स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने (विशेषकर युवाओं द्वारा) से विभिन्न प्रकार की समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। इनमें याददाश्त का कमजोर, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता का प्रभावित और समस्या-समाधान कौशल का खराब होना शामिल है। इसका मुख्य कारण मस्तिष्क द्वारा जानकारी को सक्रिय रूप से संसाधित करने या बनाए रखने के लिए चुनौती न देना; बल्कि इस डेटा के लिए उपकरणों का प्रयोग करना है। इसके अलावा, स्क्रीन के लंबे समय तक संपर्क में रहने से नींद के पैटर्न में बदलाव, तनाव की स्थिति और अन्य शारीरिक तथा सामाजिक गतिविधियों के लिए कम समय होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जो मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली के लिए आवश्यक हैं। हमने इस लेख में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है।
डिजिटल डिमेंशिया मस्तिष्क को कैसे प्रभावित करता है?
डिजिटल डिमेंशिया से तात्पर्य संज्ञात्मक गिरावट (cognitive decline) से है, जो मुख्य रूप से स्मृति, ध्यान और समस्या-समाधान कार्यों के लिए डिजिटल उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता की वजह से हो सकती है। इसका आविष्कार जर्मन न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. मैनफ्रेड स्पिट्जर द्वारा किया गया था, जिन्होंने दिखाया कि कैसे लगातार स्क्रीन के प्रयोग से मस्तिष्क के कार्य प्रभावित हो सकते हैं।

डॉ. सुदेशना मुखर्जी, कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट, शांति माइंडकेयर, नियोटिया मेडिप्लस, और ब्रेन एंड पेन क्लिनिक, सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल बताती हैं, “डिजिटल डिमेंशिया शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से डिजिटल मीडिया के अत्यधिक प्रयोग की वजह से होने वाली संज्ञानात्मक गिरावट का वर्णन करने के लिए किया जाता है। यह समस्या आमतौर पर बच्चों और किशोरों में स्मार्टफोन और डिजिटल तकनीक के अत्यधिक प्रयोग के कारण देखने को मिलती है। इसकी वजह से ध्यान केंद्रित न कर पाने, याददाश्त के कमजोर होने, व्यवहार समस्याओं, चिंता और तनाव में वृद्धि जैसी समस्याएं हो सकती हैं। डिजिटल मीडिया पर अत्यधिक निर्भरता से खराब भाषा विकास और संचार कौशल, खराब कार्यकारी मस्तिष्क कार्यों, कम कनेक्टिविटी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं, जिनका मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली पर गहरा असर पड़ता है।”
डिजिटल डिमेंशिया के लक्षण क्या हैं?

डिजिटल डिमेंशिया से हानिरहित संकेत और लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं, जो संज्ञात्मक कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। डॉ. प्रणवजीत कलदाटे, कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट, संस्थापक, CURAMIND लाइफस्टाइल एंड रेजिलिएंस, पुणे, महाराष्ट्र बताते हैं, “जब हम रिमाइंडर, नेविगेशन और यहां तक कि संचार के लिए उपकरणों पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं, तब हम अपने मस्तिष्क के प्राकृतिक कार्यों को ‘आउटसोर्स’ करने लगते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने (विशेष रूप से प्रतिदिन 7 घंटे से अधिक) से स्मृति प्रतिधारण (memory retention) को कम, ध्यान केंद्रित करने की अवधि को कम और मस्तिष्क की संरचना में परिवर्तन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा लगातार मल्टीटास्किंग-ऐप्स, नोटिफिकेशन और टास्क के बीच स्विच करना-हमारे फोकस को और कम कर सकता है, जिससे काम करना और समस्या-समाधान कठिन हो जाता है।” यहां पर डिजिटल डिमेंशिया के कुछ मुख्य लक्षणों की सूची दी गई है:
किसी भी चीज़ को याद न रख पाना
