कोरोना के कारण कैसे बच्चे हुए असमय किशोरावस्था के शिकार

जब तक कोरोना को लेकर मार्च 2020 में लॉक डाउन की घोषणा हुई, तब तक आठ वर्षीय अमारा पुरोहित दिल्ली के एक स्कूल में कक्षा 3 में पढ़ने वाली एक खुशमिजाज बच्ची थी। कोरोना को लेकर मार्च 2020 में लॉकडाउन लगने और घर के अंदर रहने के कारण उसकी शारीरिक गतिविधियां कम हो गई और इसका असर अमारा के शरीर पर पड़ने लगा। उसका वजन बढ़ने लगा लेकिन वह लंबी नहीं हुई। उसके शारीरिक बदलाव भी स्पष्ट थे।

अमारा की मां अंशुल पुरोहित को इन बदलावों ने चिंतित कर दिया और लॉकडाउन खत्म होते ही वे बाल रोग विशेषज्ञ के पास गई लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी इसलिए डॉ. ने अमारा को एक एंडोक्राइनोलॉजिस्ट के पास रेफर कर दिया। वहां डॉ. ने कुछ टेस्ट करवाए। जैसे – अलट्रासोनोग्राफी, ब्लड टेस्ट और एक्स-रे ताकि शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलावों की जांच की जा सके। अमारा के रिपोर्ट्स बेहद चौंकाने वाले थे क्योंकि वे सामान्य नहीं थे और रिपोर्ट आने के कुछ ही दिनों बाद अमारा का पहला पीरियड्स भी आ गया। मेडिकल की भाषा में इसे precocious puberty कहा जाता है। अर्थात समय से पहले बच्चों का किशोरावस्था में प्रवेश कर जाना। इस समय लड़कियां इन सब बदलावों को सहन करने की स्थिति में नहीं होती, जिस कारण उन्हें अनेक मानसिक व शारीरिक परेशानियां भी उठानी पड़ती है। अंशुल पुरोहित ने बताया, “यह जानकारी एक माँ के रूप में मेरे लिए भयानक थी।”

बच्चों में बढ़ रहे मामले 

अमारा की पीडियाट्रिक एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ. वैशाखी रुस्तगी कहती हैं, “जून 2020 के बाद से लड़कियों में असमय किशोरावस्था के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। शहरी क्षेत्रों से ताल्लुक रखने वाली लड़कियों में ये ज्यादा देखने को मिला है। मैंने पिछले साल प्रति सप्ताह असमय किशोरावस्था के लगभग 7 से 8 मामले देखे, जो बढ़कर प्रति दिन लगभग दो से तीन मामले हो गए हैं। इस केस की मेरे पास आने वाली 40% लड़कियां 8-9 वर्ष के आयु वर्ग में थीं। मेरे क्लिनिक के डेटाबेस में ऐसे करीब 150 मामले हैं।”

मुंबई के भाटिया अस्पताल के एंडोक्रिनोलॉजिस्ट डॉ जुगल गाडा कहते हैं कि अधिकांश आबादी में किशोरावस्था की औसत आयु लड़कियों में लगभग 10.5 वर्ष और लड़कों में लगभग 11.5 वर्ष है। डॉ गाडा कहते हैं, “आमतौर पर early puberty को लड़कियों मेंआठ साल से पहले और लड़कों में नौ साल से पहले माना जाता है।”

नवंबर 2020 में इटैलियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक मेडिसिन में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि COVID-19 महामारी के दौरान और बाद में लड़कियों में असामयिक किशोरावस्था की बढ़ती घटनाओं का अध्ययन किया गया है। अध्ययन का उद्देश्य असमय किशोरावस्था की आवृत्ति और लॉकडाउन के दौरान और बाद में लड़कियों में यौवन की प्रगति की दर का मूल्यांकन करना था। परिणामों की तुलना पिछले पांच वर्षों में इसी अवधि के आंकड़ों से की गई थी। अध्ययन ने लॉकडाउन की स्थिति और लोगों में हुए बदलावों पर गौर किया है। इसने नव निदान केंद्रीय असामयिक किशोरावस्था (सीपीपी) की बढ़ी हुई घटनाओं और पिछले वर्ष की तुलना में लॉकडाउन के दौरान और बाद में पिछले निदान वाले रोगियों में किशोरावस्था की प्रगति की तेज दर को दिखाया गया। अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि बदलती जीवन शैली, बढ़ती जंक फ़ूड की प्रवृत्ति, शारीरिक क्रियाकलापों का अभाव और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग जैसे कारक, जो लॉकडाउन के दौरान बढ़ गए थे, असमय किशोरावस्था के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार समझे गए। 

