‘जन्म घूंटी’ के नाम पर शिशुओं के जीवन पर मंडराता खतरा

परंपरा के नाम पर भारत देश के कई राज्यों, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों, में नवजात शिशु को माँ के दूध के स्थान पर गुड़ या शहद चटाया जाता है। आइये जानते हैं कैसे शिशुओं को इसके विपरीत परिणाम झेलने पड़ते हैं ....

भारत के अनेक राज्यों में जन्म के तत्काल बाद मां के दूध के बजाय जन्म घूंटी देने की परंपरा शिशुओं की सेहत पर भारी पड़ रही है। डॉक्टरों के अनुसार जन्म के उपरांत शिशु को स्तनपान कराया जाना चाहिए। स्तनपान से आशय है कि शिशु को मां का पहला गाढ़ा, चिपचिपा, पीला दूध यानी कोलोस्ट्रम पिलाया जाना चाहिए क्योंकि यह दूध बच्चे को बीमारियों से लडऩे की क्षमता प्रदान करता है। कोलोस्ट्रम में पाई जाने वाली एंटीबॉडीज की शक्ति शिशु को जिंदगी भर काम आती है लेकिन राजस्थान के विभिन्न जिलों में आज भी हजारों शिशुओं को पुरानी परंपराओं के कारण इस अमृत से वंचित कर दिया जाता है।

परंपरा या अज्ञानता

राजस्थान में शिशु को जन्म के उपरांत सबसे जरूरी मां का दूध पिलाने के बजाय जन्म घूंटी के रूप में बाह्य तरल या ठोस पदार्थ शिशु को चटाने-पिलाने की परंपरा अभी भी प्रचलित है। कई परिवारों में आसमान में तारे नजर नहीं आने तक शिशु को दूध नहीं पिलाया जाता है। इसका शिशु के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जन्म के उपरांत मां का दूध पिलाने के बजाय गांवों में शिशु को जन्म घूंटी के रूप में गुड़, शहद आदि चटाने की परंपरा है। ऐसे में कई बार साफ़ सफाई का ध्यान न रखने पर शिशु बीमार हो जाते हैं।

डॉक्टर एवं चिकित्साकर्मी ग्रामीणों को अक्सर बताते हैं कि शिशु को कोई जन्म घूंटी आदि देने के बजाय स्तनपान करवाना चाहिए। मां का दूध ही बच्चे के लिए सर्वोत्तम जन्म घूंटी है। कई गैर सरकारी संगठनों ने भी इसके लिए अभियान चलाए हैं लेकिन इसके बावजूद पुरानी परंपराएं बरकरार हैं। इसका खामियाजा शिशुओं को कमजोर इम्युनिटी के रूप मेंं भुगतना पड़ता है। कई परिवारों मेंं तो यह रिवाज भी है कि शिशु के जन्म के बाद उसे तब तक स्तनपान नहीं कराते, जब तक आसमान पर तारे नहीं दिखने लगें। अगर शिशु का जन्म सुबह हुआ तो शाम या रात तक तारे निकलने तक शिशु को कई घंटों तक अकारण भूखा रखा जाता है, जो उसके स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक साबित होता  है।

द यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रंस फंड (यूनिसेफ) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वर्ष 2018 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक निम्न तथा मध्यम आमदनी वाले अधिकतर देशों मेंं जन्म के पहले घंटे के दौरान प्रत्येक पांच में से दो शिशुओं को ही स्तनपान करवाया जाता है। जिन शिशुओं को पहले घंटे के दौरान मां का दूध नहीं मिल पाता है, उनके जीवन पर खतरा मंडराने लगता है। पहले घंटे मेंं मां का दूध नहीं मिलने की वजह से न केवल शिशुओं के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता ही है, बल्कि उनकी मौत की आशंका भी बढ़ जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुमानत: 78 मिलियन बच्चों को जन्म के उपरांत पहले घंटे में मां का दूध पीने को नहीं मिल पाता।

