स्तन कैंसर के प्रति बदलनी होगी महिलाओं की सोच

स्तन केवल शरीर का एक अंग हो सकते हैं लेकिन किसी महिला की पहचान नहीं बन सकते इसलिए केवल स्तनों के ना रहने पर महिलाओं के अस्तित्व को नकारना कहीं से भी तार्किक नहीं है।

बिहार के ग्रामीण इलाके में रहने वाली संगम (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि उनके गांव में रहने वाली एक महिला को स्तन कैंसर के कारण अपने स्तन हटवाने पड़े थे। स्तनों के हटने के बाद उसके पति और ससुराल वालों ने उसके साथ सम्बन्ध ख़त्म कर दिए क्योंकि लोगों की नज़र में अब वह एक पूर्ण महिला नहीं थी। यह एक विडम्बना ही है कि जीवन के उतर चढाव में साथ देने का वचन लेने के बाद पति भी ऐसी स्तिथि में साथ नहीं देता जब पत्नी एक विपरीत मानसिक और शारीरिक तकलीफ से गुजर रही होती है।

वहीं अन्य महिलाओं ने बताया कि उन्होंने स्तन कैंसर के बारे में सुना है कि इसमें स्तनों को हटवाना पड़ता है, जिसके बाद पति समेत सारे घर वाले कन्नी काट लेते हैं फिर धीरे-धीरे महिला की ज़िंदगी बद्तर हो जाती है। अमूमन सारी महिलाओं का यही मानना था कि स्तन कैंसर में स्तनों को हटवाना पड़ता है, जिसके बाद वे एक महिला नहीं रह जातीं। कुछ महिलाओं का मानना था कि स्तन कैंसर के इलाज के लिए बहुत पैसों की आवश्यकता होती है और इतने पैसों में तो परिवार के कई काम निपट जाएंगे तो फिर इतने पैसे देकर इलाज क्यों करवाना? 

महिलाओं में है जागरुकता का अभाव 

पारस अस्पताल, पटना, के सीनियर कंसल्टेंट एवं कैंसर स्पेशलिस्ट डॉ. अभिषेक आनंद बताते हैं कि ग्रामीण महिलाओं में जागरूकता का अभाव बहुत ज्यादा है, जिस कारण उनमें स्तन कैंसर का स्तर अंतिम चरण तक पहुंच जाता है। साथ ही कैंसर के इलाज के लिए आने वाले रोगियों में ग्रामीण महिलाओं की संख्या अत्यंत कम है। प्रतिदिन अगर 10 महिला भी जांच के लिए आतीं हैं, तो उसमें से केवल 2 महिलाएं ही ग्रामीण इलाके से होती हैं।  ग्रामीण महिलाओं के पास स्तनों के शुरुआती जांच की जानकारी भी नहीं होती है। एक महिला ने बताया कि, उसकी ननद के कांख के आसपास गांठों का बनना शुरू हुआ था, जिसे पहले सबने नजरअंदाज कर दिया। धीरे-धीरे गांठ बढ़ने लग गए और उसके स्तन कठोर हो गए और उनसे खून आने लगा मगर किसी ने ध्यान नहीं दिया और लापरवाही के कारण ही आज उसकी ननद उसके साथ नहीं है।