भारतीय संदर्भ में नहीं है अध्ययन

हालांकि भारतीय संदर्भ में अभी तक कोई अध्ययन नहीं हुआ है लेकिन यह स्पष्ट है कि भारत में भी असमय किशोरावस्था के मामले देखे गए हैं, जिसका परिवार की मेडिकल हिस्ट्री के अनुसार मूल्यांकन किया जा सकता है। अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉ श्वेता बुदयाल, सीनियर कंसल्टेंट, एंडोक्रिनोलॉजिस्ट और डायबेटोलॉजिस्ट, फोर्टिस हॉस्पिटल, मुलुंड, कहती हैं, “6 से 8 साल की उम्र में लड़कियों में समय से पहले काफी आश्चर्यजनक तरीकों से किशोरावस्था की स्थिति अचानक बढ़ गई है। लॉकडाउन के दौरान परामर्श के लिए आने वाली सभी लड़कियों में से 50% में मासिक धर्म चक्र की शुरुआत थी, जिसे किशोरावस्था का अंतिम चरण माना जाता है। लॉकडाउन के समय ऐसे केसों की संख्या में काफी इजाफा भी हुआ है।”

रैना अदलखा कहती हैं, जब मैं अपनी 7 साल की बेटी के पेट दर्द की शिकायत को लेकर बाल रोग विशेषज्ञ के पास गईं, तब डॉ. मेरी बेटी के असमय विकास को देखकर चौंक गए। उन्होंने तुरंत कुछ टेस्ट लिखें और मुझे पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजिस्ट के पास रेफर कर दिया। रिपोर्ट से पता चला कि उसकी हड्डियों का विकास किसी 10 साल के बच्चे के बराबर है और बाकी रिपोर्ट्स भी इसी तरह के थे। ये उसके किशोरावस्था की तरफ बढ़ने के संकेत थे लेकिन अभी हमारे पास कुछ समय बचा हुआ था।

शायद इसलिए कहा जाता है कि अगर माता-पिता अपने बच्चे के शरीर में हो रहे परिवर्तनों को गंभीरता से देखते हैं, तो आवश्यकता पड़ने पर इससे उन्हें बेहतर तरीके से निपटने में मदद मिलती है। वहीं कुछ मामलों में असमय किशोरावस्था को भी नियंत्रित किया जा सकता है।

किशोरावस्था के कारक जानना जरूरी

डॉ. गाडा कहती हैं, किशोरावस्था कई कारकों पर निर्भर करता है। जैसे – शरीर में वसा का बढ़ जाना, पारिवारिक इतिहास, खानपान और सोशल फैक्टर। लड़कियों में किशोरावस्था की ओर बढ़ने का सबसे पहला संकेत स्तन (Thelarche) का विकास होना है, कुछ लड़कियों में पहले प्यूबिक हेयर डेवलपमेंट (प्राइवेट हिस्सों मे बाल) (Pubarche) होता है।

कुछ इसी प्रकार एक अन्य मां अमिता वर्मा भी अचानक अपनी बेटी के विकास को देखकर चौंक गईं, जब उनकी आठ साल की दुबली-पतली बच्ची के शरीर में अचानक बदलाव आने लगे। अमिता बताती हैं, “अपनी बेटी के शरीर में हो रहे बदलावों पर गौर करते हुए मैं तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ के पास उसे लेकर गई। मैंने डॉक्टर को उसके अंडरआर्म्स के बाल दिखाए,जहां डॉक्टर ने बताया कि ये असमय किशोरावस्था का मामला है। मैंने इसके बारे में पहले नहीं सुना था। उन्होंने मुझे जल्द से जल्द एक एंडोक्रिनोलॉजिस्ट से मिलने के लिए कहा और मुझे खुशी है कि मैंने ऐसा ही किया।”