रिपोर्ट के अनुसार जिन नवजात शिशुओं को जन्म के दो से 23 घंटे के बीच स्तनपान शुरू कराया जाता है, उनमें जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करने वालों शिशुओं की तुलना में मौत का जोखिम 33 प्रतिशत बढ़ जाता है। जन्म के एक दिन या उससे अधिक समय के बाद स्तनपान शुरू करने वाले नवजात शिशुओं की मौत का जोखिम दोगुना से अधिक हो जाता है।  

अमृत है मां का दूध

श्रीगंगानगर के गिरि चिल्ड्रन एंड मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.आर. गिरि कहते हैं, ”मां का दूध बच्चे के लिए अमृत है। इसे जन्म के तुरंत बाद बच्चे को पिलाया जाना चाहिए। जिस प्रकार हम खाना खाने से पहले किसी पंडित से मुहूर्त नहीं निकलवाते, वैसे ही शिशु को मां का दूध पिलाने से पहले तारे दिखने का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। बच्चे के लिए जन्म घूंटी के रूप में शहद, गुड़ का चटाया जाना कोई जरूरी नहीं है। उसके लिए सबसे जरूरी है मां का दूध। यह बच्चे के लिए प्राणरक्षक है, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। कई बीमारियों से बचाने में सहायक होता है। मां का दूध पिलाने की बजाय शिशु को शहद चटाया जाना उसके लिए घातक साबित हो सकता है। चटाने वाले हाथ गंदे होने से बच्चे को उल्टी-दस्त की समस्या हो सकती है। जबकि मां का दूध उसे संक्रमण से बचाता है।”

डॉ. गिरि कहते हैं कि मां के दूध में पाया जाने वाला कोलोस्ट्रम कार्बोहाइड्रेट, एंटी बॉडीज और विटामिन ‘ए’ का स्रोत होता है। इनसे शिशु के अनुकूल विकास मेंं सहायता मिलती है और मानसिक तथा शारीरिक विकास सुनिश्चित होता है।

झेलनी पड़ती हैं कई समस्याएं

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श्रीगंगानगर के जन सेवा हॉस्पिटल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. इन्द्रदीप सिंह कोचर कहते हैं कि ”गांवों मेंं जन्म के तुरंत बाद शिशु को मां का दूध पिलाने के बजाय जन्म घूंटी देने की परंपरा बहुत गलत है। इससे लोग अपने बच्चे का ऐसा नुकसान कर देते हैं, जिसकी भरपाई होना संभव नहीं होता। जन्म के उपरांत बच्चा शुगर के लिए दूध पर निर्भर होता है। देर तक भूखा रखने के कारण शिशु मेंं ग्लूकोज की कमी (हाइपोग्लाइसीमिया) हो जाती है। इससे उसके दिमाग पर प्रभाव पड़ता है। ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। ग्लूकोज का स्तर घटने से शिशु के दिमाग के सुनने व आंख से संबंधित cell कमजोर होने की आशंका रहती है। यदि आप बच्चे को जन्म के पहले घंटे में मां का दूध नहीं पिलाते हैं तो समझ लीजिए आप उसके मजबूत और स्वस्थ रहने में बाधक बन रहे हैं। ”

जन जागरूकता लाने की जरूरत

डॉ.कोचर कहते हैं कि ”शिशुओं को जन्मघूंटी देने जैसी परंपराओं को पूर्ण रूप से खत्म करने के लिए जन जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है। लोगों को मां के पहले दूध की उपेक्षा के नुकसान बताए जाने चाहिए। जन जागरूकता लाकर ही मां के पहले दूध को प्राथमिकता में लाया जा सकता है। आखिर लोग कब तक जन्मघूंटी के चक्कर मेंं नवजात शिशुओं के जीवन के साथ अन्याय करते रहेंगें।”

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