मेलाटोनिन सप्लीमेंट की चमकदार दुनिया

आजकल लोग विज्ञापनों की चकाचौंध में अपने बच्चों को बाजार एवं ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल से खरीद कर ऐसी गमीज, कैंडी, जेली, लॉलीपॉप खिला रहे हैं जिसमेंं मेलाटोनिन सप्लीमेंट भरा होता है। अधिकांश लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते हैं कि यह उनके लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है

बाज़ारों में मेलाटोनिन सप्लीमेंट वाले उत्पाद भरे हुए हैं और अभिभावक एक-दूसरे की देखादेखी इंटरनेट पर उपलब्ध ऐसी कैंडीज को अपने बच्चों की खुराक बनाते जा रहे हैं। लोग खुश हो रहे हैं कि मेलाटोनिन सप्लीमेंट वाली चीजें खाकर उनके बच्चे न केवल खुश रहते हैं बल्कि रात भर सुकून भरी नींद भी लेते हैं। उन्हें नहीं पता कि यह सप्लीमेंट देकर वे अपने बच्चों को परेशानियों वाली जिंदगी की ओर धकेल रहे हैं।

मेलाटोनिन क्या होता है?

मेलाटोनिन एक हार्मोन है, जिसका निर्माण हमारा शरीर अपने आप करता है। यही हार्मोन तय करता है कि हम कब सोएंगे और कब जागेंगे? किसी कारणवश जब मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर गड़बड़ा जाए और हमारी आंखों से नींद दूर होने लगे तो डॉक्टर की सलाह पर एक निश्चित मात्रा और सीमित अवधि के लिए मेलाटोनिन सप्लीमेंट लिया जा सकता है मगर जिस तरह बच्चों को यह सप्लीमेंट चॉकलेट, आंवला या हाजमोला कैंडी की तरह दिया जा रहा है, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता। डॉक्टरों के अनुसार मेलाटोनिन सप्लीमेंट से कई प्रकार के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। लंबे समय तक मेलाटोनिन लेने और ज्यादा मात्रा लेने से पेट में मरोड़ें उठने, सिर में भारीपन, हमेशा सुस्ती सी बनी रहने, ब्लड प्रेशर घटने, डिप्रेशन, बार-बार यूरिन आने, चक्कर जैसी समस्याएं आ सकती हैं। ये समस्याएं बड़ों से लेकर बच्चों तक सबमें आ सकती हैं। बड़ों के बजाय बच्चों को इस तरह की समस्याओं का ज्यादा सामना करना पड़ सकता है। 

जिस प्रकार विभिन्न कंपनियां मेलाटोनिन सप्लीमेंट को कई तरह के फ्लेवर और आकर्षक पैक मेंं बेच रही हैं, उनसे प्रभावित हो कर जहां वयस्क इसे ले रहे हैं, वहीं अपने बच्चों को भी खिला रहे हैं। इससे बच्चों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां पैदा होने की आशंका है। विभिन्न शॉपिंग वेबसाइट्स पर इसे दस एमजी मात्रा की गमीज, जेली आदि के रूप मेंं बेचा जा रहा है। यह विभिन्न फ्लेवर में आ रही हैं। कुछ कंपनियों ने अपनी जेली मेंं केल्शियम और विटामिन भी डाल दिए हैं, जो उनके लुभावने प्रचार में और रंग भर रहे हैं। शॉपिंग वेबसाइट्स पर इसके विज्ञापन देखें तो उनमेंं मेलाटोनिन को ‘बेहतर नींद के लिए नेचुरल एवं सेफ स्लीप सपोर्ट’ बताया जा रहा है। विज्ञापनों मेंं दावा किया जा रहा है कि इसकी आदत नहीं पड़ती। यह बेहतर नींद लाकर तरोताजा उठने मेंं मदद करता है। गहरी और आरामदायक प्राकृतिक नींद लाने के लिए यह उत्पाद उसी तरह काम करता है, जैसे शरीर में बनने वाला हार्मोन करता है।

मेलाटोनिन बताता है सोने-जागने का समय

मेलाटोनिन हार्मोन का स्राव हमारे मस्तिष्क में पीनियल ग्रंथि से होता है। यह छोटी सी ऐसी संरचना होती है, जो हमारे मस्तिष्क की गहराई में पाई जाती है। इस ग्रंथि से मेलाटोनिन का स्राव शाम को उस समय होने लगता है, जब हमारे सोने का समय हो रहा होता है। जैसे-जैसे वातावरण अंधेरे की चादर से ढकना शुरू होता है, पीनियल ग्रंथि से मेलाटोनिन का स्राव अधिक होता चला जाता है। इससे हमारी नींद और गहरी होती चली जाती है। अर्धरात्रि को मेलाटोनिन का स्राव सर्वाधिक होता है और इसी वजह से यह समय सर्वाधिक गहरी नींद वाला होता है। लेकिन जैसे-जैसे सुबह का समय होता है, इसका स्राव कम होने लगता है। सूर्योदय से पहले ही इस हार्मोन का असर बंद हो जाता है। यानी कुदरती तौर पर हमें बिस्तर छोडऩे का इशारा मिल जाता है।  मेलाटोनिन हार्मोन हमारी जैविक घड़ी को संचालित करता है और हमारे सोने और जागने के समय को बताता है।

