मातृ मृत्यु दर के कारण नहीं सुन पाती मांए अपने बच्चों की किलकारी

महिलाएं मां बनने की खबर को सुनकर जितनी खुश होती हैं, उतना सुखी उनका मातृत्व नहीं हो पाता क्योंकि आज भी कई मांए अपने बच्चे की पहले किलकारी बिना सुने हुए ही दम तोड़ देती हैं।

कहते हैं कि मां बनना अधिकांश महिलाओं का सपना होता है क्योंकि मां बनने से महिलाओं को एक नई पहचान मिलती है लेकिन कई माँ ऐसी भी होती हैं जो बच्चे की किलकारी सुनने से पहले ही मृत्यु को गले लगा लेती हैं क्योंकि उनका शरीर बच्चा पैदा करने के दर्द को सहने में असमर्थ होता है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार गर्भवस्था के दौरान प्रबंधन को लेकर, स्वास्थ्य को लेकर या किसी तरह की अनियमितता को मातृ मृत्यु दर कहा जाता है। इसके अलावा बच्चे के जन्म के 42 दिन के भीतर यदि मां की मृत्यु हो जाए, तो इसे भी मातृ मृत्यु दर कहा जाता है। 

क्या कहते हैं आंकड़े 

साल 2016 से 18 की तुलना में देश के मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) में 8.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जिसके बाद भारत में एमएमआर रैंक 103 पर पहुंच गया है। भारत 2030 तक मातृ मृत्यु के सतत विकास के लक्ष्य को हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। गौरतलब है कि सतत विकास के लक्ष्यों (एसडीजी) के तहत प्रति लाख जीवित जन्मों पर होने वाली मातृ मृत्यु दर को 70 पर सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया था। 

हालांकि देश में हर लाख जीवित बच्चों पर 103 माओं की मृत्यु उन्हें जन्म देते समय हो जाती है। साल 2016-18 के बीच यह आंकड़ा 113 था। वहीं साल 2015-17 में यह 122 और साल 2014 से 16 के बीच 130 प्रति लाख दर्ज किया गया था। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि धीरे-धीरे ही सही लेकिन देश में मातृ मृत्यु अनुपात के मामले में सुधार आ रहा है। 

लग रहा था डर 

हालांकि भारत के सुदूर ग्रामीण इलाकों में बच्चे को जन्म देते वक्त महिलाओं की मृत्यु अस्पतालों की अनुपलब्धता के कारण हो जाती है क्योंकि प्रसव के समय जच्चा और बच्चा की देखभाल और सही तरह से बच्चे का जन्म नहीं हो पाता है। मुजफ्फरपुर औराई प्रखंड के एक ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखने वाली पारो देवी (बदला हुआ नाम) ने बताया कि “मेरी शादी 15-16 साल के उम्र में हो गई थी। मेरे तीन बच्चों का जन्म घर पर ही दाई के संरक्षण में हुआ है। उन्होंने आगे बताया कि बच्चों के जन्म के समय दर्द के साथ-साथ इस बात का भी डर लगा हुआ था कि अगर कोई दिक्कत की बात आई तब क्या करेंगे क्योंकि एक तरफ अस्पतालों का अभाव और दूसरी ओर दूर के अस्पतालों में जाने की सुविधा नहीं थी और ना ही पैसे थे। मेरा पहला और दूसरा बेटा है और तीसरी बेटी लेकिन मुझे कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन हां, डर तो लगा हुआ था।”

यूनिसेफ के अनुसार गर्भावस्था के दौरान अत्याधिक रक्तस्त्राव, उच्च रक्तचाप और संक्रमण के कारण मातृ मृत्यु दर का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा एनीमिया, प्रसव के दौरान जटिलता के कारण भी मातृ मृत्यु दर में बढ़त देखी जाती है। साथ ही 15-19 की कम उम्र में शादी और गर्भवती हो जाने से भी लड़कियों में प्रसव के दौरान जटिलता हो जाती है।   

खानपान का रखें ध्यान 

डायबिटीज एंड ओबेसिटी केयर सेंटर पटना की फाउंडर डाइटिशियन डॉ. सुमिता कुमारी बताती हैं कि गर्भवती महिलाओं को अपने खानपान पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। मौसमी फल, हरी सब्जियां और प्रोटीन युक्त डाइट लेना शरीर के लिए फायदेमंद रहता है। साथ ही अपने डाइटिशियन से नियमित अंतराल पर मिलकर अपने भोजन के रुटिन को साझा करते रहना चाहि। गर्भावस्था का हर एक चरण महत्वपूर्ण होता है और हर एक चरण में महिलाओं के शरीर में बदलाव होते हैं, जिसके अनुसार ही महिलाओं को अपना भोजन करना चाहिए। 

चिकित्सकों की देखरेख जरुरी

पटना के आईजीआईएमएस की वरिष्ठ महिला-रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कल्पना सिंह बताती हैं कि प्रसव का पल ना केवल बच्चे बल्कि एक मां के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। एक गर्भवती महिला का ध्यान ना केवल बच्चा होने तक बल्कि बच्चे के जन्म के बाद भी उतना ही रखना चाहिए, जितनी खुशी एक महिला के गर्भवती होने की खबर सुनकर होती है। हालांकि अभी भी ग्रामीण इलाकों में कई जगह जागरुकता आदि के कारण महिलाओं का प्रसव चिकित्सकों की देखरेख में नहीं हो पाता है, जिस कारण संक्रमण आदि के कारण महिला को स्वास्थ्य संबंधित परेशानी होने का खतरा होता है। इसके लिए बेहतर यही है कि परिवार वाले महिला की पूरी तरह से देखभाल करें और चिकित्सकों की देखरेख में प्रसव कराएं।

कुछ बच्चों का जन्म समय से पहले (pre-mature) होता है, जिन्हें अस्पतालों में देखभाल की जरुरत होती है लेकिन घर पर प्रसव कराने से बच्चों को वैसा माहौल नहीं मिल पाता और मांओं की स्थिति भी बिगड़ने लगती है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर परिवार वालों को जागरुक रहना चाहिए। 

योजनाओं की जानकारी जरुरी 

मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए विभिन्न योजनाएं भी लाई गई हैं। जैसे – जननी सुरक्षा कार्यक्रम। इसका उद्देश्य मातृ और नवजात मृत्यु दर को कम करने के लिए भारत सरकार के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन द्वारा चलाया जा रहा अभियान है। वहीं प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान (PMSMA) द्वारा हर महीने गर्भवती महिलाओं की सुनिश्चित, व्यापक और गुणवत्तापूर्ण प्रसव पूर्व देखभाल के लिए एक निश्चित तिथि (हर महीने की 9 तारीख) तय की गई है। इस दिन अपने करीबी स्वास्थ्य केंद्रों में महिलाओं को मुफ्त इलाज कराने की सुविधा दी जाती है और पांच हजार तक का इलाज मुफ्त में किया जाता है। इसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों से जोड़ना है।

इसके अलावा महिलाओं समेत परिवार के हर सदस्य का जागरुक होना जरूरी है क्योंकि अधिकांश समय केवल एक बेटे की चाहत में कई बच्चे पैदा कर लिए जाते हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है इसलिए ‘हम दो, हमारे दो’ नियम का पालन करें और अपने पहले एवं दूसरे बच्चे के बीच कम से कम तीन साल का अंतराल अवश्य रखें।

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