आखिर परिवार की महिलाओं पर क्यों है ‘अंगदान’ का भार?

अंगदान महादान माना जाता है पर उस स्थिति में जब व्यक्ति के जीवन की आशा शेष न हो। लेकिन जीवित व्यक्तियों से अंगदान करवाना एक तार्किक विषय हो सकता है, जानिये क्यों ...

अंगदान महादान है लेकिन जिस प्रकार हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। उसी प्रकार अंगदान को लेकर भी समाज में कई तरह के चेहरे देखने को मिलते हैं इसलिए सकारात्मक पक्ष के साथ नकारात्मक पक्ष पर भी गौर करना जरुरी है। 

अंगदान को लेकर बढ़ती भ्रम की स्थिति अनेक बातों की ओर इशारा करती है। जैसे – अंगों का गलत इस्तेमाल, मानव तस्करी, आदि। अंग प्रत्यारोपण विज्ञान का सबसे बड़ा तोहफा है, जिसके जरिए किसी इंसान के जीवन को बचाया जा सकता है। विज्ञान की भाषा में बात करें, तो यह एक ऐसी तकनीक है, जिसकी मदद से लोगों को एक नया जीवन मिल जाता है लेकिन जब भी कोई नई तकनीक समाज में आती है, तब दो चीजें होती हैं। पहला – वह तकनीक समाज के साथ ढ़ल जाती है और दूसरा – तकनीक समाज के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाती है। भारतीय संस्कृति में मरने के पश्चात शरीर के अंगों को किसी प्रकार की क्षति ना पहुंचाने का चलन है इसलिए लोग अंगदान को लेकर कम जागरुक है। हालांकि अब लोग इस ओर कदम बढ़ा रहे हैं मगर अभी भी व्यापक रूप से जागरूकता फ़ैलाने की आवश्यकता है। 

अंगों का होता है कारोबार

आमतौर पर देखा जाए तो कई मरीज अंग प्रत्यारोपण का इंतजार ही करते रह जाते हैं। मानव अंगों की मांग और आपूर्ति में अंतर की वजह से ही भारत में मानव अंगों का एक बाजार विकसित हो गया है। आमतौर पर जिसे अंग की जरूरत है, वह चाहता है कि उसे उसके परिवार का सदस्य या दोस्त से अंगदान मिले, लेकिन अधिकतर मामलों में परिजन अंग देने के लिए तैयार नहीं होते या उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में कोशिश की जाती है कि किसी बाहरी व्यक्ति से पैसे देकर अंग खरीद लिया जाए। खासकर किडनी के मामले में कुछ समय पहले तक यह आम चलन था। इन सभी बातों को देखते हुए केंद्र सरकार ने साल 1994 में मानव अंग प्रत्यारोपण विधेयक लागु किया ताकि अंगों की अवैध तस्करी पर लगाम लगाई जा सके।

महिलाओं पर दान का भार 

वर्ष 1997 में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली द्वारा किये गए एक शोध में यह तथ्य सामने आये कि पारिवारिक स्थिति में अंगदान की जरुरत पड़ने पर सबसे पहले महिलाओं से ही उम्मीद की जाती है कि वे अंगदान करने आगे आएं। आंकड़े के अनुसार 85 प्रतिशत महिलाएं अंगदान करने के लिए आगे आती हैं जबकि केवल 10 प्रतिशत पुरुष अपनी किसी महिला सदस्य के लिए अंगदान करते हैं।

इसके पीछे के कारणों की बात करें, तो सामान्य तौर पर देखा जाता है कि किसी परिवार का कमाऊ सदस्य एक पुरुष ही होता है इसलिए उसकी जान बचाना जरुरी हो जाता है। महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि परिवार की खुशी के लिए वे ही बलिदान दें। भारतीय समाज में बचपन से ही लड़कियों को भाइयों के लिए त्याग का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया जाता है, उन्हें बताया जाता है कि कैसे परिवार में पुरुषों का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है और उन्हें सदैव पुरुषों को सहयोग देना है इसके अलावा शुरु से महिला को त्याग की मूर्ति के तौर पर दिखाया जाता है कि एक महिला अपनी जरुरतों से पहले घरवालों की जरुरते पूरी करती है, अंत में खाना खाती है, और जरुरत पड़ने पर अपने शरीर का भी बलिदान कर देती है, मानो त्याग का दूसरा नाम ही स्त्री हो।   