डॉ. रस्तोगी कहते हैं, “बच्चों में किशोरावस्था के लक्षणों को पहचानना काफी आसान है क्योंकि इस समय शरीर में होने वाले बदलाव आसानी से देखे जा सकते हैं। लड़कियां सामान्य तौर पर 8 साल की उम्र और लड़के 10 साल की उम्र में किशोरावस्था को प्राप्त होते हैं। ये बदलाव हम दैनिक कार्यों को करते हुए भी महसूस कर सकते हैं। जैसे – बच्चों के  जूतों या कपड़ों का छोटा होना, दूध के दांतों का टूट जाना, आदि क्योंकि ये शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलावों को दर्शाते हैं। साथ ही बच्चों की भूख भी बढ़ जाती है, जिसे हम किशोरावस्था की ओर बढ़ते कदमों की तरह देख सकते हैं।”

माता-पिता की है अहम भूमिका

ऐसे बच्चों का आंकलन करने में पहला कदम उनके स्वास्थ्य इतिहास को अच्छी तरह से देखना है ताकि डॉक्टर को घटनाओं के कालक्रम और समय सीमा को समझने में मदद मिल सके। डॉ बुदयाल ने कहा, “एक सावधानीपूर्वक शारीरिक परीक्षण किशोरावस्था को समझने में सहायता करती है। साथ ही बच्चों के मानसिक विकास का अध्ययन करना भी काफी मददगार साबित होता है। कुछ टेस्ट भी किए जा सकते हैं। जैसे – हार्मोनल टेस्ट, हड्डियों की जांच, पेल्विक सोनोग्राफी आदि। वहीं कुछ लड़कियों में असमय किशोरावस्था का पता लगाने के लिए मस्तिष्क की एमआरआई की आवश्यकता होती है।” 

डॉ गाडा कहते हैं, “एक बार जब ये परिणाम सामने आ जाते हैं, तो डॉक्टर आमतौर पर माता-पिता और बच्चे की मानसिक और भावनात्मक स्थिति का आंकलन करते हैं ताकि कोई अन्य उपाय ना मिल पाने पर इलाज का फैसला किया जा सके। “सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मासिक धर्म शुरू होने के बाद ऊंचाई में बहुत अधिक वृद्धि नहीं होती है, जो हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण चिंता का विषय बन जाता है इसलिए इन संकेतों पर ध्यान देना बहुत महत्वपूर्ण है। यहां माता-पिता की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। मासिक धर्म आमतौर पर किशोरावस्था में प्रवेश करने के बाद 12 से 18 महीनों के भीतर शुरू होता है। हालांकि लॉकडाउन के बाद मैंने देखा कि लड़कियों में मासिक धर्म किशोरावस्था में प्रवेश करने के मात्र 8 से 9 महीने में ही हो गया है,” डॉ रुस्तगी बताती हैं।

क्या है डॉक्टरों का विचार?

डॉ गाडा का कहना है कि किशोरावस्था की शुरुआत तब होती है, जब मस्तिष्क में गोनेडोटरोपिन-रिलीजिंग हार्मोन (जीएनआरएच) का उत्पादन शुरू होता है। बनने के बाद ये हार्मोन पिट्यूटरी नामक एक छोटी बीन के आकार की ग्रंथि तक पहुंचता है और सेक्स हार्मोन के उत्पादन को ट्रिगर करता है। महिलाओं में यह एस्ट्रोजन बनाता है और पुरुषों में टेस्टोस्टिरोन।

डॉ. रुस्तगी बताते हैं, कभी-कभी असमय किशोरावस्था होने का कोई कारण तक पता नहीं चलता है। कुछ बच्चों में बाहरी तौर पर सेक्स हार्मोन लेने (सब्जियों या अन्य खाद्य पदार्थों) के द्वारा या शरीर के अंदर निर्माण होने के कारण और कुछ केसों में बच्चों के मस्तिष्क या पेट के निचले हिस्सों में ट्यूमर बनने के कारण भी ऐसा होता है। यही कारण हैं, जो इलाज की प्रक्रिया की ओर दिशा-निर्देशित करते हैं जिससे इलाज की प्रक्रिया चुननी में आसानी होती है।

हालांकि डॉक्टर स्वयं भी बच्चों में असमय किशोरावस्था को लेकर चकित हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इसका कारण क्या हो सकता है। डॉ. बुदयाल का मानना है, “मुझे लगता है कि इसका महामारी के दौरान बच्चों में मनोवैज्ञानिक, भावनात्मक और शारीरिक परिवर्तनों से कुछ लेना-देना है। दूसरी ओर, डॉ गाडा का मानना है कि एक कारक जो इसमें भूमिका निभा सकता है, वह मोटापा/अधिक वजन और जीवनशैली में बदलाव का बढ़ता प्रचलन हो सकता है क्योंकि कोरोना के समय लोगों की जीवनशैली में अचानक से बदलाव देखे गए हैं।