हो सकते हैं कई साइड इफेक्ट्स

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हनुमानगढ़ के सीनियर कंसलटेंट फिजिशियन डॉ. पारस जैन बताते हैं, ”जिन दवाओं मेंं मेलाटोनिन होता है, उन्हें डॉक्टर की अनुशंसा के बिना नहीं बेचा जा सकता है। यह दवाएं उन मरीजों को दी जाती हैं, जिन्हें अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, टेंशन, डिप्रेशन, बेचैनी, जी मिचलाना, घबराहट जैसे लक्षण होते हैं। ऐसी दवाओं का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के बिना करना गलत है और यह घातक हो सकता है। मेलाटोनिन बेसड दवाएं डॉक्टर के अनुसार ही लेनी चाहिए।”

डॉ. जैन बताते हैं कि ”बच्चों को किसी भी तरह की दवा देते समय अत्यधिक सजगता बरतने की जरूरत होती है। मेलाटोनिन को सामान्य चॉकलेट, टॉफी की तरह खिलाना बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है। भले ही मेलाटोनिन के एकदम से साइड इफेक्ट नहीं होते लेकिन होते जरूर हैं। अगर लंबे समय तक बच्चों को मेलाटोनिन दिया जाएगा तो इसका नुकसान होना तय है। लंबे समय तक मेलाटोनिन लेने से धीरे-धीरे शरीर में यह हार्मोन कुदरती तौर पर बनना ही बंद हो सकता है। ऐसा होने पर ताउम्र बाहर से मेलाटोनिन सप्लीमेंट लेने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। इसके कितने साइड इफेक्ट्स होंगे, इसे सहज ही समझा जा सकता है। मेलाटोनिन दवाओं पर भी असर डालता है। विभिन्न दवाइयां अगर मेलाटोनिन के साथ ली जाएं तो यह परस्पर क्रिया कर सकती हैं। इसके साथ यदि हम नींद की गोली लेते हैं तो उसका प्रभाव ज्यादा हो सकता है और इसके साथ लिए गए एंटीबायोटिक्स का असर कम हो सकता है।”

डॉ. पारस जैन कहते हैं कि केवल विज्ञापनों पर नहीं जाना चाहिए। सबसे पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए क्योंकि डॉक्टर ही बेहतर बता सकते हैं कि आपकी हेल्थ प्रॉब्लम क्या है और मेलाटोनिन लेना आपके या आपके बच्चे के लिए उचित है अथवा अनुचित। मनमर्जी से किसी भी तरह की दवा नहीं लेनी चाहिए। भले ही उसे फूड सप्लीमेंट के नाम पर ही क्यों न बेचा जा रहा हो।   

डॉक्टर की सलाह है महत्वपूर्ण

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श्रीगंगानगर के जन सेवा हॉस्पिटल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. इन्द्रदीप सिंह कोचर कहते हैं कि ”मेलाटोनिन हार्मोन हमारी सोने और जागने के चक्र को नियंत्रित करता है। हमारा शरीर इसे खुद बनाता है, इसलिए बाहर से दिए जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। मेलाटोनिन बेसड दवाओं की जरूरत केवल उन बच्चों को पड़ती है, जो सेरेबल पाल्सी, डाउन सिंड्रोम, मेनिनजाइटिस आदि न्यूरोलॉजिकल डिजीज से पीडि़त होते हैं और जिन्हें नींद आने में परेशानी होती है। हर बच्चे को यह नहीं दिया जाता। बच्चे तो दूर, बड़ों को भी डॉक्टर की सलाह बिना कोई भी हार्मोन इस तरह नहीं लेना चाहिए।”

कोचर कहते हैं कि ”बच्चों में अत्यधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता होती है, जिसके बूते उनका शरीर स्वस्थ रहता है। बच्चों में अनिद्रा जैसी स्थिति आम तौर पर पैदा ही नहीं होती। यदि अपवाद स्वरूप हो भी जाए तो डॉक्टर की सलाह लेकर ही दवा दी जानी चाहिए क्योंकि डॉक्टर ही तय करेगा, उसे कौनसी दवा और कितनी मात्रा में दी जानी है। जरूरत पडऩे पर एक साल तक के बच्चों को एक एमजी, दो से चार साल के बच्चों को ढाई एमजी तथा चार साल से ऊपर के बच्चों को पांच एमजी मात्रा दी जानी चाहिए।”

हर किसी को नहीं दिए जा सकते हार्मोन्स

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टांटिया यूनिवर्सिटी श्रीगंगानगर के बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट के मैम्बर एवं न्यूरो साइकियाट्रिस्ट डॉ. विशु टांटिया कहते हैं, ”आर्टिफिशियल हार्मोन सप्लीमेंट उन्हीं मरीजों को दिए जाते हैं, जिनका शरीर संबंधित हार्मोन्स को बनाना बंद कर देता है या कम बनाता है। जैसे, डायबिटिज रोगियों को इंसुलिन देना पड़ता है। जिन हार्मोन्स को हमारा शरीर बना रहा है, उन्हें बाहर से लेना कई तरह की समस्याओं को जन्म दे सकता है। इसके साइड इफेक्ट्स होंगे। मेलाटोनिन के मामले में भी ऐसा है।”

डॉ. टांटिया कहते हैं कि किसी भी तरह के हार्मोन्स को इस तरह इस्तेमाल करना घातक है। अगर किसी कारण नींद नहीं आ रही है तो डॉक्टर की सलाह से नींद की गोलियां लेनी चाहिए। जब स्थिति सामान्य हो जाए तो गोली लेना बंद कर देना चाहिए।

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