समाज में भी ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ परिवार की लड़कियों या माँ को अंगदान के लिए कहा जाता है क्योंकि पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों का कोई अस्तित्व नहीं होता है। (नाम और पहचान गुप्त है) एक अत्यंत सभ्य परिवार में जब घर के एकलौते बेटे को किडनी रोग के कारण अंगप्रत्यारोपण की सलाह दी गयी तो पिता ने बेहिचक अपनी अविवाहित बेटी, जो सरकारी विभाग में वैज्ञानिक के पद पर कार्यरत थी, को किडनी दान करने के लिए कहा और वह तैयार भी हो गयी। तत्पश्चात कुछ डॉक्टर मित्रों ने उसे सलाह दी कि उसके सामने अभी पूरी जिंदगी है, विवाह करना है, बच्चे पैदा करने है इसलिए वह एक बार फिर इस पर विचार करे और पूछा कि क्या पुरे परिवार में वो ही एक उपयुक्त इंसान है अंगदान के लिए, उसके भाई की पत्नी या उसके पिता जो पूर्णतया स्वस्थ हैं वो क्यों नहीं अंगदान करते। लड़की का तर्क था कि भाभी को बच्चे सँभालने हैं व पिता को भाई का स्वास्थय इसलिए वे अंगदान नहीं कर सकते। अंततः वह लड़की पीछे हट गई और उसके पिता ने किडनी दान दिया। और उस लड़की ने पिता व भाई दोनों के स्वास्थ्य की देखभाल व परिवार की जिम्मेदारी का उचित निर्वहन किया। इसके बावजूद लड़की अपने परिवार व समाज दोनों की नजर में स्वार्थी मानी गयी क्योंकि उसने किडनी नहीं दी। 

जानें विशेषज्ञों की राय 

दधीचि देहदान समिति पटना से अमृता भूषण कहती हैं कि अंगदान करने का निश्चय किसी इंसान का व्यक्तिगत निर्णय होता है। किसी से जोर जबरदस्ती अंगदान कराना या गैर-कानूनी तरीके से अंगों का उपयोग करना भी गलत है। इसके लिए सरकार भी कड़ाई से कार्य कर रही है ताकि अंगदान को लेकर समाज में सकारात्मक रवैया बना रहे।  

डॉक्टर रवि रंजन एम.एस (ऑर्थो) रांची बताते हैं कि अंगदान करना गलत नहीं है बल्कि किसी की जान बचाने के लिए किया गया प्रयास वाकई सराहनीय है लेकिन इससे जुड़ें कुछ तथ्य और मिथक हैं, जिसके बारे में जानना जरुरी है।

  • न्यूनतम हीमोग्लोबिन 11 g/dl  होना चाहिए। 
  • आयु 18 वर्ष से 65 वर्ष के बीच होनी चाहिए।
  • रक्तदान करने से पहले उपवास पर ना हो। 
  • रक्तदान करने से पहले आयरन से भरपूर भोजन करना चाहिए। 
  • अपनी मेडिकल हिस्ट्री की जानकारी निःसंकोच होकर डॉक्टर को बतानी चाहिए।
  • अपनी स्वेच्छा से रक्तदान या अंगदान करना चाहिए। इसमें किसी प्रकार की जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए।

अंगदान को महादान कहा जाता है लेकिन महान बनने की होड़ में केवल महिलाओं को आगे रखना गलत है। समाज की इस जटिल समस्या का निदान करना भी जरुरी है। जांच समिति हर उस शख्स से बात करे और ध्यान रखे कि महिला को बहला फुसलाकर या दबाव डालकर तो अंगदान नहीं कराया जा रहा है। साथ ही अगर कोई व्यक्ति शादी के बाद पत्नी की किडनी ले और बाद में उस महिला को तलाक दे दें, तो भी ऐसा प्रावधान हो कि महिला का भरण-पोषण अंग लेने वाले के परिवार की जिम्मेदारी हो।

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