डॉ. रुस्तगी कहते हैं, कोरोना के समय बच्चे स्क्रीन पर ज्यादा समय तक टाइम बिताने लगे और शरीर का वजन बढ़ते चला गया क्योंकि शारीरिक गतिविधि कम हो गई, जिस कारण से बच्चों में असमय किशोरावस्था की समस्या देखी गई। कोरोना के डर से अभिभावकों ने अस्पतालों में जाने में देरी की और मामले गंभीर होते चले गए।

उपचार योजना पर दें ध्यान

असमय किशोरावस्था के लिए उपचार पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि यह सुनिश्चित कर सकता है कि बच्चा एक अच्छी अंतिम ऊंचाई प्राप्त करता है और शारीरिक परिवर्तनों से निपटने में भावनात्मक उथल-पुथल से नहीं गुजरता है, जो बच्चे के आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकता है और बच्चे को अवसाद में ले जा सकता है। डॉ. बुदयाल कहते हैं, “माता-पिता द्वारा इसकी शीघ्र पहचान और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक किसी भी जटिलता या अंतर्निहित कारणों को रोकने के लिए तत्काल चिकित्सा पर ध्यान देने की आवश्यकता है।”

असामयिक किशोरावस्था को रोकने के लिए  माता-पिता को बच्चे को स्वस्थ भोजन खाने, रोजाना व्यायाम करने और अपना वजन नियंत्रित रखने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। एक और बात का ध्यान रखना होगा कि बच्चे को एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरोन के बाहरी स्रोतों से दूर रखें।

डॉ रुस्तगी कहते हैं, बच्चों को निम्न तीन चरणों का पालन करते हुए असमय किशोरावस्था से बचाया जा सकता है। पहला यदि बच्चे में ट्यूमर के लक्षण दिखाई दें”, तो उसे समय रहते डॉ. से दिखाया जाए। दूसरा – बच्चों की लंबाई पर निगरानी रखी जाए और तीसरा बच्चों को किसी प्रकार का मानसिक तनाव ना दिया जाए।

बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों की जांच करने के लिए डॉ बुदयाल एंडोक्रिनोलॉजिस्ट द्वारा बच्चों का समय पर मूल्यांकन करने का सुझाव देते हैं। इसके अलावा नियमित रूप से बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें और यदि असमय किशोरावस्था के लक्षण दिखाई देते हैं, तो एंडोक्रिनोलॉजिस्ट को दिखाएं।

भोजन का भी रखें ख्याल

पोषण विशेषज्ञ वूमिका मुखर्जी कहती हैं, “किशोरावस्था के विकास को प्रभावित करने वाले सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक पोषण भी है।” इसकी वजह है-

  • बचपन में मोटापा बढ़ने से किशोरावस्था के मामलों में तेजी आ जाती है।
  • शारीरिक निष्क्रियता मेलाटोनिन के स्तर को कम कर सकती है, जो यौवन के विकास को भी गति प्रदान कर सकती है।
  • पानी की आपूर्ति में फ्लोराइड का सेवन मेलाटोनिन के सर्कुलेशन को कम करता है और किशोरावस्था की शुरुआत को बढ़ावा देता है।
  • उच्च प्रोटीन का सेवन IGF-1 के स्तर को बढ़ाता है और विकास को बढ़ावा देता है, जो किशोरावस्था की शुरुआत को तेज कर सकता है।
  • कीटनाशकों से उपचारित और आनुवंशिक रूप से तकनीक द्वारा तैयार किए गए खाद्य पदार्थों को खाना भी एक कारक हो सकता है।
  • भोजन रखने के लिए प्लास्टिक का उपयोग करना। जैसे – बिस्फेनॉल ए (बीपीए). यह एक सिंथेटिक रसायन है, जो सिंथेटिक एस्ट्रोजन के रूप में कार्य करता है और किशोरावस्था के विकास को गति दे सकता है।
  • फास्ट फूड से भरपूर आहार सामान्य शारीरिक विकास में बाधक है। 

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