फाइलेरिया को लोग आमतौर पर “हाथी पैर” के नाम से जानते हैं। यह ऐसी बीमारी है, जिसमें पैर का वजन शरीर के मुकाबले बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। आइए जानते हैं, जमीनी हालत और लोगों के बीच जागरुकता का स्तर..
भारत में लिम्फेटिक फ्लैरिएसिस (Lymphatic Filariasis) अर्थात हाथी पैर की समस्या बहुत पुरानी है, जिसके निवारण के लिए वर्ष 1955 से ही राष्ट्रीय फाइलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम (NFCP) चलाया जा रहा है। फाइलेरिया भारत में प्रमुख समस्याओं में से एक रही है। यह रोग भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व में दर्ज किया गया था। प्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक सुश्रुत ने अपनी पुस्तक ‘सुश्रुत संहिता‘ में फाइलेरिया का ज़िक्र किया है। यह Roundworm नामक परजीवी द्वारा होता है जो मच्छर, काली मक्खी जैसे कीड़ों के द्वारा फैलता है।
बिहार में फाइलेरिया उन्मुलन के लिए mass drug administration (MDA) कार्यक्रम चलाया जा रहा है। MDA द्वारा हर साल diethylcarbamazine citrate and Albendazole दवा जरुरतमंद लोगों को बांटी जाती है लेकिन साल 2021 में कोरोना काल होने के कारण दवा लोगों तक नहीं पहुंच सकी। इसके कारण संक्रमण फैलता गया।
18 साल में फूलने लगा हाइड्रोसील
मुज्फ्फरपुर जिले में 30 हज़ार से अधिक लोग फाइलेरिया से बीमार हैं लेकिन स्वास्थ्य विभाग के पास केवल 3005 लोगों के फाइलेरिया संक्रमित होने का रिकॉर्ड है। वर्ष 2020 में विभाग के पास केवल 508 लोगों के फाइलेरिया ग्रसित होने का आंकड़ा था, लेकिन साल 2021 आते-आते अस्पताल पहुंचने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी। सरकार ने केयर इंडिया के तकनीकी सहयोग से फाइलेरिया को लेकर जागरुकता अभियान चलाने का निर्णय लिया, जिसके तहत औरंगाबाद, शेखपुर और शिवहर में जागरुकता अभियान चलाया जाएगा।
मड़वन प्रखंड के रहने वाले सुरेश मिश्रा ने बताया कि वे 14 साल के थे, जब उन्हें पहली बार फाइलेरिया का संक्रमण हुआ था। उनके शरीर में संक्रमण की शुरुआत हाथ से हुई थी, वहां लाल रंग का चकत्ता और अक्सर उन्हें तेज बुखार हो जाता। उनकी मां जब तक घरेलू इलाज करती रही, तब तक उनकी तबीयत ठीक हो जाती। 18 वर्ष का होते-होते उनका हाइड्रोसील फूलने लगा और फूलकर इतना बड़ा हो गया कि उठने-बैठने और चलने-फिरने में दिक्कत होने लगी। 30 वर्ष की आयु होने पर हाइड्रोसील के साथ-साथ पैर भी फूलने लगा। हाइड्रोसील का ऑपरेशन तो हो गया लेकिन अब इससे पूरा परिवार संक्रमित है।
पैर का वजन 20 किलो
मड़वन प्रखंड के ही उमेश मिश्रा बीते 10 सालों से “हाथी पैर” के रोग से संक्रमित हैं। उन्होंने बताया कि दर्द इतना ज्यादा है कि चलने-उठने-बैठने में भी परेशानी होती है और अगर गलती से खरोंच लग जाए तो घाव हो जाता है। उस घाव में अगर पानी गिर जाए तो संक्रमण के कारण कीड़े पनपने लगते हैं। एक बार घाव हुआ था, जो दो साल तक ठीक नहीं हुआ। इसकी दवा लेने पर पैर और ज्यादा फूल गया। अब एक पैर का वजन 20 किलो का हो गया है। अमूमन मड़वन प्रखंड स्थित रुपवाड़ा गांव के अधिकांश घरों का हाल ऐसा ही है।
30 सालों से फाइलेरिया से पीड़ित

साहेबगंज के हुस्सेपुर ओझा टोला के निवासी 80 वर्षीय बच्चा ओझा बीते 30 सालों से फाइलेरिया से ग्रसित हैं। उन्हें कालाजार की बीमारी होने के बाद फाइलेरिया का संक्रमण हुआ था। सरकार के तरफ से फाइलेरिया का टीका लगाया गया जा रहा है।
जिला फाइलेरिया पदाधिकारी डॉ. सतीश कुमार ने फाइलेरिया के रोगधाम और वर्तमान स्थिति पर पूछने पर बताया, फाइलेरिया 1-8 चरणों में होती है, जिनमें से 5वें चरण से अधिक वालों को सेल्फ केयर किट दी जाती है। हालांकि हर साल लोगों के बीच दवा वितरण की जाती है लेकिन आंकड़ा बढ़ने का अनुमान लगाया जा सकता है।
जब हमने उन महिलाओं से बात करने की पहल की, जिनके परिवार के पुरुष सदस्य फाइलेरिया से ग्रसित थे तब यह पता चला कि अधिकांश महिलाओं का दर्द एक समान है। मड़वन प्रखंड स्थित रुपवाड़ा गांव की एक महिला के अनुसार, “हम सारी महिलाएं घर का काम करती हैं और बाहर का काम मर्दों का रहता है लेकिन फाइलेरिया होने के कारण अब मेरे पति काम नहीं करते हैं, जिस कारण अब मुझे ही घर-घर जाकर बर्तन मांजने और खाना बनाने का काम करना पड़ता है।” वहीं, कुछ महिलाओं ने बताया कि वे आसपास की फैक्टरी में काम काम करती हैं।
बचाव संबंधी उपाय जरूरी
फाइलेरिया के तीन प्रकार होते हैं- Wuchereria bancrofti, Brugia malayi और Brugia timori। इसमें से 90% संकम्रण Wuchereria bancrofti के कारण होते हैं। आमतौर पर देखा जाए तो फाइलेरिया का संक्रमण मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में ही पाया जाता है, जिसका प्रमुख कारण साफ-सफाई ना रखना है क्योंकि फाइलेरिया का संक्रमण परजीवी क्यूलैक्स फैंटीगंस मादा मच्छर से होता है। अपने आसपास साफ-सफाई बनाए रखने के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाए जाए सकते हैं।
- अपने घरों के आसपास पानी ना जमा होने दें।
- साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें।
- सोने से पहले हाथ-पैर में सरसों या नीम का तेल लगाकर सोएं। मच्छरदानी का प्रयोग करें।
- अगर शरीर में कहीं घाव हुआ हो, तब उसका तुरंत इलाज कराएं एवं उसे खुला ना छोड़ें।
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