बढ़ती उम्र में कैंसर होना किसी दोहरी मार से कम नहीं है। एक ओर उम्र बढ़ने के साथ आने वाली सामान्य शारीरिक परेशानियाँ होती हैं, वहीं दूसरी ओर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से भी लड़ना पड़ता है। ऐसे में कई वरिष्ठ नागरिकों के मन में यह सवाल उठते हैं कि क्या वे इलाज सहन कर पाएंगे, उनकी जीवन की गुणवत्ता कैसी रहेगी और क्या वे अपनी स्वतंत्रता बनाए रख पाएंगे।
ScienceDirect में प्रकाशित “Prevalence and types of cancer in older Indians: A multicentric observational study across 17 institutions in India” के अनुसार, भारत में कैंसर के एक-तिहाई से अधिक मरीज 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के हैं, जिनमें पुरुषों की संख्या अधिक है। इस आयु वर्ग में सिर और गर्दन का कैंसर, स्तन कैंसर और जनन-मूत्र (Genitourinary) कैंसर सबसे अधिक पाए जाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती उम्र कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम कारक मानी जाती है।

डॉ. नीति रायज़ादा, प्रिंसिपल डायरेक्टर, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पिटल, बैनरघट्टा रोड, बेंगलुरु, बताती हैं “जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर की कोशिकाओं में बदलाव (म्यूटेशन) जमा होते जाते हैं,वैसे-वैसे जिससे कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों में होने वाले कुछ दुर्लभ कैंसरों को छोड़ दें, तो अधिकांश कैंसर अधिक उम्र में ही होते हैं। पश्चिमी देशों में कैंसर सबसे ज़्यादा 50 वर्ष के बाद देखा जाता है। भारत में भी यही स्थिति है, लेकिन यहाँ जो कैंसर पश्चिमी देशों में 65 वर्ष की उम्र में अधिक दिखाई देते हैं, वे अक्सर लगभग 10 साल पहले, यानी 50 वर्ष की उम्र के बाद ही देखने को मिल जाते हैं।”
कैंसर पर जीत: हिम्मत, इलाज और उम्मीद की कहानी
आज के समय में कई बुजुर्ग कैंसर का डटकर सामना कर रहे हैं। आधुनिक इलाज, बेहतर देखभाल और समय पर जांच की वजह से अब कैंसर को केवल जानलेवा बीमारी नहीं माना जाता। कई लोग इसे ऐसी बीमारी मानते हैं, जिसका इलाज संभव है और जिसके साथ सामान्य जीवन जिया जा सकता है। उम्र के साथ मिला अनुभव, धैर्य और मानसिक मजबूती उन्हें इलाज के कठिन दौर से गुजरने में मदद करती है।

2018 में 61 वर्षीय अभिनेत्री और राजनेता नफ़ीसा अली को स्टेज-3 पेरिटोनियल कैंसर (पेट के अंदर की परत में होने वाला एक दुर्लभ कैंसर) का पता चला। पहले उन्हें कीमोथेरेपी दी गई और फिर 2019 में उनकी बड़ी सर्जरी हुई। नफ़ीसा अली ने न सिर्फ कैंसर को हराया, बल्कि महिलाओं में समय पर जांच और कैंसर की जल्दी पहचान के प्रति जागरूकता फैलाने का भी काम किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके कैंसर की सही पहचान नहीं हो पाई थी, लेकिन परिवार के प्यार और सहयोग ने उन्हें इस बीमारी से लड़ने की ताकत दी। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उन्होंने खुद फैसला किया था कि वह इस बीमारी के सामने हार नहीं मानेंगी और पूरी ताकत से लड़ेंगी।
2021 में, 64 वर्ष की उम्र में, नफ़ीसा अली ने सोशल मीडिया पर बताया कि उनका कैंसर बीमारी नियंत्रण में होना (रिमिशन) में है और वह फिर से फिल्मों में काम करने की तैयारी कर रही हैं। इंस्टाग्राम पर उन्होंने लिखा, “कई सालों बाद फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ रही हूं। कैंसर रिमिशन में है और मैं फिर से अभिनय करने के लिए मुंबई जा रही हूं। रचनात्मक दुनिया में लौटने को लेकर मैं बहुत उत्साहित हूं।”
उम्र चाहे कोई भी हो, हौसला सबसे बड़ी ताकत है
ऐसी कहानियाँ याद दिलाती हैं कि उम्र भले ही शरीर की रफ्तार धीमी कर दे, लेकिन इंसान का हौसला और जीने की इच्छा हमेशा मजबूत रह सकती है।

2020 में अभिनेता संजय दत्त को स्टेज-4 नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर का पता चला। उनका इलाज करने वाली डॉ. सेवंती लिमये, सर एच. एन. रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल, ने उनकी सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने कैंसर से लड़ने के दौरान अनुशासन और दृढ़ संकल्प का बेहतरीन उदाहरण पेश किया। संजय दत्त की बहन प्रिया दत्त ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके भाई की नियमित फिटनेस दिनचर्या, अनुशासित जीवनशैली और सकारात्मक सोच ने उनकी रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉ. लिमये ने भी उन्हें अपने सबसे अनुशासित मरीजों में से एक बताया।

