योग भारत की हजारों साल पुरानी प्राचीन परंपरा है। यह एक ऐसी आध्यात्मिक साधना है, जो शरीर और मन के साथ-साथ इंसान और प्रकृति के बीच संतुलन और तालमेल बनाने पर जोर देती है। आज यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो चुका है। लाखों लोग इसे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर बनाने के लिए करते हैं।
भारत योग की जन्मभूमि है और यहीं से यह अभ्यास पूरी दुनिया तक पहुंचा। साल 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। सरल शब्दों में कहें तो यह एक विशाल पेड़ की तरह है, जिसकी जड़ें भारत में हैं, लेकिन इसकी शाखाएं पूरी दुनिया में फैली हुई हैं।
जड़ों की खोज
योग की जड़ें सिंधु घाटी सभ्यता की मुहरों और पुरातात्विक अवशेषों, वेदों और उपनिषदों जैसे प्राचीन भारतीय ग्रंथों, बौद्ध और जैन परंपराओं तथा महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों में मिलती हैं। यह किसी एक धर्म, विश्वास या समुदाय तक सीमित नहीं है। इसे हमेशा आंतरिक सुख और शांति पाने की एक विधि के रूप में देखा गया है। समय के साथ इसमें कई बदलाव आए और इसकी विभिन्न पारंपरिक पद्धतियां विकसित हुईं। आज के समय में लोग इसको स्वास्थ्य और फिटनेस के लिए एक तरह की थेरेपी या व्यायाम के रूप में समझते हैं। इसका उद्देश्य शरीर और मन के बीच संतुलन बनाना और बेहतर मानसिक शांति व जागरूकता हासिल करना है।
बढ़ता दायरा
शुरुआत में योग भारत के आश्रमों और साधु-संतों तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे यह आम लोगों तक पहुंचने लगा। 20वीं सदी की शुरुआत में पश्चिमी देशों के बुद्धिजीवियों और आध्यात्मिक लोगों में भी इसके प्रति रुचि बढ़ी। इसमें स्वामी विवेकानंद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने यूरोप और अमेरिका की यात्राओं के दौरान पश्चिमी देशों में भारतीय योग और आध्यात्मिक परंपराओं का परिचय कराया।
माना जाता है कि 11 सितंबर 1893 को शिकागो में धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध भाषण से पश्चिमी देशों में भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति रुचि बढ़ी। उन्होंने भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के बारे में बताया और पश्चिमी दुनिया में प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान को पहुंचाने का काम किया।
1896 में स्वामी विवेकानंद ने ‘राज योग’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने पतंजलि के योग सूत्रों की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की। यह पुस्तक काफी लोकप्रिय हुई और पश्चिमी देशों में योग को समझने के तरीके पर इसका प्रभाव पड़ा। उन्होंने इसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी लाभों पर भी जोर दिया, जिससे पश्चिमी देशों में लोगों की इसमें रुचि बढ़ी।
बाद में अन्य भारतीय गुरु, शिक्षक और उनके शिष्य अमेरिका और यूरोप गए, जिससे पश्चिमी देशों में इसका प्रसार और बढ़ा। 1960 के दशक में भारत आने वाले हिप्पी यात्रियों ने भारतीय आश्रमों का रुख किया। इसी दौरान बीटल्स आश्रम के ऋषिकेश स्थित एक योग आश्रम में आने से भारतीय आध्यात्मिकता और इसको दुनियाभर में और अधिक पहचान मिली।
इसके बाद यह पूरी दुनिया में तेजी से लोकप्रिय होता गया। अलग-अलग देशों और संस्कृतियों के लाखों लोग इसे करने लगे। भारत सरकार ने भी योग को देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना और इसे बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए।
भारत में योग पर शोध, शिक्षकों की ट्रेनिंग और इसके प्रचार-प्रसार के लिए 1976 में सेंट्रल योग रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की गई, जो बाद में मोरारजी देसाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ योग बना। इसके अलावा, 1978 में सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन योग एंड नेचुरोपैथी की स्थापना की गई।
योग और दुनिया
भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसको बढ़ावा दिया। 2015 में पहली बार अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया और इसके बाद हर साल भारत सहित दुनिया के कई देशों में यह दिवस के कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे। 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता दी। 21 जून उत्तरी गोलार्ध में साल का सबसे लंबा दिन भी होता है।
पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2015 में पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से लेकर 2018 तक भारत में यह प्रशिक्षण के लिए आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में 37.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
2016 में हार्वर्ड मेडिकल स्कूल ने योगा एलायंस और योगा जर्नल के एक सर्वे का हवाला दिया। इसके अनुसार, अमेरिका में इसे करने वाले लोगों की संख्या चार साल में 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ी। 2012 में यह संख्या 2.04 करोड़ थी, जो 2016 में बढ़कर 3.6 करोड़ से अधिक हो गई।
2016 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में इसे करने वालों में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं थीं। वहीं, इसे करने वाले अमेरिकी पुरुषों की संख्या 2012 में करीब 40 लाख से बढ़कर 2016 में 1 करोड़ हो गई। 50 साल से अधिक उम्र के अमेरिकी लोगों में योग करने वालों की संख्या भी 2012 से 2016 के बीच तीन गुना बढ़कर करीब 1.4 करोड़ हो गई।
इसके बाद की रिपोर्टों में भी योग करने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ने की बात सामने आई। पश्चिमी देशों में योग एक बड़े उद्योग के रूप में भी उभरा। Statista के अनुसार, अमेरिका में पिलाटेस और योग स्टूडियो का बाजार 2020 में 12.82 अरब डॉलर का था। ऐसे स्टूडियो की संख्या 2017 में 32,353 से बढ़कर 2022 में 40,582 हो गई। Allied Market Research के अनुसार, 2019 में दुनियाभर में योग उद्योग का बाजार करीब 37.46 अरब डॉलर का था और 2027 तक इसके 66.23 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान था।
आधुनिक समय का योग
प्राचीन भारत से निकलकर 21वीं सदी में पूरी दुनिया तक योग का पहुंचना कई लोगों के प्रयासों का परिणाम है। इसमें पारंपरिक योग गुरुओं, आधुनिक योग अभ्यास करने वालों और भारत सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज योग भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बन चुका है, जो लोगों को स्वास्थ्य और मानसिक शांति पाने में मदद करता है।
यह अब केवल साधु-संतों और ऋषि-मुनियों तक सीमित नहीं है। यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है और आधुनिक जीवनशैली और जरूरतों के अनुसार खुद को ढाल चुका है। योग न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करता है, बल्कि तनाव और चिंता को कम करके मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक हो सकता है। यह मानसिक और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देता है और मन, शरीर तथा आत्मा के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद करता है। योग कई तरह से किया जा सकता है—कुछ आसन और अभ्यास हल्के और आराम देने वाले होते हैं, जबकि कुछ अधिक कठिन और सक्रिय होते हैं। हर उम्र के लोग अपनी क्षमता, जरूरत और पसंद के अनुसार योग कर सकते हैं। शायद यही वजह है कि आज दुनिया के इतने सारे देशों में योग लोगों के घरों और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
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