आवश्यक है स्तन कैंसर के लक्षणों की जानकारी

महिलाओं में स्तन जांच को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर कोई पराया उनके अंगों को हाथ लगाकर देखेगा तब वे बदनाम हो जाएंगी इसलिए जांच के लिए उन्हें किसी के पास जाने में असहजता महसूस होती है। करीब 90 प्रतिशत महिलाओं को स्वयं स्तनों की जांच करनी नहीं आती है, जिस कारण उन्हें ज्यादा परेशानी उठानी पड़ जाती है। ग्रामीण महिलाओं द्वारा स्तनों की जांच नहीं करवाने का एक बड़ा कारण गांठों में दर्द का नहीं होना भी है, क्योंकि शुरुआती लक्षणों में गांठों का बनना शुरू होता है, जिसके दर्द रहित होने के कारण महिलाएं गांठों को सामान्य लक्षणों के तौर पर लेती हैं। धीरे-धीरे इन गांठों का फैलाव शुरू होता है, जिससे यह ट्यूमर बन जाता है। अगर ट्यूमर को शुरुआती दौर में ही हटा दिया जाए, तो कैंसर को रोका जा सकता है। साथ ही निप्पल से असामान्य स्त्राव होना या निप्पल के रंग में बदलाव आना, स्तन के आकार आदि में अचानक बदलाव आना भी स्तन कैंसर के शुरुआती लक्षणों मे से एक हैं। 

साथ ही स्तनों को केवल तब हटाया जाता है, जब कैंसर अंतिम स्टेज में होता है। अब ऐसे तकनीक आ गए हैं, जिनसे कैंसर के इलाज को आसान बनाया गया है। टार्गेटेड थेरेपी, हार्मोनल थेरेपी और इम्युनो थेरेपी में नयी-नयी दवाइयां उपलब्ध हैं, जिससे कैंसर के इलाज को अब कष्ट रहित रुप दिया गया है।

बचाव के तरीकों पर दें ध्यान 

इसके अलावा कुछ बचाव के भी तरीके हैं, जिससे स्तन कैंसर से बचा जा सकता है। जैसे – उम्र के 40-45वें साल में प्रवेश करते ही नियमित तौर पर मैमोग्राफी करवाना, सही समय पर बच्चों का होना, स्तनपान कराना, वजन पर नियंत्रण रखना, शराब या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन ना करना, शारीरिक क्रियाओं पर ध्यान देना, बाहरी तौर पर हार्मोन का सेवन ना करना, आदि।  वहीं शरीर की कोशिकाओं में BRCA म्युटेशन होने पर कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए नियमित तौर पर स्वयं ब्रेस्ट की जांच करते रहना ज़रुरी है क्योंकि इससे ही कोशिकाओं में हुए बदलावों पर नज़र रखी जा सकता है।

बढ़ सकते हैं स्तन कैंसर के मामले

महिलाओं में होने वाले कैंसर में सबसे आम स्तन कैंसर है, जो अन्य कैंसर की अपेक्षा में 14 प्रतिशत ज्यादा है। उम्र के 30वें से लेकर 50वें पड़ाव तक महिलाओं में स्तन कैंसर होने की आशंका ज्यादा होती है और 50वें से लेकर 64वें उम्र तक आते-आते ये खतरा बढ़ जाता है। 28 भारतीय महिलाओं में से 1 महिला को स्तन कैंसर होने का खतरा होता है। Globocan 2018 के आंकड़ों के अनुसार 1,62,468 नये केस दर्ज हुए हैं, जो स्तन कैंसर से संबंधित हैं। वहीं 87,090 महिलाओं की मृत्यु स्तन कैंसर के कारण हो गई है।  

ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित तौर पर स्वास्थ्यकर्मियों द्वारा स्वयं स्तन की जांच करने के बारे में स्त्रियों में जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है। इसके अलावा छोटे-छोटे नुक्कड़ नाटकों या अन्य तरीकों से भी महिलाओं समेत परिवार के हर एक सदस्य को स्तन कैंसर से जुड़ी जानकारियां देना आवश्यक है ताकि एक बेहतर समाज का निर्माण किया जा सके। साथ ही परिवार वालों द्वारा भी मानसिक तौर पर सहयोग मिलने से महिलाओं का आत्मबल मजबूत होता है, जिससे वे बीमारी से आसानी से लड़ भी सकती हैं। महिलाओं को केवल ये एहसास दिलाना कि स्तनों के होने से ही महिलाओं का अस्तित्व है, ऐसी धारणाओं को एक अच्छा जीवनसाथी ही खत्म कर सकता है।

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