दिवंगत अभिनेता इरफ़ान खान को 52 वर्ष की उम्र में न्यूरोएंडोक्राइन कैंसर का पता चला था। वे बताते था कि अगर उन्हें लंबा और स्वस्थ जीवन मिला, तो वह अपनी जिंदगी का दूसरा पड़ाव अपनी पत्नी सुतापा सिकदर को समर्पित करना चाहेंगे। कैंसर के इलाज के दौरान दिए एक इंटरव्यू में इरफ़ान खान ने बताया कि इस कठिन दौर की सबसे खूबसूरत बात यह रही कि उन्हें अपने बच्चों को एक जिम्मेदार और परिपक्व इंसान बनते देखने का मौका मिला। भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं में गिने जाने वाले इरफ़ान खान का 53 वर्ष की उम्र में कैंसर से जुड़ी जटिलताओं के कारण निधन हो गया। इन दोनों कलाकारों की कहानियाँ बताती हैं कि कैंसर से लड़ाई में इलाज के साथ-साथ मानसिक मजबूती, अनुशासन और परिवार का साथ भी बेहद महत्वपूर्ण होता है।
सकारात्मक सोच की ताकत
कई बुजुर्ग कैंसर का पता चलने के बाद घबराने के बजाय स्थिति को स्वीकार करते हैं और इलाज का सही रास्ता चुनते हैं। कुछ लोग आधुनिक (एलोपैथिक) इलाज के साथ समग्र (होलिस्टिक) देखभाल अपनाते हैं, जबकि कुछ केवल एलोपैथिक उपचार पर भरोसा करते हैं। अभिनेत्री नफ़ीसा अली एक इंटरव्यू में बताती हैं कि उनके लिए इलाज बीमारी से भी ज्यादा कठिन था, लेकिन उन्होंने खुद को पूरी तरह भगवान के भरोसे छोड़ दिया। उनके शब्दों में, “मैं किसी से लड़ती नहीं हूं, मेरे लिए भगवान लड़ते हैं।” डॉ. नीति रायज़ादा, प्रिंसिपल डायरेक्टर, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, फोर्टिस हॉस्पिटल, बैनरघट्टा रोड, बेंगलुरु, बताती हैं कि उम्रदराज़ मरीजों में कैंसर का इलाज कई बार मुश्किल हो जाता है क्योंकि उन्हें पहले से ही कई अन्य बीमारियाँ होती हैं। वह बताती हैं, “अक्सर बुजुर्ग कई तरह की दवाइयाँ ले रहे होते हैं। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापा जैसी बीमारियाँ कुछ कैंसर के खतरे को बढ़ाती हैं और इलाज को भी जटिल बना सकती हैं। यदि मरीज की शारीरिक क्षमता कमजोर हो, शुगर नियंत्रित न हो, पहले से नसों की समस्या (न्यूरोपैथी) या हृदय रोग हो, तो कैंसर का इलाज और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।”

डॉ. जयचंद्रन पी.के., कंसल्टेंट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, हेमेटो-ऑन्कोलॉजी, स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन एवं सेलुलर थेरेपी, अपोलो कैंसर सेंटर, चेन्नई, बताते हैं कि इलाज शुरू करने से पहले मरीज की पूरी स्वास्थ्य स्थिति का सावधानी से आकलन किया जाता है। वे आगे बताते हैं, “हम मरीज के सभी अंगों की कार्यक्षमता, एनेस्थीसिया सहन करने की क्षमता और सर्जरी, रेडियोथेरेपी तथा कीमोथेरेपी के लिए अलग-अलग स्कोरिंग सिस्टम के आधार पर मूल्यांकन करते हैं। इसके बाद ही तय किया जाता है कि मरीज कौन-सा इलाज सुरक्षित रूप से सहन कर सकता है। हमारा लक्ष्य केवल कैंसर का इलाज करना नहीं, बल्कि मरीज को बेहतर जीवन गुणवत्ता देना भी होता है।”
अनुभव और नई तकनीक से मिल रही नई उम्मीद
आज कैंसर के इलाज में इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी जैसी आधुनिक तकनीकों ने बुजुर्ग मरीजों के लिए नई उम्मीद जगाई है। इन उपचारों में पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में अक्सर कम या अलग तरह के दुष्प्रभाव होते हैं, जिससे मरीज इलाज के दौरान बेहतर जीवन गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं। संजय दत्त का इलाज करने वाली डॉ. सेवंती लिमये, सर एच. एन. रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल, ने उनके लिए एक विशेष बायोमार्कर को ध्यान में रखते हुए इम्यूनोथेरेपी आधारित उपचार योजना तैयार की थी।
डॉ. जयचंद्रन पी.के. बताते हैं, “इम्यूनोथेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी आमतौर पर पारंपरिक कीमोथेरेपी की तुलना में बेहतर सहन की जाती हैं। हालांकि इनके भी कुछ दुष्प्रभाव हो सकते हैं, लेकिन ये अलग प्रकार के होते हैं और बुजुर्ग मरीजों में अक्सर कम परेशानी पैदा करते हैं। हर कैंसर में ये उपचार संभव नहीं होते हैं। जहां विकल्प उपलब्ध हो, वहां बुजुर्ग मरीजों के लिए इन्हें प्राथमिकता दी जाती है।”
आधुनिक इलाज, समय पर जांच, परिवार का सहयोग और सकारात्मक सोच—ये सभी मिलकर बुजुर्गों को कैंसर से लड़ने की ताकत देते हैं। आज कई वरिष्ठ नागरिक न केवल इलाज पूरा कर रहे हैं, बल्कि अच्छी जीवन गुणवत्ता के साथ अपना जीवन भी जी रहे हैं। यह दिखाता है कि सही उपचार, हौसला और अपनों का साथ हो, तो उम्र कैंसर से जीतने की राह में बाधा नहीं बनती है।
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