तिथियों, टेलीफोन नंबर या यहां तक कि लोगों के नाम जैसी महत्वपूर्ण चीजों को याद रखने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का अत्यधिक प्रयोग अपॉइंटमेंट की तिथि या फोन नंबर जैसी मामूली जानकारी को याद न करने का कारण बन सकता है।
ध्यान केंद्रित न कर पाना
कंटेंट के माध्यम से स्क्रॉल करने के लिए स्क्रीन देखने में अधिक समय बिताने से किसी भी कार्य पर ध्यान केंद्रित करने में परेशानी हो सकती है।
समस्याओं के समाधान में कठिनाई
समस्याओं के सामान्य समाधान के कारण कम मानसिक गतिविधि विश्लेषण और सोचने की क्षमता को कम कर सकती है।
भावनात्मक विनियमन का खराब होना
स्क्रीन, विशेष रूप से सोशल मीडिया के अत्यधिक प्रयोग से जलन या चिंता जैसी नकारात्मक भावनाओं का स्तर बढ़ सकता है।
शारीरिक लक्षण
इसकी वजह से सिरदर्द, गर्दन दर्द और आंखों के तनाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं, जिन्हें ‘डिजिटल आई स्ट्रेन’ के रूप में भी जाना जाता है।
सामाजिक अलगाव (Social withdrawal)
मानव संपर्क के बजाय उपकरणों का प्रयोग आमतौर पर सामाजिक कौशल के प्रयोग और विकास को कम कर सकता है। इससे सामाजिक अलगाव की समस्या हो सकती है।
ये लक्षण इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भरता मस्तिष्क के स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है। अत: स्क्रीन समय को सीमित करना, माइंडफुलनेस का अभ्यास करना, शारीरिक गतिविधि करना और पहेलियों या पढ़ने के माध्यम से अपनी याददाश्त को मजबूत करने का प्रयास करना आवश्यक है।
डिजिटल डिमेंशिया से बचाव कैसे किया जा सकता है?
डॉ. मुखर्जी बताती हैं, “डिजिटल डिमेंशिया से बचाव के लिए व्यक्ति को वास्तविक स्क्रीन समय सीमा निर्धारित करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त माता-पिता को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि उनके बच्चे अपने स्मार्टफोन के साथ कितना समय बिताते हैं। बाहरी और शारीरिक गतिविधियों को जीवन शैली में शामिल करना चाहिए। इसके अलावा डिजिटल मीडिया का प्रयोग करते समय भी उचित शारीरिक मुद्रा रखने के साथ-साथ ब्रेक लेना भी लाभकारी हो सकता है।”
डॉ. कलदाटे संज्ञानात्मक गिरावट से बचाव के रूप में इन दो कदमों का पालन करने की सलाह देते हैं:
- तकनीक-मुक्त क्षेत्र (Tech-free Zones): शुरूआत में स्क्रीन का प्रयोग एक घंटा न करने का प्रयास (विशेषकर भोजन के दौरान या सोने से पहले) करना चाहिए ताकि आपके मस्तिष्क को आराम करने और रीसेट करने का समय मिल सके।
- अपने मस्तिष्क को अन्य गतिविधियों पर केद्रिंत करना: स्वाभाविक रूप से ध्यान और स्मृति में सुधार करने के लिए जर्नलिंग, पढ़ने या पहेलियों जैसी गतिविधियों को करने का प्रयास करना चाहिए। इस स्थिति में डिजिटल डिटॉक्स को करना लाभकारी हो सकता है, जिसे डिजिटल लत से बाहर निकलने के एक कारगर तरीके के रूप में देखा जाता है।
इस स्थिति में व्यक्ति माइंडफुलनेस, ध्यान और ग्राउंडिंग तकनीकों का भी अभ्यास कर सकता है। सामाजिक संपर्कों को प्राथमिकता देना, दोस्तों के साथ बाहर जाना और आमने-सामने चर्चा में शामिल होना रिश्ते को मजबूत और भावनात्मक तथा सामाजिक कौशल में सुधार करने में मदद कर सकता है। वर्तमान समय में डिजिटल अत्यंत आवश्यक है लेकिन स्क्रीन समय को प्रबंधित करना हमारे संज्ञानात्मक स्वास्थ्य को बेहतर करने और बर्नआउट से बचने के लिए आवश्यक है।
निष्कर्ष
डिजिटल डिमेंशिया आमतौर पर अत्यधिक स्क्रीन प्रयोग से संबंधित संज्ञानात्मक समस्याओं का उल्लेख करता है। इस स्थिति में हम डिजिटल उपकरणों के प्रयोग की सीमा निर्धारित, ऑफलाइन गतिविधियों को प्रोत्साहित और व्यायाम तथा माइंडफुलनेस जैसी स्वस्थ आदतों को अपनाने से मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर रख सकते हैं। आज के डिजिटल युग में तकनीक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
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