशोरियां सामाजिक वर्जना और डर के कारण सुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं तक नहीं पहुंच पाती है। इससे उन्हें असुरक्षित गर्भपात करना पड़ता है, जो उनके स्वास्थ्य और जीवन के लिए गंभीर खतरा है। भारत में कई किशोर गर्भधारण गर्भपात में समाप्त होते हैं और इनमें से कई असुरक्षित परिस्थितियों में होते हैं।

डॉ. कल्पना सिंह, स्त्री रोग विशेषज्ञ, (MBBS, MD (Obs and Gyn), DNB (Obs and Gyn), IGIMS बताती हैं “किशोरियों में अनचाहे गर्भ के मामले बढ़ गए हैं, लेकिन उनकी जागरूकता उतनी नहीं बढ़ी है। गलत तरीके से किया गया गर्भपात विभिन्न गंभीर समस्याएं पैदा कर सकता है। उदाहरण के लिए, अगर भ्रूण फेलोपियन ट्यूब में विकसित होने लगे (इकटोपिक प्रेगनेंसी), तो डॉक्टर की देखरेख आवश्यक होती है। केवल दवा खरीदकर लेने से स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा हो सकता है, जैसे बहुत अधिक रक्तस्राव।”
‘ना’ कहने का महत्व

तरुण कुमार, चुप्पी तोड़ो अभियान, जमशेदपुर, झारखंड बताते हैं, “किशोरियों के स्वास्थ्य जोखिम केवल चिकित्सा कारणों से नहीं होते है, बल्कि सामाजिक कारण भी शामिल हैं। अधिकांश किशोरियां, विशेषकर जिनकी शादी कम उम्र में होती है, अपने पति से यह कहने में असमर्थ होती हैं कि वे अभी गर्भधारण नहीं चाहती हैं या गर्भनिरोध प्रयोग करना चाहती हैं। लैंगिक असमानता, शिक्षा की कमी और सामाजिक अपेक्षाएं उनके निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती हैं।”
कई बार ये सारी चीज़ें किशोरियों के ना केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी नकारात्मक तौर पर प्रभावित करती हैं।

डॉ. बिंदा सिंह, मनोचिकित्सक, पटना बताती हैं, “ऑनलाइन डेटिंग एप्स और इंटरनेट की वजह से किसी से मिलना या दोस्ती करना आसान हो गया है। कई बार लड़कियों के साथ प्यार के बहाने भावनात्मक और शारीरिक शोषण होता है। अगर इसके बाद गर्भावस्था हो जाए या गर्भपात करना पड़े, तो किशोरियों को मानसिक अवसाद जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यह किसी के साथ भी हो सकता है।”
आशा कार्यकर्ता और स्वास्थ्य सेवाएं

ग्रामीण भारत में आशा (ASHA) कार्यकर्ता अक्सर किशोरियों को स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने की पहली कड़ी होती हैं। वे परिवारों तक पहुंचकर लड़कियों को मासिक धर्म, गर्भनिरोधक विकल्प और स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी देती हैं। लेकिन सामाजिक झिझक और कभी-कभी परिवारों का विरोध उनके काम को मुश्किल बना देता है।

रिता देवी, आशा कार्यकर्ता, बिहार बताती हैं, “ग्राउंड पर काम के दौरान देखा गया है कि कई जगह 18 साल की उम्र पूरी होते ही लड़कियों की शादी कर दी जाती है। लेकिन उस समय कई लड़कियां मां बनने या जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार नहीं होती हैं। कभी-कभी लड़कों के साथ भी ऐसा होता है कि लोग उन्हें जिम्मेदार बनाने के लिए जल्दी शादी या बच्चे की बात सोचते हैं। ऐसा करने से कई जिंदगियां खतरे में पड़ सकती हैं।”
सामाजिक बदलाव की आवश्यकता
विशेषज्ञों के अनुसार, किशोर गर्भधारण और असुरक्षित गर्भपात को कम करने के लिए सिर्फ डॉक्टर की मदद पर्याप्त नहीं है। इसके लिए समाज और नीतियों में भी बदलाव आवश्यक है। उदाहरण के लिए, बाल विवाह रोकना, लड़कियों को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की सही जानकारी देना और गर्भनिरोधक साधनों तक आसान पहुंच सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष
किशोरावस्था शरीर और मानसिक विकास का अहम समय है, लेकिन जानकारी और संसाधनों की कमी विभिन्न स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा देती है। सही शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच और निर्णय लेने की स्वतंत्रता से किशोरियाँ सुरक्षित रह सकती हैं और अपने भविष्य को बेहतर बना सकती हैं।
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